By Vaishnav, For Vaishnav

Wednesday, 23 September 2026

व्रज – विस २०८३ भाद्रपद शुक्ल त्रयोदशीThursday, 24 September 2026

व्रज – विस २०८३ भाद्रपद शुक्ल त्रयोदशी
Thursday, 24 September 2026

स्याम पीली एकदानी चूंदड़ी का पिछोड़ा एवं श्रीमस्तक पर गोल पाग पर गोल चंद्रिका के श्रृंगार

राजभोग दर्शन -

कीर्तन – (राग : सारंग)

ग्वालिनी मीठी तेरी छाछि l
कहा दूध में मेलि जमायो साँची कहै किन वांछि ll 1 ll
और भांति चितैवो तेरौ भ्रौह चलत है आछि l
ऐसो टक झक कबहु न दैख्यो तू जो रही कछि काछि ll 2 ll
रहसि कान्ह कर कुचगति परसत तु जो परति है पाछि l
‘परमानंद’ गोपाल आलिंगी गोप वधू हरिनाछि ll 3 ll

साज - श्रीजी में आज स्याम पीली एकदानी  चूंदड़ी की रुपहली ज़री के हांशिया (किनारी) वाली पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफेद रंग की बिछावट की जाती है.

वस्त्र – श्रीजी में आज स्याम पीली एकदानी चूंदड़ी का पिछोड़ा धराया जाता है. ठाड़े वस्त्र गुलाबी रंग के आते हैं.

श्रृंगार – श्रीजी को आज छेड़ान का हल्का श्रृंगार धराया जाता है. गुलाबी मीना के सर्वआभरण धराये जाते हैं. 
श्रीमस्तक पर लाल एकदानी चूंदड़ी की गोल पाग पर गोल चन्द्रिका एवं बायीं ओर शीशफूल धराया जाता है. श्रीकर्ण में एक जोड़ी कर्णफूल धराये जाते हैं. 
पुष्पों की सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं. 
श्रीहस्त में कमलछड़ी, लहरिया के वेणुजी एवं वैत्रजी धराये जाते हैं.
पट श्याम व गोटी चांदी की आती है.

Tuesday, 22 September 2026

व्रज – विस २०८३ भाद्रपद शुक्ल द्वादशीTuesday, 23 September 2026

व्रज – विस २०८३ भाद्रपद शुक्ल द्वादशी
Tuesday, 23 September 2026

वामन जयंती के श्रृंगार 

अहो बलि द्वारे ठाडे वामन ।
चार्यो वेद पढत मुखपाठी अति सुमंद स्वर गावन ।।१।।
बानी सुनी बलि बुझन आये अहो देव कह्यो आवन ।
तीन पेंड वसुधा हम मागे परनकुटि एक छावन ।।२।।
अहो अहो विप्र कहा तुम माग्यो अनेक रत्न देहु गामन ।
परमानंद प्रभु चरन बढायो लाग्यो पीठन पावन ।।३।।

(वामन लीला मे प्रभु के वचन हैं कि मैं जिस पर कृपा किया करता हू उसका धन छीन लिया करता हूं. मनुष्ययोनि मे जन्म मिलने पर यदि कुलीनता,कर्म, अवस्था,रूप विद्या एश्वर्य ओर धन का घमंड न हो जाय तब समझना चाहिये कि मेरी बड़ी कृपा है)

विशेष - कल  वामन द्वादशी का पर्व था किंतु कल दान एकादशी होने के कारण श्रृंगार आज लिए गए हैं.
भाद्रपद कृष्ण पंचमी को केसर से रंगे गये वस्त्र जन्माष्टमी, राधाष्टमी और वामन द्वादशी के उत्सवों पर श्रीजी को धराये जाते हैं. 
आज श्रीजी को नियम का केसरी धोती-पटका का श्रृंगार धराया जाता है. काफी अद्भुत बात है कि आज यह श्रृंगार धराया प्रभु का स्वरुप अन्य दिनों की तुलना में कुछ छोटा प्रतीत होता है अर्थात दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि श्रीजी आज वामन रूप में अपने भक्तों को दर्शन देते हैं. 

राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : सारंग)

प्रगटे श्रीवामन अवतार l
निरख अदित मुख करत प्रशंसा जगजीवन आधार ll 1 ll
तनघनश्याम पीतपट राजत शोभित है भुज चार l
कुंडल मुकुट कंठ कौस्तुभ मणि उर भृगुरेखा सार ll 2 ll
देखि वदन आनंदित सुर मुनि जय जय करे निगम उच्चार l
‘गोविंद’प्रभु बलिवामन व्है कैं ठाड़े बलि के द्वार ll 3 ll 

साज - श्रीजी में आज लाल दरियाई की बड़े लप्पा की सुनहरी ज़री की तुईलैस के हांशिया (किनारी) वाली (जन्माष्टमी वाली) पिछवाई धरायी जाती है.गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफेद बिछावट की जाती है. 

वस्त्र – श्रीजी को आज केसरी रंग की मलमल पर रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित धोती एवं गाती का उपरना धराया जाता है. प्रभु के यश विस्तार भाव से ठाड़े वस्त्र सफेद धराये जाते हैं.

श्रृंगार – आज प्रभु को मध्य का (घुटनों तक) भारी श्रृंगार धराया जाता है. हीरे की प्रधानता वाले आभरण धराये जाते हैं.
 श्रीमस्तक पर केसरी रंग की कुल्हे के ऊपर सिरपैंच, तीन मोरपंख की चन्द्रिका की जोड़ एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में हीरे के मकराकृति कुंडल धराये जाते हैं. 
कली, कस्तूरी आदि सभी माला धरायी जाति हैं.रंग-बिरंगी पुष्पों की सुन्दर मालाजी धरायी जाती है.
श्रीहस्त में कमलछड़ी, हीरे के वेणुजी एवं दो एक सवर्ण का) वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट उत्सव का एवं गोटी दान की आती हैं.
 आरसी शृंगार में पिले खंड की एवं राजभोग में सोना की डाँडी की दिखाई जाती है.

Monday, 21 September 2026

व्रज – विस २०८३ भाद्रपद शुक्ल एकादशीTuesday, 23 September 2026

व्रज – विस २०८३ भाद्रपद शुक्ल एकादशी
Tuesday, 23 September 2026

दान (परिवर्तिनी) एकादशी, दान आरंभ, दश-दिंगत विजयी नित्यलीलास्थ श्री पुरुषोत्तमजी का उत्सव
वामन जयंती 

आज परिवर्तिनी एकादशी है जिसे पद्मा एकादशी भी कहा जाता है. पद्म पुराण के अनुसार चतुर्मास के दौरान आने वाली इस एकादशी का महत्व देवशयनी और देवप्रबोधिनी एकादशी के समान है. 
इस दिन भगवान विष्णु चतुर्मास के शयन के दौरान करवट लेते हैं इसलिए देवी-देवता भी इनकी पूजा करते हैं.
आज के दिन दान देने और प्रभु को दान की सामग्री अरोगाने से देह की दशा में परिवर्तन होता है. 

इसके अलावा आज वामन जयंती भी है.
जिस साल दान एकादशी और वामन जयंती एक दिन हो तब दान एकादशी के सेवाक्रम को प्राथमिकता दी जाती है क्योंकि दान लीला पूर्ण रूप से पुष्टिमार्ग की लीला है.
यद्यपि आज वामन द्वादशी के राग, भोग और दो राजभोग का क्रम आज ले लिया जाएगा.
वामन जयंती के श्रृंगार का क्रम अगले दिन लिया जाएगा.

अपने पांडित्य से दसों-दिशाओं में पुष्टिमार्ग की यश पताका फहराने वाले ‘दश-दिंगत विजयी’, नवलक्ष ग्रन्थकर्ता नित्यलीलास्थ श्री पुरुषोत्तमजी (१७१४) का भी आज उत्सव है. 
आप के सेव्य स्वरुप सूरत (गुजरात) में विराजित प्रभु श्री बालकृष्णलालजी हैं.

पुष्टिमार्ग में आज की एकादशी को दान-एकादशी कहा जाता है. 
नंदकुमार रसराज प्रभु ने व्रज की गोपियों से इन बीस दिनों तक दान लिया है. प्रभु ने तीन रीतियों (सात्विक, राजस एवं तामस) से दान लिए हैं. 
दीनतायुक्त स्नेहपूर्वक, विनम्रता से दान मांगे वह सात्विक दान, वाद-विवाद व श्रीमंततापूर्वक दान ले वह राजस एवं हठपूर्वक, झगड़ा कर के अनिच्छा होते भी जोर-जबरदस्ती कर दान ले वह तामस दान है. 
दान के दिनों में गाये जाने वाले कीर्तनों में इन तीनों प्रकार से लिये दान का बहुत सुन्दर वर्णन है.

प्रभु ने व्रजवितान में, दानघाटी सांकरी-खोर में, गहवर वन में, वृन्दावन में, गोवर्धन के मार्ग पर, कदम्बखंडी में, पनघट के ऊपर, यमुना घाट पर आदि विविध स्थलों पर व्रजभक्तों से दान लिया है और उन्हें अपने प्रेमरस का दान किया है.

भाद्रपद शुक्ल द्वादशी को प्रभु का वामन रूप में प्रादुर्भाव हुआ. प्रभु ने ब्राह्मण रूप में राजा बलि से दान लिया. 

इस प्रकार दान-लीला के विविध भाव हैं.

दान की सामग्री में दूध श्री स्वामिनीजी के भाव से, दही श्री चन्द्रावलीजी के भाव से, छाछ श्री यमुनाजी के भाव से, और माखन श्री कुमारिकाजी के भाव से अरोगाया जाता है. 

दान के बीस दिनों में पांच-पांच दिन चारों युथाधिपतियों के माने गए हैं.

कल तक बाल-लीला के पद गाये जाते थे. अब आज से प्रतिदिन दान के पद गाये जायेंगे.

श्रीजी का सेवाक्रम – उत्सव होने के कारण श्रीजी मंदिर के सभी मुख्य द्वारों की देहरी (देहलीज) को हल्दी से लीपी जाती हैं एवं आशापाल की सूत की डोरी की वंदनमाल बाँधी जाती हैं.

सभी समय यमुनाजल की झारीजी आती है. चारों समय (मंगला, राजभोग, संध्या व शयन) आरती थाली में की जाती है. 
गेंद, चौगान, दीवाला आदि सभी सोने के आते हैं.

श्रृंगार समय दान के पद गाये जाते हैं. आज विशेष रूप से श्रृंगार दर्शन में बड़ा कमल धराया जाता है.

आज श्रीजी को नियम से मुकुट-काछनी का श्रृंगार धराया जायेगा. प्रभु को मुख्य रूप से तीन लीलाओं (शरद-रास, दान और गौ-चारण) के भाव से मुकुट का श्रृंगार धराया जाता है.

दान के दिनों के मुकुट काछनी के श्रृंगार की कुछ और विशेषताएँ भी है.
इन दिनों में जब भी मुकुट धराया जावे तब मुकुट को एक वस्त्र से बांधा जाता है जिसे मुकुट पीताम्बर कहा जाता है जिससे जब प्रभु मटकी फोड़ने कूदें तब मुकुट गिरे नहीं. 

इसके अतिरिक्त दान के दिनों में मुकुट काछनी के श्रृंगार में स्वरुप के बायीं ओर चोटीजी नहीं धरायी जाती. इसके पीछे यह भाव है कि यदि चोटीजी रही तो प्रभु जब मटकी फोड़कर भाग रहे हों तब गोपियाँ उनकी चोटीजी पकड़ सकती हैं और प्रभु भाग नहीं पाएंगे.

श्रीजी को गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में बूंदी के लड्डू अरोगाये जाते हैं. इसके अतिरिक्त दूधघर में सिद्ध की गयी केशरयुक्त बासोंदी की हांडी प्रभु को अरोगायी जाएगी. 

आज से 20 दिन तक प्रतिदिन ग्वाल भोग में श्री ठाकुरजी को दान की सामग्रियां अरोगायी जाती है. इन सामग्रियों में प्रभु को शाकघर और दूधघर में विशेष रूप से सिद्ध किये गये दूध, दही, केशरिया दही, श्रीखंड, केशरी बासोंदी, मलाई बासोंदी, गुलाब-जामुन, छाछ की हांडियां एवं खट्टा-मीठा दही के बटेरा आदि अरोगाये जाते हैं.

राजभोग में अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता व सखड़ी में दहीभात अरोगाया जाता है.

राजभोग दर्शन – 

कीर्तन – (राग : सारंग)

कहि धो मोल या दधिको री ग्वालिन श्यामसुंदर हसिहसि बूझत है l
बैचेगी तो ठाडी रहि देखो धो कैसो जमायो, काहेको भागी जाति नयन विशालन ll 1 ll
वृषभान नंदिनी कौ निर्मोलक दह्यौ ताको मौल श्याम हीरा तुमपै न दीयो जाय,
सुनि व्रजराज लाडिले ललन हसि हसि कहत चलत गज चालन l
‘गोविंद’प्रभु पिय प्यारी नेह जान्यो तब मुसिकाय ठाडी भई ऐना बेनी कर सबै आलिन ll 2 ll  

साज – आज प्रातः श्रृंगार समय श्रीजी में दानघाटी में दूध-दही बेचने जाती गोपियों के पास से दान मांगते एवं दूध-दही लूटते श्री ठाकुरजी एवं सखा जनों के सुन्दर चित्रांकन वाली दानलीला की प्राचीन पिछवाई धरायी जाती है.
राजभोग में पिछवाई बदल कर जन्माष्टमी वाली लाल लप्पा की पिछवाई आती है.
गादी, तकिया और चरणचौकी के ऊपर सफेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – श्रीजी को आज लाल रुपहली किनारी से सुसज्जित सूथन धराये जाता है. छोटी काछनी लाल रुपहली किनारी की एवं बड़ी काछनी कोयली सुनहरी किनारी की होती है. 
लाल रुपहली ज़री की तुईलैस वाला पीताम्बर (रास-पटका) धराया जाता है. ठाड़े वस्त्र श्वेत जामदानी का धराये जाते हैं.

श्रृंगार – आज प्रभु को वनमाला (चरणारविन्द तक) का उत्सव का भारी श्रृंगार धराया जाता है. मिलवा, माणक की प्रधानता के सर्व आभरण धराये जाते हैं. कली, कस्तूरी आदि सभी माला धरायी जाती हैं. आज प्रभु को बघनखा धराये जाते हैं. 
श्रीमस्तक पर श्री गोकुलनाथजी वाले टोपी व स्वर्ण का रत्नजड़ित मुकुट एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में मयुराकृति कुंडल धराये जाते हैं. चित्र में द्रश्य है परन्तु चोटी नहीं धरायी जाती है. पीले एवं श्वेत पुष्पों की दो मालाजी धरायी जाती है. श्रीहस्त में कमलछड़ी, वेणु, वेत्र माणक के व एक वेत्र हीरा के धराये जाते हैं.

सायं भोग समय अरोगाये जाने वाले फीका के स्थान पर बीज-चालनी के सूखे मेवे अरोगाये जाते हैं.
संध्या-आरती दर्शन में प्रभु के श्रीहस्त में हीरा का वैत्र ठाड़ा धराया जाता है.

Sunday, 20 September 2026

व्रज – विस २०८३ भाद्रपद शुक्ल दशमीMonday, 21 September 2026

व्रज – विस २०८३ भाद्रपद शुक्ल दशमी
Monday, 21 September 2026

आगम का श्रृंगार

विशेष - कल दान-एकादशी है. साथ ही कल अपने पांडित्य से दसों-दिशाओं में पुष्टिमार्ग की यश पताका फहराने वाले दश-दिंगत विजयी नित्यलीलास्थ गौस्वामी श्री पुरुषोत्तमजी का उत्सव भी है अतः आज श्रीजी को उत्सव के एक दिन पूर्व धराया जाने वाला हल्का श्रृंगार धराया जाता है. 
सामान्य तौर पर प्रत्येक बड़े उत्सव के एक दिन पूर्व लाल वस्त्र, पीले ठाड़े वस्त्र एवं पाग पर सादी चन्द्रिका का श्रृंगार धराया जाता है. यह श्रृंगार अनुराग के भाव से धराया जाता है.

श्री राधिकाजी एवं श्री ठाकुरजी के बाल-लीला के पद आज तक ही गाये जाते हैं. कल से श्रीजी में दानलीला के कीर्तन गाये जायेंगे.

राजभोग दर्शन – 

कीर्तन – (राग : गौड़सारंग)

परम धन राधा नाम आधार l
जाहि पिया मुरली में टेरत सुमरत वारंवार ll 1 ll
वेद मंत्र अरु जंत्र तंत्रमें येही कियो निरधार l
श्रीशुक प्रगट कियो नहीं ताते जान सार को सार ll 2 ll
कोटिन रूप धरे नंदनंदन तोऊ ना पायो पार l
‘व्यासदास’ अब प्रगट बखानत डार भार में भार ll 3 ll

राजभोग दर्शन - 

साज – आज श्रीजी में लाल रंग की मलमल पर रुपहली ज़री की तुईलैस के हांशिया (किनारी) वाली पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया और चरणचौकी के ऊपर सफेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – श्रीजी को आज लाल रंग की मलमल पर सुनहरी ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित पिछोड़ा धराया जाता है. ठाड़े वस्त्र पीले रंग के होते हैं. 

श्रृंगार – प्रभु को आज छोटा (कमर तक) हल्का श्रृंगार धराया जाता है. पन्ना के सर्व आभरण धराये जाते हैं. 
श्री मस्तक पर लाल रंग की गोल पाग के ऊपर सिरपैंच, मोरपंख की सादी चन्द्रिका तथा बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में चार कर्णफूल धराये जाते हैं. 
श्वेत पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं.इसी प्रकार पिले पुष्पों की दो मालाजी हमेल की भांति भी धरायी जाती हैं. 
 श्रीहस्त में कमलछड़ी, हरे मीना के वेणुजी और एक वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट लाल एवं गोटी सोना की छोटी आती हैं.आरसी शृंगार में स्वर्ण की दिखाई जाती हैं.

Saturday, 19 September 2026

व्रज – विस २०८३ भाद्रपद शुक्ल नवमीSunday, 20 September 2026

व्रज – विस २०८३ भाद्रपद शुक्ल नवमी
Sunday, 20 September 2026

व्रज में रतन राधिका गोरी ।
हर लीनी वृषभान भवनतें नंद सुवन की जोरी ।।१।।
ग्रथित कुसुम अलकावली की छवि अरु सुदेश करडोरी ।
पिय भुज कन्ध धरें यों राजत ज्यों दामिनी घनसोंरी ।।२।।
कालिंदी तट कोलाहल सघन कुंजवन खोरी ।
कृष्णदास प्रभु गिरिधर नागर नागरी नवल किशोरी ।।३।।

राधाष्टमी का परचारगी श्रृंगार

विशेष – आज श्रीजी को राधाष्टमी का परचारगी श्रृंगार धराया जायेगा. परचारगी श्रृंगार में श्रीजी में सभी साज, वस्त्र एवं श्रृंगार पिछली कल की भांति ही होते हैं, केवल पीठिका के ऊपर प्राचीन हीरे-मोती के जड़ाव का चौखटा नहीं धराया जाता है और आभरण कुछ कम होते हैं. 
गेंद, चौगान, दीवाला आदि सभी सोने के आते हैं.आज तकिया के खोल एवं साज जड़ाऊ स्वर्ण  काम के आते हैं.

दिन में सभी समय झारीजी में यमुनाजल भरा जाता है. चारों समय (मंगला, राजभोग, संध्या व शयन) आरती थाली में की जाती है.

श्रीजी में सभी बड़े उत्सवों के एक दिन बाद परचारगी श्रृंगार होता है.

परचारगी श्रृंगार के श्रृंगारी चिरंजीवी श्री विशाल बावा होते हैं. यदि वे उपस्थित हों तो श्रीजी के श्रृंगारी वही होते हैं. 

जन्माष्टमी के चार श्रृंगार चार यूथाधिपति स्वामिनीजी के भाव से होते हैं परन्तु श्री राधिकाजी प्रभु की अर्धांगिनी हैं अतः इस भाव से राधाष्टमी के श्रृंगार दो बार ही होते हैं.

राजभोग दर्शन – 

कीर्तन – (राग : सारंग)

मैं देखी सुता वृषभान की l
जननी संग आई व्रज रावरी शोभा रूप निधान की ll 1 ll
नेंक सुभायते भृकुटी टेढ़ी बेनी सरस कमानकी l
नैन कटाक्ष रहत चितवतही चितवनि निपट अयानकी ll 2 ll
पग जेहरी कंचन रोचनसी तनकसी पोहोंची पानकी l
खगवारी गले द्वै लर मोती तनक तरुवनी कानकी ll 3 ll
लै बैठी हंसि गोद जसोदा मनमें ऐसी बानकी l
‘सूरदास’ प्रभु मदनमोहन हित जोरी सहज समान की ll 4 ll    

साज - श्रीजी में आज लाल दरियाई की बड़े लप्पा की सुनहरी ज़री की तुईलैस के हांशिया (किनारी) वाली (जन्माष्टमी वाली) पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया के ऊपर लाल मखमल बिछावट की जाती है तथा स्वर्ण की रत्नजड़ित चरणचौकी के ऊपर सफेद मखमल मढ़ी हुई होती है.

वस्त्र – श्रीजी को आज केसरी रंग की जामदानी की रुपहली रुपहली फूल वाली किनारी से सुसज्जित चाकदार एवं चोली धरायी जाती है. सूथन रेशम का लाल रंग का सुनहरी छापा का होता है. ठाड़े वस्त्र मेघश्याम रंग के होते हैं.

श्रृंगार – प्रभु को आज वनमाला (चरणारविन्द तक) का हीरा एवं माणक भारी श्रृंगार धराया जाता है. मिलवा- हीरे, मोती, माणक तथा स्वर्ण जड़ाव के आभरण धराये जाते हैं. 

श्रीमस्तक पर केसरी रंग की कुल्हे के ऊपर सिरपैंच, पांच मोरपंख की चन्द्रिका की जोड़ एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में मकराकृति कुंडल धराये जाते हैं. बायीं ओर उत्सव की हीरा की चोटी (शिखा) धरायी जाती है. मुखारविंद पर चंदन से कपोलपत्र किये जाते हैं.
नीचे आठ पदक ऊपर हीरा, पन्ना, माणक, मोती के हार एवं माला धराए जाते हैं.
श्रीकंठ में कली,कस्तूरी आदि मालाजी धरायी जाती है. 
पीले एवं श्वेत पुष्पों की विविध रंगों की थागवाली दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती है. 
श्रीहस्त में कमलछड़ी, हीरे के वेणुजी एवं दो वेत्रजी धराये जाते है.
पट एवं गोटी जड़ाऊ स्वर्ण की आते हैं.
 आरसी शृंगार में चार झाड़ की व राजभोग में सोना की डाँडी की दिखाई जाती है.

Friday, 18 September 2026

व्रज –विस २०८३ भाद्रपद शुक्ल अष्टमीSaturday, 19 September 2026

व्रज –विस २०८३ भाद्रपद शुक्ल अष्टमी
Saturday, 19 September 2026

आज वधाई है बरसाने ।
पंच शब्द बाजे सुनि सुर मुनि देखन मन तरसाने ।।१।।
कीरति कूखि चंद्रमा प्रगटी श्रीराधाजु पग दरसाने ।
ललित निकुंज बिहारीन के ऊर रहे रूप सरसाने ।।२।।

सभी वैष्णवजन को स्वामिनीजी के आगमन की ख़ूब ख़ूब बधाई

जय श्री कृष्ण 

राधाष्टमी

आज  ग्वाल के दर्शन बाहर नहीं खुलते गोपी वल्लभ (ग्वाल) के भोग सरे पश्चात स्वामिनीजी के शृंगार धराए जाते हैं.
मालाजी नवीन धरायी जाती हैं.
प्रभु के मुखारविंद पर (ऊबटना) चंदन से कपोलपत्र मांड़े जाते हैं. गुलाल,अबीर,चंदन,चोवा से सूक्ष्म खेल होवे फिर जड़ाऊ आरसी दिखा कर प्रभु श्री गोवर्धनधरण को कुंकुम-अक्षत से तिलक करके आरती करी जाती हैं.
शंख, झालर, घंटानाद के द्वारा स्वामिनीजी के आगमन का स्वागत किया जाता हैं.
तदुपरांत उत्सव भोग धरे जाते हैं जिसमें विशेष रूप से पंजीरी के लड्डू, छुट्टीबूंदी, खस्ता शक्करपारा, दूधघर में सिद्ध मावे के पेड़ा-बरफी, दूधपूड़ी (मलाई-पूड़ी), सफ़ेद-केसरी मावा की गुंजिया, केशरयुक्त बासोंदी, जीरा युक्त दही, रवा की खीर, घी में तले बीज-चालनी के सूखे मेवे, और विविध प्रकार के संदाना अरोगाये जाते हैं.
साथ ही श्रीजी को श्री नवनीतप्रियाजी, द्वितीय गृहाधीश्वर प्रभु श्री विट्ठलनाथजी एवं तृतीय गृहाधीश्वर प्रभु श्री द्वारकाधीशजी के घर से सिद्ध होकर आये पंजीरी के लड्डू भी अरोगाये जाते हैं.

आज श्रीजी को नियम से केसरी जामदानी के वस्त्र एवं श्रीमस्तक पर कुल्हे के ऊपर पांच मोरपंख की चन्द्रिका की जोड़ धराये जाते हैं.

गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में विशेष रूप से मनोरर (इलायची-जलेबी) के लड्डू, दूधघर में सिद्ध की गयी केशरयुक्त बासोंदी की हांडी एवं शाकघर में सिद्ध चार विविध प्रकार के फलों के मीठा अरोगाये जाते हैं.

राजभोग में अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता और सखड़ी में पांचभात (मेवा-भात, दही-भात, राई-भात, श्रीखंड-भात और वड़ी-भात) आरोगाये जाते हैं. 

उत्थापन समय फलफूल के साथ अरोगाये जाने वाले फीका के स्थान पर घी में तला हुआ बीज-चालनी का सूखा मेवा अरोगाया जाता है.

भोग-आरती के दर्शन में ढाढ़ी-ढाढन (नाच-गा कर बधाई देने वाले) आते हैं एवं मणिकोठा में हो रहे कीर्तन के दौरान दोनों नृत्य करते हैं. 
ढाढ़ीलीला होती है, ढाढ़ीलीला के पद गाये जाते हैं. इसके पश्चात दोनों को बधाई स्वरुप दान दिया जाता है.

ढाढ़ी-ढाढन दोनों पुरुष ही होते हैं. पिछले कई वर्षों से ढाढ़न के रूप में बुरहानपुर (महाराष्ट्र) के परम वैष्णव श्री बलदेवभाई सुन्दर स्त्रीवेश धर कर श्रीजी के समक्ष नृत्य करते हैं.

शयन समय डोल-तिबारी में ध्रुव-बारी के पास में प्रिया-प्रीतम के भाव से बिछायत होती है, कांच का बंगला धरा जाता है एवं विविध सज्जा की जाती है जो कि अनोसर में भी रहती है और अगले दिन शंखनाद पश्चात हटा ली जाती है.

राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : सारंग)

प्रगट भई रावल श्री राधा।।
सुनि धाई व्रजपुरकी वनिता निरखत सुंदर रूप अगाधा।।1।।
तब वृषभान दान बहु दीने जाचककी सब पूजी साधा। 
द्वारिकेस स्वामिनी महिमा मुनिमन ध्यान लगाय समाधा।।2।।

कीर्तन – (राग : सारंग)

आज वृषभान के आनंद l
वृंदाविपिन विहारिनि प्रगटी श्रीराधाजु आनंद कंद ll 1 ll
गोपी ग्वाल गाय गो सुत लै चले यशोदा नंद l
नंदी सुरर तें नाचत गावत आनंद करत सुछंद ll 2 ll
लेत विमल यश देत वसन पशु धरत दूब शिरवृंद l
लोचन कुमुद प्रफुल्लित देखियत ज्यों गोरी मुखचंद ll 3 ll
जाचक भये परमधन कहियत गोधन सुधा अमंद l
भये मनोरथ ‘व्यास’ दासके दूरि गए दुःख द्वंद ll 4 ll

साज - श्रीजी में आज लाल दरियाई की बड़े लप्पा की सुनहरी ज़री की तुईलैस के हांशिया (किनारी) वाली (जन्माष्टमी वाली) पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया के ऊपर लाल मखमल बिछावट की जाती है तथा स्वर्ण की रत्नजड़ित चरणचौकी के ऊपर सफेद मखमल मढ़ी हुई होती है.

वस्त्र – श्रीजी को आज केसरी रंग की जामदानी की रुपहली रुपहली फूल वाली किनारी से सुसज्जित चाकदार एवं चोली धरायी जाती है. सूथन रेशम का लाल रंग का सुनहरी छापा का होता है. ठाड़े वस्त्र मेघश्याम रंग के होते हैं.

श्रृंगार – प्रभु को आज वनमाला (चरणारविन्द तक) का दो जोड़ का हीरा एवं माणक भारी श्रृंगार धराया जाता है. मिलवा- हीरे, मोती, माणक तथा स्वर्ण जड़ाव के आभरण धराये जाते हैं. 

श्रीमस्तक पर केसरी रंग की कुल्हे के ऊपर सिरपैंच, पांच मोरपंख की चन्द्रिका की जोड़ एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में मकराकृति कुंडल धराये जाते हैं. बायीं ओर उत्सव की हीरा की चोटी (शिखा) धरायी जाती है. पीठिका के ऊपर प्राचीन हीरे-मोती के जड़ाव का चौखटा धराया जाता है. मुखारविंद पर चंदन से कपोलपत्र किये जाते हैं.

श्रीकंठ में कली,कस्तूरी आदि मालाजी धरायी जाती है. 
पीले एवं श्वेत पुष्पों की विविध रंगों की थागवाली दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती है. 
आज मोती का कमल धराया जाता हैं.
हीरे के वेणुजी एवं दो वेत्रजी धराये जाते है.
पट एवं गोटी जड़ाऊ स्वर्ण की आते हैं.
 आरसी शृंगार में जड़ाऊ स्वर्ण की व राजभोग में सोना की डाँडी की दिखाई जाती है.

Thursday, 17 September 2026

व्रज – विस २०८३ भाद्रपद शुक्ल सप्तमीFriday, 18 September 2026

व्रज – विस २०८३ भाद्रपद शुक्ल सप्तमी
Friday, 18 September 2026

 राधाष्टमी के आगम का श्रृंगार 

विशेष - कल राधाष्टमी का उत्सव है अतः आज श्रीजी को उत्सव के एक दिन पूर्व धराया जाने वाला हल्का श्रृंगार धराया जाता है. 

सामान्य तौर पर प्रत्येक बड़े उत्सव के एक दिन पूर्व लाल वस्त्र, पीले ठाड़े वस्त्र एवं पाग पर सादा मोरपंख की चन्द्रिका का श्रृंगार धराया जाता है. 

प्रभु को यह श्रृंगार अनुराग के भाव से धराया जाता है.

राजभोग दर्शन – 

कीर्तन – (राग : सारंग)

धनि धनि प्रभावती जिन जाई ऐसी बेटी धनि धनि हो वृषभान पिता l
गिरिधर नीकी मानी सो तो तीन लोक जानी उरझ परी मानों कनकलता ll 1 ll
चरन गंगा ढारों मुख पर ससि वारों ऐसी त्रिभुवनमें नाहिन वनिता l
‘नंददास’ प्रभु श्याम बस करनको श्यामाजु के तोले नावे सिन्धु सुता ll 2 ll

साज – आज श्रीजी में लाल रंग की मलमल पर रुपहली ज़री की तुईलैस के हांशिया (किनारी) वाली पिछवाई धरायी है. गादी, तकिया और चरणचौकी के ऊपर सफेद बिछावट की गईं है.

वस्त्र – श्रीजी को आज लाल रंग की मलमल का सुनहरी किनारी से सुसज्जित पिछोड़ा धराया है. ठाड़े वस्त्र पीले रंग के धराये हैं. 

श्रृंगार – प्रभु को आज छोटा (कमर तक) का हल्का श्रृंगार धराया जाता है. पन्ना तथा जड़ाव सोने के सर्व आभरण धराये हैं.
 श्रीमस्तक पर लाल रंग की गोल पाग के ऊपर सिरपैंच तथा मोरपंख की सादी चन्द्रिका तथा बायीं ओर शीशफूल धराया है. श्रीकर्ण में कर्णफूल धराये हैं. 
श्वेत पुष्पों की रंग-बिरंगी थागवाली चार सुन्दर मालाजी धरायी हैं. 
श्रीहस्त में कमलछड़ी, हरे मीना के वेणुजी और एक वेत्रजी धराये हैं.
पट लाल, गोटी स्वर्ण की छोटी व शृंगार में आरसी सोने की आती है.

व्रज – विस २०८३ भाद्रपद शुक्ल त्रयोदशीThursday, 24 September 2026

व्रज – विस २०८३ भाद्रपद शुक्ल त्रयोदशी Thursday, 24 September 2026 स्याम पीली एकदानी चूंदड़ी का पिछोड़ा एवं श्रीमस्तक पर गोल पाग पर गोल चंद्...