By Vaishnav, For Vaishnav

Friday, 19 June 2026

व्रज - विस २०८३ ज्येष्ठ शुक्ल षष्ठी Saturday, 20 June 2026

व्रज - विस २०८३ ज्येष्ठ शुक्ल षष्ठी 
Saturday, 20 June 2026

बादली मलमल का आड़बंद एवं श्रीमस्तक पर छज्जेदार पाग पर तुर्रा के श्रृंगार

राजभोग दर्शन – 

कीर्तन – (राग : सारंग)

पनिया न जैहोरी आली नंदनंदन मेरी मटुकी झटकिके पटकी l
ठीक दुपहरीमें अटकी कुंजनमें कोऊ न जाने मेरे घटकी ll 1 ll
कहारी करो कछु बस नहि मेरो नागर नटसों अटकी l
‘नंददास’ प्रभुकी छबि निरखत सुधि न रही पनघटकी ll 2 ll

साज - आज श्रीनाथजी में बादली मलमल की पिछवाई धरायी जाती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को बादली मलमल का आड़बंद धराया जाता है. 

श्रृंगार – आज प्रभु को छोटा (कमर तक) ऊष्णकालीन श्रृंगार धराया जाता है. मोती के आभरण धराये जाते हैं. 
श्रीमस्तक पर बादली छज्जेदार पाग के ऊपर सिरपैंच, तुर्रा एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. 
श्रीकर्ण में एक जोड़ी कर्णफूल धराये जाते हैं. 
श्वेत पुष्पों की सुन्दर थागवाली दो कलात्मक मालाजी धरायी जाती हैं.
श्रीहस्त में कमलछड़ी, झीने लहरिया के वेणुजी एवं वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट ऊष्णकाल व गोटी हकीक के आते है.

व्रज - ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी Friday, 19 June 2026

व्रज - ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी 
Friday, 19 June 2026

श्रीजी में नियम का नाव का मनोरथ  

बैठै घनस्याम सुंदर खेवत है नाव।
आज सखी मोहन संग , खेलवे को दाव।।१।।
यमुना गम्भीर नीर, अति तरंग लोले। 
गोपिन प्रति कहन लागे, मीठे मृदु बोले।। २।। 
पथिक हम खेवट तुम , लीजिये उतराई। 
बीच धार मांझ रोकी , मिष ही मिष डुलाई ।। ३।। 
डरपत हों स्याम सुंदर, राखिये पद पास।
याहि मिष मिल्यो चाहे, परमानंद दास।।। ४।। 

विशेष – आज नित्यलीलास्थ गौस्वामी तिलकायत श्री गोविन्दलालजी महाराजश्री ने उदयपुर के तत्कालीन महाराणा भूपालसिंहजी व उदयपुर की महारानीजी की विनती पर विक्रम संवत 2005 में ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी को नाव का मनोरथ किया था. 
डोलतिबारी में जल भरकर नाव में प्रभु श्री मदनमोहनजी को विराजित कर सुन्दर मनोरथ हुआ था. तब से यह मनोरथ उनके द्वारा जमा करायी गयी धनराशी के ब्याज से प्रतिवर्ष ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी को होता है.

सेवाक्रम- दिन में दो समय राजभोग एवं संध्या आरती की आरती थाली में की जाती है.

आज श्रीजी को नियम की बिना किनारी की गुलाबी परदनी और श्रीमस्तक पर गोल-चंद्रिका का श्रृंगार धराया जाता है. 

द्वितीय गृह में आज श्री गोविन्दरायजी (द्वितीय) का प्राकट्योत्सव है.
आज प्राचीन परंपरानुसार श्रीजी व श्री नवनीतप्रियाजी को धराये जाने वाले वस्त्र द्वितीय गृह प्रभु श्री विट्ठलनाथजी के घर से सिद्ध होकर पधारते हैं.
श्री नवनीतप्रियाजी के लिए ओढ़नी भी द्वितीय गृह से पधारती है.
वस्त्रों के संग बूंदी के लड्डुओं की छाब भी वहां से आती है.

वर्ष में लगभग 16 बार श्रीजी व श्री नवनीतप्रियाजी के वस्त्र द्वितीय पीठ से पधारते हैं.

आज श्रीजी को नियम की बिना किनारी की गुलाबी परधनी और श्रीमस्तक पर गोल-चंद्रिका का श्रृंगार धराया जाता है. उदयपुर के गणगौर घाट के सुन्दर चित्रांकन की सुन्दर पिछवाई धरायी जाती है.

राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : सारंग)

करत जल केलि पिय प्यारी भुज मेलि l
छुटत फूहारे भारी उज्जवल हो दस बारे अत्तरही सुगंधि रेलि ll 1 ll
निरख व्रजनारी कहा कहौ छबि वारी सखा सहत सहेलि l
राधा-गोविंद जल मध्य क्रीड़त ख्याल वृंदावन सखी सब टहेलि ll 2 ll

साज – आज श्रीजी में उदयपुर के प्रसिद्द गणगौर-घाट, राजमहल, नौका-विहार, घूमर नृत्य करती गोपियों, श्री ठाकुर जी, श्री बलदेव जी एवं श्री नंद-यशोदा जी के सुन्दर चित्रांकन से सुशोभित पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को बिना किनारी की गुलाबी मलमल की परदनी धरायी जाती है. गादी, तकिया और चरणचौकी के ऊपर सफेद बिछावट की जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफेद बिछावट की जाती है.

श्रृंगार – आज प्रभु को छोटा (कमर तक) ऊष्णकालीन हल्का श्रृंगार धराया जाता है. सर्व आभरण हीरा के धराये जाते हैं. 
श्रीमस्तक पर गुलाबी मलमल की गोलपाग के ऊपर सिरपैंच, मोती की घुमावदार चमकनी गोल-चंद्रिका एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. 
श्रीकर्ण में हीरा के कर्णफूल धराये जाते हैं. 
श्रीकंठ में एक हार व पंचलड़ा धराया जाता है. 
हरे एवं कमल के पुष्पों की विविध पुष्पों की थागवाली दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती है वहीँ श्वेत पुष्पों एवं कमल की दो मालाजी हमेल की भांति भी धरायी जाती है. 
श्रीहस्त में तीन कमल की कमलछड़ी, चांदी के वेणुजी एवं एक वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट उष्णकाल का व गोटी हकीक की आती है.

बैठे नाव विहरत पिय प्यारी ।
आवत तहां सुगंध मनहरनी, यमुना जल सुखकारी ll 1 ll
लाल धर्यो अंबर अति झीनो, माथे पाघ धरी मनोहारी l
गल पहुपन के हार मनोहर, प्यारी के तन पहुपन सारी ll 2 ll
सुन्दर श्याम आप ही खेवत, करत बात अपने जियवारी l
‘श्याम-ग्वालिनी’ रीझे परस्पर, अखियन अंखियाँ डारी ll 3 ll

श्रीजी में नियम का नाव का मनोरथ  

राजभोग कुछ जल्दी खोले जाते हैं और राजभोग दर्शन के पश्चात डोलतिबारी के तीनों खण्डों में कमर तक जल भरा जात
जल में विविध प्रकार के इत्र घोले जाते हैं. 
मोगरे, गुलाब, कमल आदि के पुष्प, लकड़ी के खिलौने (मगरमच्छ, कछुए आदि) तैराये जाते हैं. चांदी की थालियों में रुई से बनी बतखें भी तैरायी जाती हैं.

उत्थापन दर्शन नहीं खोले जाते, भोग समय मनोरथ के भाव से विविध सामग्रियां अरोगायीं जाती हैं व सायं लगभग 5 बजे नाव मनोरथ के दर्शन खुलते हैं. 
सुन्दर नौका में विराजित हो श्रीजी के विग्रह स्वरुप श्री मदनमोहनजी वैष्णवों पर आनंद रस की वर्षा करते हैं. नौका सखियों और नाव खेते ग्वालों की मूर्तियों से सुसज्जित होती हैं. लगभग डेढ़ घंटे दर्शन खुले रहते हैं. तदुपरांत श्री ठाकुरजी को भीतर पधराकर नौका को हटाकर शीतल जल छोड़ दिया जाता है जिसमें सभी वैष्णव स्नान और जल में खड़े रह कर श्रीजी के दर्शनों का आनंद लेते हैं.

मनोरथ का कीर्तन – (राग : सारंग)

श्याम जमुना बीच खेवत नाव l
एक सखी आई घरतें कहे मोहुको बेठाव ll 1 ll
बेठों कैसे घाट ओघट है रपट परत है पाय l
हाथ पकर बेठाय आप ढिंग ‘रसिकन’ रच्यो उपाय ll 2 ll

Wednesday, 17 June 2026

व्रज - विस २०८३ ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्थी Thursday, 18 June 2026

व्रज - विस २०८३ ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्थी 
Thursday, 18 June 2026

श्वेत मलमल का पिछोड़ा एवं श्रीमस्तक पर छज्जेदार पाग पर श्वेत मोर चंद्रिका के श्रृंगार 

ऊष्णकाल का तृतीय अभ्यंग

राजभोग दर्शन – 

साज – (राग : सारंग)

आवत ही यमुना भर पानी l
श्याम रूप काहुको ढोटा वाकी चितवन मेरी गैल भुलानी ll 1 ll
मोहन कह्यो तुमको या व्रजमें हमे नहीं पहचानी l
ठगी सी रही चेटकसो लाग्यो तब व्याकुल मुख फूरत न बानी ll 2 ll
जा दिनतें चितये री मो तन तादिनतें हरि हाथ बिकानी l
'नंददास' प्रभु यों मन मिलियो ज्यों सागरमें सरित समानी ll 3 ll

साज - आज श्रीजी में सफ़ेद रंग के मलमल पर कमल के चित्रांकन से सुसज्जित पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को श्वेत रंग की मलमल का पिछोड़ा धराया जाता है.

श्रृंगार – आज श्रीजी को छोटा (कमर तक) ऊष्णकालीन हल्का छेड़ान का श्रृंगार धराया जाता है. 
मोती के सर्व आभरण धराये जाते हैं. 
श्रीमस्तक पर श्वेत छज्जेदार पाग  के ऊपर सिरपैंच, लूम, श्वेत मोर चंद्रिका एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में मोती के कर्णफूल धराये जाते हैं. 
श्वेत पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं एवं इसी प्रकार की एक व एक कमल माला हमेल की भांति धरायी जाती हैं.
श्रीहस्त में तीन कमल की कमलछड़ी, चाँदी के वेणुजी एवं एक वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट ऊष्णकाल का एवं गोटी हक़ीक की आते हैं.

Tuesday, 16 June 2026

व्रज - विस २०८३ ज्येष्ठ शुक्ल तृतियाWednesday, 17 June 2026

व्रज - विस २०८३ ज्येष्ठ शुक्ल तृतिया
Wednesday, 17 June 2026

 शरबती मलमल के धोती पटका एवं श्रीमस्तक पर ग्वाल पगा पर पगा चंद्रिका के श्रृंगार 

राजभोग दर्शन – 

कीर्तन – (राग : सारंग)

आज धरी गिरधर पिय धोती
अति झीनी अरगजा भीनी पीतांबर घन दामिनी जोती ll 1 ll
टेढ़ी पाग भृकुटी छबि राजत श्याम अंग अद्भुत छबि छाई l
मुक्तामाल फूली वनराई, 'परमानंद' प्रभु सब सुखदाई ll 2 ll

साज – आज श्रीजी में शरबती रंग की मलमल की, रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी के हांशिया से सुसज्जित पिछवाई धरायी जाती है. 
गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को शरबती रंग की मलमल पर रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित धोती एवं राजशाही पटका धराया जाता है.

श्रृंगार – आज श्रीजी को छोटा (कमर तक) ऊष्णकालीन हल्का श्रृंगार धराया जाता है. 
मोती के सर्व आभरण धराये जाते हैं. 
श्रीमस्तक पर शरबती रंग के ग्वाल पगा पर मोती की लड़, पगा चंद्रिका (मोरशिखा) क़तरा एवं बायीं ओर शीशफूल धराया जाता है. 
श्रीकर्ण में मोती के लोलकबिंदी धराये जाते हैं.
श्वेत पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं.
श्रीहस्त में कमलछड़ी, झीनें लहरियाँ के वेणुजी एवं वेत्रजी धराये जाते हैं.
 पट ऊष्णकाल का व गोटी बाघ बकरी की आती है.

Monday, 15 June 2026

व्रज - विस २०८३ ज्येष्ठ शुक्ल द्वितीया (प्रतिपदा क्षय)Tuesday, 16 June 2026

व्रज - विस २०८३ ज्येष्ठ शुक्ल द्वितीया (प्रतिपदा क्षय)
Tuesday, 16 June 2026

बादली मलमल का आड़बंद एवं श्रीमस्तक पर गोल लटपटी पाग पर गोल चंद्रिका के श्रृंगार

राजभोग दर्शन – 

कीर्तन – (राग : सारंग)

पनिया न जैहोरी आली नंदनंदन मेरी मटुकी झटकिके पटकी l
ठीक दुपहरीमें अटकी कुंजनमें कोऊ न जाने मेरे घटकी ll 1 ll
कहारी करो कछु बस नहि मेरो नागर नटसों अटकी l
‘नंददास’ प्रभुकी छबि निरखत सुधि न रही पनघटकी ll 2 ll

साज - आज श्रीनाथजी में बादली मलमल की पिछवाई धरायी जाती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को बादली मलमल का आड़बंद धराया जाता है. 

श्रृंगार – आज प्रभु को छोटा (कमर तक) ऊष्णकालीन श्रृंगार धराया जाता है. मोती के आभरण धराये जाते हैं. 
श्रीमस्तक पर बादली गोल लटपटी पाग के ऊपर सिरपैंच, गोल चंद्रिका एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. 
श्रीकर्ण में एक जोड़ी कर्णफूल धराये जाते हैं. 
श्वेत पुष्पों की सुन्दर थागवाली दो कलात्मक मालाजी धरायी जाती हैं.
श्रीहस्त में कमलछड़ी, झीने लहरिया के वेणुजी एवं वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट ऊष्णकाल व गोटी हकीक के आते है.

Sunday, 14 June 2026

व्रज - विस २०८३ ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्याMonday, 15 June 2026

व्रज - विस २०८३ ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या
Monday, 15 June 2026

छप्पनभोग (बड़ा) मनोरथ

अधिक ज्येष्ठ मास के अंतिम दिन आज श्रीनाथजी में किन्हीं वैष्णव द्वारा आयोजित छप्पनभोग का मनोरथ होगा.
नियम (घर) का छप्पनभोग वर्ष में केवल एक बार मार्गशीर्ष शुक्ल पूर्णिमा को ही होता है. इसके अतिरिक्त विभिन्न खाली दिनों में वैष्णवों के अनुरोध पर श्री तिलकायत महाराज की आज्ञानुसार मनोरथी द्वारा छप्पनभोग मनोरथ आयोजित होते हैं.
इस प्रकार के मनोरथ सभी वैष्णव मंदिरों एवं हवेलियों में होते हैं जिन्हें सामान्यतया ‘बड़ा मनोरथ’ कहा जाता है.

बड़ा मनोरथ के भाव से श्रीजी मंदिर के सभी मुख्य द्वारों की देहरी को हल्दी से लीपी जाती हैं एवं आशापाल की वंदनमाल बाँधी जाती हैं.

आज दो (राजभोग व संध्या आरती) समय की आरती थाली की आती हैं.

मणिकोठा, डोल-तिबारी, रतनचौक आदि में छप्पनभोग के भोग साजे जाते हैं अतः श्रीजी में मंगला के पश्चात सीधे राजभोग अथवा छप्पनभोग (भोग सरे पश्चात) के दर्शन ही खुलते हैं.

छप्पन भोग के भाव से श्रीजी को गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में विशेष रूप से दूधघर में सिद्ध की गयी केसर युक्त बासोंदी की हांडी व शाकघर में सिद्ध चार विविध प्रकार के फलों के मीठा अरोगाये जाते हैं.
राजभोग की अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता एवं सखड़ी में मीठी सेव, केसरयुक्त पेठा व पाँच-भात (मेवा-भात, दही-भात, राई-भात, श्रीखंड-भात, वड़ी-भात) अरोगाये जाते हैं.

छप्पनभोग दर्शन में प्रभु सम्मुख 25 बीड़ा सिकोरी (सोने का जालीदार पात्र) में रखे जाते है.

राजभोग दर्शन – 

कीर्तन – (राग : सारंग)

मदन गोपाल गोवर्धन पूजत l
बाजत ताल मृदंग शंखध्वनि मधुर मधुर मुरली कल कूजत ll 1 ll
कुंकुम तिलक लिलाट दिये नव वसन साज आई गोपीजन l
आसपास सुन्दरी कनक तन मध्य गोपाल बने मरकत मन ll 2 ll
आनंद मगन ग्वाल सब डोलत ही ही घुमरि धौरी बुलावत l
राते पीरे बने टिपारे मोहन अपनी धेनु खिलावत ll 3 ll
छिरकत हरद दूध दधि अक्षत देत असीस सकल लागत पग l
‘कुंभनदास’ प्रभु गोवर्धनधर गोकुल करो पिय राज अखिल युग ll 4 ll

साज – श्रीजी में आज छप्पनभोग के भाव की गौमाता वाली, किनारी के हांशिया से सुसज्जित पिछवाई धरायी है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की है.

वस्त्र – आज प्रभु को चंदनी मलमल का छाप वाला पिछोड़ा धराया है.

श्रृंगार – आज श्रीजी को वनमाला का (चरणारविन्द तक) हल्का श्रृंगार धराया है. मोती के सर्व आभरण धराये हैं.
श्रीमस्तक पर मोती के टिपारा के ऊपर घेरा व गौकर्ण धराये हैं. श्रीकर्ण में कुंडल धराये हैं.
पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी हैं.
श्रीहस्त में कमलछड़ी, सूवा के वेणुजी एवं वेत्रजी धराये हैं.
पट लाल व गोटी बाघ बकरी की है.

Saturday, 13 June 2026

व्रज - विस २०८३ अधिक ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशीSunday, 14 June 2026

व्रज - विस २०८३ अधिक ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी
Sunday, 14 June 2026

गुलाबी मलमल का पिछोड़ा एवं श्रीमस्तक पर मोती का किरीट के श्रृंगार 
                  
श्रीजी में
प्रातः - मोती का बंगला का मनोरथ
प्रियाजी में
प्रातः - हटड़ी का मनोरथ

राजभोग दर्शन – 

कीर्तन – (राग : सारंग)

आज ठाड़े लाल मुकुट धरे l
वदन लसत मकराकृत कुंडल रतिपति मन जु हरे ll 1 ll
अरुन अधर और चिबुक चारु बन्यो दुलरी मोहन माल गरे l
अति सुगंध और चंदन खोर किये पहोंची मोतीन की लरे ll 2 ll
कर मुरली कटि लाल काछनी किंकणी नूपुर शब्द करे l
गुन भरे ‘कृष्णदास’ प्रभु राधा निरख नेन ईत ऊत न टरे ll 3 ll

साज - आज श्रीजी में गुलाबी जालीदार पिछवाई धरायी है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफेद बिछावट की है.

वस्त्र – श्रीजी को आज गुलाबी मलमल का पिछोड़ा धराया है.

श्रृंगार – आज प्रभु को वनमाला के (चरणारविन्द तक) ऊष्णकालीन हल्का श्रृंगार धराया है. मोती के सर्व आभरण धराये हैं.
श्रीमस्तक पर मोती का किरीट पान धराया है.
श्रीकर्ण में मोती के कुंडल धराये हैं. कली आदि की माला धराई है. पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी भी धरायी हैं. श्रीहस्त में कमलछड़ी, चांदी के वेणुजी एवं वेत्रजी धराये हैं.
पट गोटी ऊष्णकाल के राग-रंग के हैं.

व्रज - विस २०८३ ज्येष्ठ शुक्ल षष्ठी Saturday, 20 June 2026

व्रज - विस २०८३ ज्येष्ठ शुक्ल षष्ठी  Saturday, 20 June 2026 बादली मलमल का आड़बंद एवं श्रीमस्तक पर छज्जेदार पाग पर तुर्रा के श्रृंगार राजभोग ...