By Vaishnav, For Vaishnav

Monday, 9 March 2026

व्रज - चैत्र कृष्ण षष्ठी

व्रज - चैत्र कृष्ण षष्ठी 
Monday, 09 March 2026

बैंगनी ज़री के चाकदार वागा, श्रीमस्तक पर ग़्वाल पगा पर पगा चंद्रिका के शृंगार

राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : सारंग)

बैठे हरि राधासंग कुंजभवन अपने रंग
कर मुरली अधर धरे सारंग मुख गाई ll
मोहन अतिही सुजान परम चतुर गुननिधान
जान बुझ एक तान चूक के बजाई ll 1 ll
प्यारी जब गह्यो बीन सकल कला गुनप्रवीन
अति नवीन रूपसहित वही तान सुनाई ll
वल्लभ गिरिधरनलाल रिझ दई अंकमाल
कहत भलें भलें लाल सुन्दर सुखदाई ll 2 ll

साज – श्रीजी में आज बैंगनी ज़री की हांशिया से सुसज्जित पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – श्रीजी को आज बैंगनी ज़री का रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित सूथन, चोली, चाकदार वागा धराये जाते हैं. ठाड़े वस्त्र अमरसी रंग के धराये जाते हैं.

श्रृंगार – प्रभु को आज छोटा (कमर तक) हल्का श्रृंगार धराया जाता है. हीरा के सर्व आभरण धराये जाते हैं.
 श्रीमस्तक पर बैंगनी ज़री के ग्वाल पगा पर सिरपैंच, पगा चंद्रिका, रुपहली लूम,तुर्रा एवं बायीं ओर शीशफूल धराया जाता है. 
श्रीकर्ण में लोलकबिंदी धराये जाते हैं.
 श्वेत एवं पीले पुष्पों की गुलाबी थागवाली दो सुन्दर मालाजी व कमल माला धरायी जाती हैं.
 श्रीहस्त में हरे मीना के वेणुजी एवं वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट लाल व गोटी चाँदी की आती है.

संध्या-आरती दर्शन के उपरांत श्रीकंठ के आभरण बड़े कर छेड़ान के (छोटे) आभरण धराये जाते हैं. शयन दर्शन में श्रीमस्तक पर पगा रहे लूम-तुर्रा नहीं आवे.

Saturday, 7 March 2026

व्रज - चैत्र कृष्ण पंचमी

व्रज - चैत्र कृष्ण पंचमी 
Sunday, 08 March 2026

रंग पंचमी

विशेष – आज की पंचमी को रंग-पंचमी कहा जाता है. उत्तर भारत में विशेषकर मध्य-प्रदेश, राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में आज के दिन सूखे और गीले रंगों से होली खेली जाती है.
पुष्टिसंप्रदाय के अलावा अन्य मर्यादामार्गीय मंदिरों में आज रंगपंचमी को प्रभु स्वरूपों को होली खेलायी जाती है और आगामी चैत्र कृष्ण एकादशी को डोल झुलाये जाते है.

श्री गुसांईजी के चतुर्थ पुत्र श्री गोकुलनाथजी माला-तिलक रक्षण हेतु कश्मीर पधारे थे. श्री गोवर्धनधरण प्रभु ने आपको वसंत खेलाने और डोल झुलाने की आज्ञा की. 
आपश्री डोल पश्चात पधारे और लौटने में विलम्ब होने से प्रभु ने पुनः अपनी इच्छा दोहराई अतः आपने उस वर्ष श्रीजी को आज के दिन पुनः वसंत खेलाये और आगामी एकादशी को डोल झुलाये.

श्री गोवर्धनधरण प्रभु जतीपुरा से राजस्थान पधारे उपरांत राजस्थान की रंग-बिरंगी संस्कृति से प्रेरित श्री दामोदरलालजी महाराज ने अपनी कुमारावस्था में फाग की सवारी का प्रारंभ किया.

इस सवारी के चित्रांकन वाली पिछवाई आज श्रीजी में साजी जाती है. यह पिछवाई इसके अतिरिक्त कुंज-एकादशी के दिन शयन समय भी साजी जाती है.

आज नियम का मुकुट-काछनी का श्रृंगार धराया जाता है. इस श्रृंगार के विषय में मैं पहले भी कई बार बता चुका हूँ कि प्रभु को मुख्य रूप से तीन लीलाओं (शरद-रास, दान और गौ-चारण) के भाव से मुकुट का श्रृंगार धराया जाता है.

अधिक गर्मी एवं अधिक सर्दी के दिनों में मुकुट नहीं धराया जाता इस कारण देव-प्रबोधिनी से फाल्गुन कृष्ण सप्तमी (श्रीजी का पाटोत्सव) तक एवं अक्षय तृतीया से रथयात्रा तक मुकुट नहीं धराया जाता.

जब भी मुकुट धराया जाता है वस्त्र में काछनी धरायी जाती है. काछनी के घेर में भक्तों को एकत्र करने का भाव है.

जब मुकुट धराया जाये तब ठाड़े वस्त्र सदैव श्वेत रंग के होते हैं. ये श्वेत वस्त्र चांदनी छटा के भाव से धराये जाते हैं.

जिस दिन मुकुट धराया जाये उस दिन विशेष रूप से भोग-आरती में सूखे मेवे के टुकड़ों से मिश्रित मिश्री की कणी अरोगायी जाती है.

राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : सारंग)

कुंजभवन तें निकसे माधो राधापे चले मेलि गले बांह l
जब प्यारी अरसाय पियासो मंदमंद त्यों स्वेदकन वदन निहारत करत मुकुटकी छांह ll 1 ll
श्रमित जान पटपीत छोरसों पवन ढुरावे व्रजवधु वनमांह l
‘जगन्नाथ कविराय’ प्रभुको प्यारी देखत नयन सिराह ll 2 ll

साज - आज श्रीजी में हाथी के ऊपर सवारी, पृष्ठभूमि में महल, व्रजभक्तों के साथ होली खेल आदि के चित्रांकन वाली सुन्दर पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – श्रीजी को आज पतंगी ज़री की दोनों काछनी सुथन, रास-पटका एवं मेघश्याम दरियाई वस्त्र की चोली धराये जाते हैं. सभी वस्त्र रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित होते हैं. ठाड़े वस्त्र सफेद लट्ठा के धराये जाते हैं.

श्रृंगार - श्रीजी को आज वनमाला (चरणारविन्द तक) का भारी श्रृंगार धराया जाता है. गुलाबी मीना के सर्व आभरण धराये जाते हैं. 
श्रीमस्तक पर मीना की मुकुट टोपी के ऊपर मीना का मुकुट एवं बायीं ओर शीशफूल धराया जाता है. 
श्रीकर्ण में मयूराकृति कुंडल धराये जाते हैं. बायीं ओर मोती की शिखा (चोटी) धरायी जाती है.
श्रीकंठ में कली, कस्तूरी व कमल माला धरायी जाती है. 
श्वेत एवं गुलाबी पुष्पों की विविध पुष्पों की थागवाली दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती है.
श्रीहस्त में पुष्पछड़ी, झीने लहरिया के वेणुजी दो वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट लाल व गोटी नाचते मोर की आती है.

संध्या-आरती दर्शन उपरांत प्रभु के श्रीकंठ के आभरण, मुकुट, टोपी, पीताम्बर, चोली व दोनों काछनी बड़े किये जाते हैं.

शयन दर्शन में मेघश्याम चाकदार वागा व लाल तनी ऐव लाल गोल पाग धरायी जाती है. पुष्प के आभरण एव श्रीमस्तक के ऊपर पुष्प के लूम-तुर्रा धराये जाते हैं.

Friday, 6 March 2026

व्रज - चैत्र कृष्ण चतुर्थी

व्रज - चैत्र कृष्ण चतुर्थी
Saturday, 07 March 2026

मेघश्याम ज़री के घेरदार वागा एवं श्रीमस्तक पर गोल पाग पर गोल बाक़ी चंद्रिका के श्रृंगार 

राजभोग दर्शन – 

कीर्तन – (राग : सारंग)

बैठे हरि राधासंग कुंजभवन अपने रंग
कर मुरली अधर धरे सारंग मुख गाई ll
मोहन अतिही सुजान परम चतुर गुननिधान
जान बुझ एक तान चूक के बजाई ll 1 ll
प्यारी जब गह्यो बीन सकल कला गुनप्रवीन
अति नवीन रूपसहित वही तान सुनाई ll
वल्लभ गिरिधरनलाल रिझ दई अंकमाल
कहत भलें भलें लाल सुन्दर सुखदाई ll 2 ll

साज – आज श्रीजी में फ़िरोज़ी ज़री की पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी के ऊपर सफ़ेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को मेघश्याम ज़री का सूथन, चोली एवं घेरदार वागा धराये जाते हैं. ठाडे वस्त्र पीले रंग के धराये जाते हैं.

श्रृंगार – आज प्रभु को हल्का श्रृंगार धराया जाता है. मोती के सर्व आभरण धराये जाते हैं.
 श्रीमस्तक पर मेघश्याम ज़री की गोल पाग के ऊपर सिरपैंच, गोल बाक़ी चंद्रिका एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में एक जोड़ी कर्णफूल धराये जाते हैं.
 गुलाबी पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं.
 श्रीहस्त में पुष्पछड़ी, चाँदी के वेणुजी एवं एक वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट मेघश्याम एवं गोटी चाँदी की आती है. 

संध्या-आरती दर्शन के उपरांत श्रीकंठ के आभरण बड़े कर छेड़ान के (छोटे) आभरण धराये जाते हैं. शयन दर्शन में श्रीमस्तक पर लूम-तुर्रा रूपहरी धराया जाता है.

Wednesday, 4 March 2026

व्रज - चैत्र कृष्ण द्वितीया

व्रज - चैत्र कृष्ण द्वितीया 
Thursday, 05 March 2026

हरी ज़री के घेरदार वागा, श्रीमस्तक पर गोल पाग पर गोल चंद्रिका के शृंगार

राजभोग दर्शन – 

कीर्तन – (राग : सारंग)

बैठे हरि राधासंग कुंजभवन अपने रंग
कर मुरली अधर धरे सारंग मुख गाई ll
मोहन अतिही सुजान परम चतुर गुननिधान
जान बुझ एक तान चूक के बजाई ll 1 ll
प्यारी जब गह्यो बीन सकल कला गुनप्रवीन
अति नवीन रूपसहित वही तान सुनाई ll
वल्लभ गिरिधरनलाल रिझ दई अंकमाल
कहत भलें भलें लाल सुन्दर सुखदाई ll 2 ll

साज – आज श्रीजी में हरी ज़री की पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी के ऊपर सफ़ेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को हरे रंग की ज़री का सूथन, चोली एवं घेरदार वागा धराये जाते हैं. ठाडे वस्त्र गुलाबी रंग के धराये जाते हैं.

श्रृंगार – आज प्रभु को मध्य का (घुटने तक) हल्का श्रृंगार धराया जाता है. गुलाबी मीना के सर्व आभरण धराये जाते हैं.
 श्रीमस्तक पर हरे रंग की गोल पाग के ऊपर सिरपैंच, चमकनी गोल-चन्द्रिका एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में एक जोड़ी हीरा के कर्णफूल धराये जाते हैं.
श्रीकंठ में दो दुलड़ा धराये जाते हैं.
 गुलाबी पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं.
 श्रीहस्त में पुष्पछड़ी, गुलाबी मीना के वेणुजी एवं एक वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट हरा एवं गोटी चाँदी की आती है. 

संध्या-आरती दर्शन के उपरांत श्रीकंठ के आभरण बड़े कर छेड़ान के (छोटे) आभरण धराये जाते हैं. शयन दर्शन में श्रीमस्तक पर लूम-तुर्रा रूपहरी धराया जाता है.

Tuesday, 3 March 2026

व्रज - चैत्र कृष्ण प्रतिपदा

व्रज - चैत्र कृष्ण प्रतिपदा 
Wednesday, 04 March 2026

लाल नेक भवन हमारे आवो ।
जो मांगो सो देहो मोहन ले मुरली कल गावो ।।१।।
मंगलचार करो गृह मेरे संगके सखा बुलावो ।
करो विनोद सुंदर युवतीनसों प्रेम पीयूष पीवावो ।।२।।
बलबल जाऊं मुखारविंदकी ललित त्रिभंग दीखावो ।
परमानंद सहचरी रसभर ले चली करत उपावो ।।३।।

द्वितीया पाट

आज प्रभु को नियम के सुनहरी ज़री के चाकदार वस्त्र और श्रीमस्तक पर हीरा की कुल्हे पर सुनहरी घेरा धराये जाते हैं.

उत्सव के कारण गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में चाशनी लगे पक्के गुंजा अरोगाये जाते हैं. इसके अतिरिक्त प्रभु को दूधघर में सिद्ध की गयी केसर युक्त बासोंदी की हांडी का भोग भी अरोगाया जाता है. 

राजभोग में अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता अरोगाया जाता है.

श्रृंगार दर्शन 

साज – आज श्रीजी में फूलक शाही ज़री की हरे हांशिया वाली पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी के ऊपर से सफेदी बड़ी कर (हटा) दी जाती है. उत्सव के दिवसों में मलमल के गादी-तकियों में सफ़ेद बिछावट नहीं की जाती इसलिए ऐसा कहा जाता है.

वस्त्र – आज श्रीजी को सुनहरी ज़री के बिना किनारी के सूथन, चोली एवं चाकदार वागा धराये जाते हैं. पटका रूपहरी ज़री का धराया जाता हैं. ठाडे वस्त्र मेघश्याम रंग के धराये जाते हैं.

श्रृंगार – आज प्रभु को वनमाला का (चरणारविन्द तक) भारी श्रृंगार धराया जाता है. मिलवा – हीरा की प्रधानता के मोती, माणक, पन्ना एवं जड़ाव स्वर्ण के सर्व आभरण धराये जाते हैं.
 श्रीमस्तक पर जड़ाव स्वर्ण की कुल्हे के ऊपर सुनहरी जड़ाव का घेरा एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में हीरा के मकराकृति कुंडल धराये जाते हैं. बायीं ओर हीरा की चोटीजी धरायी जाती है.
नीचे सात पदक ऊपर हीरा, पन्ना, माणक, मोती के हार व माला धराये जाते हैं. कली, कस्तूरी आदि माला धरायी जाती हैं.
 चैत्री गुलाब के पुष्प की सुन्दर थागवाली वनमाला धरायी जाती है.
 श्रीहस्त में पुष्पछड़ी, हीरा के वेणुजी एवं दो वेत्रजी धराये जाते हैं. 
पट उत्सव का एवं गोटी जड़ाऊ की आती है. 
आरसी चार झाड़ की दिखाई जाती है. 

Monday, 2 March 2026

व्रज - फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा

व्रज - फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा 
Tuesday, 03 March 2026

मनमोहन अद्भुत डोल बनी ।
तुम झुलो हों हरख झुलाऊं वृन्दावन चंद धनी ।।१।।
परम विचित्र रच्यो विश्वकर्मा हीरा लाल मनी ।
चतुर्भुज प्रभु गिरिधरन लाल छबि कापे जात गनी ।।२।।

होली का उत्सव / होलिका प्रदीपन / दोलोत्सव ( डोल का उत्सव) 

सामान्यतया होलिकोत्सव तिथी प्रधान होने से फ़ाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा के दिन और डोलोत्सव नक्षत्र प्रधान होने के कारण जिस दिन सूर्योदय के समय उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र होवे उस दिन मनाया जाता है. इस वर्ष आज के दिन होलिकोत्सव तथा डोलोत्सव दोनों का संयोग बना है.

ये दोनों उत्सव प्रभु के आनन्द के हैं, नियम के हैं अतः श्रीजी में होलिकोत्सव के राग, भोग व श्रृंगार का सम्पूर्ण सेवाक्रम डोलोत्सव के एक दिन पूर्व अर्थात कल फाल्गुन शुक्ल चतुर्दशी को लिया गया. 

आज डोलोत्सव अर्थात काम पर प्रभु की विजय का उत्सव मनाया जाएगा.

परम्परानुसार मंदिर दोलोत्सव के पश्चात ख़ासा (साफ़) किया जायेगा.

पुष्टिमार्ग में दोलोत्सव को काम-विजय उत्सव भी कहा जाता है. 
बसंत-पंचमी (जिसे मदन-पंचमी भी कहा जाता है) पर कामदेव का प्रादुर्भाव हुआ और उन्होंने हमारे योगेश्वर प्रभु श्रीकृष्ण को अपने अर्थात काम के वश में करने की ठानी. 
गुलाल, अबीर, चोवा, चन्दन, अरगजा आदि सुगन्धित साधन एवं रंग कामोद्दीपक माने जाते हैं और प्रतिदिन इनके प्रयोग से प्रभु काम के वश में होंगे ये कामदेव का भ्रम था. 
इसके अलावा स्त्री वेश (विविध भांति की चोलियाँ) आदि पहना कर भी कामदेव ने प्रभु को काम के वश में करने की कुचेष्टा की परन्तु श्री कृष्ण को योगेश्वर ऐसे ही नहीं कहा जाता. 
कुछ वाद्य यंत्रों की ध्वनि भी कामोद्दीपक मानी जाती है अतः ढप, ढ़ोल बजा कर, रसिया (बैठे और ठाडे), धमार और अमर्यादित गालियाँ गाकर प्रभु को भोगी सिद्ध करने का निरर्थक प्रयास किया. 
अंततोगत्वा चालीस दिन के निरर्थक प्रयास के पश्चात कामदेव ने प्रभु से क्षमा मांगी. तब योगेश्वर प्रभु श्रीकृष्ण ने दोलोत्सव के रूप में काम-विजय उत्सव मनाया. आज सबसे अधिक गुलाल काम पर विजय के भाव से उड़ायी जाती है.

सभी वैष्णवों को दोलोत्सव की ख़ूबख़ूब बधाईयाँ

आज श्रीजी को सफ़ेद जामदानी का सूथन, चोली तथा घेरदार वागा धराये जाते हैं. मोठड़ा का पटका, श्रीमस्तक पर चिल्ला की छज्जेदार पाग पर मोर चन्द्रिका धरायी जाती है.

प्रभु को गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में केसरी चन्द्रकला, केशर-युक्त बासोंदी की हांडी व विविध फलों के मीठा अरोगाये जाते हैं.
राजभोग की अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता, सखड़ी में मीठी सेव व केसरी पेठा अरोगाये जाते हैं.

राजभोग दर्शन – 

कीर्तन – (राग : सारंग)

डोल झुलावत लाल बिहारी,नाम लेले बोले लालन
प्यारी ।
हे दुल्हा दुलहनी दुलारी सुंदर सरस कुमारी ।।
नखसिख सुंदर सिंगारी केसु कुसुम सुहस्त सम्हारी ।
श्याम कंचुकी सुरंग सारी चाल चले छबि न्यारी।।१।।
वारंवार बदन निहारी अलक तिलक झलमलारी ।
रीझ रीझ लाल ले बलिहारी पुलकित भरत अंकवारी ।।
कोककला निपुन नारी कंठ सरस सुरहि भारी ।
सुयश गावत लाल बिहारी बिहारिन की बलिहारी ।।२।।

राजभोग दर्शन –

साज - आज श्रीजी में राजभोग में सफ़ेद मलमल की चार तह की सादी पिछवाई धरायी जाती है जिसके ऊपर गुलाल व अबीर से भारी खेल किया जाता है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है. गुलाल खेल इतना अधिक होता है कि पिछवाई और साज का मूल रंग दिखायी ही नहीं पड़ता.

वस्त्र – आज श्रीजी को सफ़ेद जामदानी के सूथन, चोली तथा घेरदार वागा धराये जाते हैं. पटका मोठड़ा का धराया जाता है जिसके दोनों छोर आगे की ओर रहते हैं. सभी वस्त्रों पर गुलाल अबीर, एवं चोवा आदि से भारी खेल किया जाता है. ठाडे वस्त्र लाल रंग के धराये जाते हैं जिनपर गुलाल, अबीर आदि से खेल किया जाता है. प्रभु के कपोल और दाढ़ी भी रंगे जाते हैं.  

श्रृंगार – आज प्रभु को वनमाला का (चरणारविन्द तक) हल्का श्रृंगार धराया जाता है. लाल, हरे, सफ़ेद व मेघश्याम मीना एवं जड़ाव स्वर्ण के सर्व आभरण धराये जाते हैं.
 श्रीमस्तक पर सफ़ेद चिल्ला की छज्जेदार पाग के ऊपर सिरपैंच, मोरपंख की सादी चन्द्रिका एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में जड़ाऊ के चार कर्णफूल धराये जाते हैं.
श्रीकंठ में नीचे दस पदक ऊपर ग्यारह माला सोने एवं मोती की धरायी जाती हैं.
श्रीकंठ में चंद्रहार एवं हमेल आदि धराये जाते हैं.
 गुलाबी पुष्पों की दो सुन्दर थागवाली बड़ी मालाजी धरायी जाती हैं. श्रीहस्त में पुष्पछड़ी, स्वर्ण के वेणुजी एवं दो वेत्रजी (स्वर्ण के बटदार व एक नाहरमुखी) धराये जाते हैं. पीठिका के ऊपर भी गुलाब के पुष्पों की एक मोटी मालाजी धरायी जाती है. 
पट चीड़ का व गोटी चांदी की आती है. आरसी दोनों समय बड़ी डांडी की आती है.
 भारी खेल के कारण सर्व श्रृंगार रंगों से सरोबार हो जाते हैं और प्रभु की छटा अद्भुत प्रतीत होती है. 

दोलोत्सव

दोलोत्सव महामहोत्सव कहलाता है. श्री चन्द्रावली जी की सेवा का यह मुख्य उत्सव है. श्री हरिराय महाप्रभु की दोलोत्सव भावना के अनुसार यह अत्यंत गोपनीय लीला है. 

श्री वृषभानजी एवं श्री कीर्तिजी प्रभु श्री कृष्ण को अपने यहाँ आमंत्रित करते हैं. अपने जंवाई को आमंत्रित कर विविध प्रकार की सामग्रियां अरोगाते हैं एवं तत्पश्चात गुलाल, अबीर छांटकर होली खेलाते हैं. 
इस भाव से श्री नवनीतप्रियाजी आज प्रथम राजभोग में श्रीजी की गोदी में विराजते हैं. बाद में प्रभु नंदालय में पधारते हैं जहाँ नंदरायजी एवं यशोदाजी उन्हें अपने वात्सल्यरस से खेलाते हैं और विविध सामग्रियां अरोगाते हैं. तत्पश्चात निकुंज में, वृन्दावन में, श्री गोवर्धन की तलहटी में (जहाँ सुन्दर झरने बह रहे हैं, सदा बसंत खिला रहता है, वातावरण में शीतल सुगन्धित पवन बह रही है, अनेक प्रकार की माधुरी लताएँ, द्रुम बेलें, पुष्प एवं फलों से युक्त खिल रहे हैं) सुन्दर डोल (पुष्प पत्तियों से निर्मित झूले) की रचना व्रजभक्त करते हैं. श्री ठाकुरजी को डोल में पधराकर व्रजभक्त झुलाते हैं. प्रभु भक्तों के मनोरथ-पूरक हैं और अपने भक्तों के मनोरथ पूर्ण करने के लिए सर्व स्थानों पर डोल झूलते हैं. डोल के चार दर्शन होते हैं.

श्री नवनीतप्रियाजी आज अपने मंदिर में गुलाल नहीं खेलते हैं. वहां कल रात्रि को ही गुलाल साफ़ कर ली गयी है. आज श्री नवनीतप्रियाजी पलना नहीं होता और लाड़ले लाल प्रभु अपने घर राजभोग अरोग कर श्रीजी में पधारते हैं और श्रीजी की गोदी में विराजित होते हैं. 

 प्रथम नियम के राजभोग सरे उपरान्त डोल का अधिवासन किया जाता है.
पूज्य श्री तिलकायत महाराजश्री अथवा मुखियाजी आरती करते हैं, सूक्ष्म खेल होता है. यह दर्शन सामान्य वैष्णवों के लिये बाहर नहीं खोले जाते. 

डोलतिबारी के पीछे के दो खण्डों (जहाँ श्रावण मास में हिंडोलना बंधता है) में डोल (एक पुष्प-पत्तियों से निर्मित झूला) बाँधा जाता है जिसमें श्री नवनीतप्रियाजी विराजित हो डोल झूलते हैं और आगे के एक खंड में वैष्णव दर्शनों का लाभ लेते हैं. दर्शनों के दौरान दोनों ओर से अनवरत अबीर, गुलाल उड़ाए जाते हैं और अत्यधिक मात्रा में उड़ाए जाते हैं जिससे डोल तिबारी में अँधेरा सा छा जाता है.

उसके बाद अन्य तीन भोग में प्रभु उत्सव भोग अरोगते हैं और भोग सरे पश्चात बाहर दर्शन भी देते हैं.
शंखोदक, धूप, दीप होते हैं. दूसरे भोग सरते हैं, दर्शन खुलते हैं, पहली पान की बीड़ी अरोगायी जाती है. पिछवाई, चंदुवा छांटे जाते हैं और भारी खेल होता है.

 फिर दूसरी पान की बीड़ी अरोगायी जाती हैं, उसी क्रम से खेल होता है, गुलाल, अबीर उड़ाए जाते हैं. पुष्प उड़ाए जाते हैं और धूप, दीप, शंखोदक होते हैं.
इसके उपरांत तीसरे भोग आते हैं जिसमें दूसरे भोग से दोगुने भोग आते हैं.

उत्सव भोग में श्रीजी को कड़क मठड़ी, सेव गोली (छोटे लड्डू), कूर के पकागुंजा, कड़क शक्करपारा, मनोर (इलायची-जलेबी) के लड्डू, मेवाबाटी, केशरी चन्द्रकला, रसखोरा, दूधघर में सिद्ध मावे के पेड़ा-बरफी, दूधपूड़ी, बासोंदी, जीरा मिश्रित दही, केसरी-सफेद मावे की गुंजिया, घी में तला हुआ चालनी का सूखा मेवा, विविध प्रकार के संदाना (आचार) के बटेरा, श्रीखंडवड़ी, छाछवड़ा, कांजीवड़ा, विविध प्रकार के फलफूल, शीतल आदि अरोगाये जाते हैं.

भोग सरते हैं, नयी मालाजी धरायी जाती है, ऊपर के क्रम में दो-दो पान की बीड़ी अरोगायी जाती हैं. गुलाल खेल होता है, आरती होती है.

चौथे भोग आते हैं, वही क्रम से खेल व दर्शन होते हैं.

उसके बाद श्री नवनीतप्रियाजी श्रीजी की गोदी में बिराजते हैं, आरती होती है, भारी खेल होता है और लालन अपने घर पधार जाते हैं.

मंगला के पश्चात श्रृंगार, ग्वाल व प्रथम भोग भीतर होते हैं., तीसरे और चौथे भोग के दर्शन बाहर खुलते हैं.

Sunday, 1 March 2026

व्रज - फाल्गुन शुक्ल चतुर्दशी

व्रज - फाल्गुन शुक्ल चतुर्दशी 
Monday, 02 March 2026

होली का उत्सव

आज प्रभु को नियम से पाग-चन्द्रिका, सूथन व घेरदार वागा धराये जाते हैं

फाल्गुन शुक्ल प्रतिपदा से श्रीजी में डोलोत्सव की सामग्रियां सिद्ध होना प्रारंभ हो जाती है. इनमें से कुछ सामग्रियां फाल्गुन शुक्ल नवमी से प्रतिदिन गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में श्रीजी को अरोगायी जाती हैं और डोलोत्सव के दिन भी प्रभु को अरोगायी जायेंगी. 
इस श्रृंखला में आज श्रीजी को गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में मीठे कटपूवा अरोगाये जाते हैं. 
इसके अतिरिक्त आज उत्सव के कारण प्रभु को दूधघर में सिद्ध की गयी केसर युक्त बासोंदी की हांडी का भोग भी अरोगाया जाता है. 

राजभोग में अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता और सखड़ी में मीठी सेव व केशरयुक्त पेठा अरोगाये जाते हैं.

राजभोग खेल में पिछवाई को गुलाल से पूरा रंगा जाता है और उस पर अबीर से चिड़िया मांडी जाती है. चंदवा पर चंदन छांटा जाता है.

श्रीजी की दाढ़ी पर तीन बिंदी लगायी जाती है. प्रभु के सम्मुख चार पान के बीड़ा सिकोरी (स्वर्ण के जालीदार पात्र) में रखे जाते हैं.

आज गुलाल, अबीर का खेल अन्य दिनों की तुलना में अत्यन्त भारी होता है. वैष्णवजनों पर भी गुलाल पोटली भर कर उड़ाई जाती है.

राजभोग दर्शन – 

कीर्तन – (राग : सारंग)

डोल झूलत है प्यारो लाल बिहारी पहोपवृष्टि होती l
सुरपुर गंधर्व तिनकी नारी देखके वारत है लर मोती ll 1 ll
घेरा करत परस्पर सबमिल नहीं देखीयत युवती ऐसी जोती l
‘हरिदास’ के स्वामी श्यामा कुंजबिहारी सादाचूरी खुभी पोती ll 2 ll

साज - आज श्रीजी में राजभोग में सफ़ेद मलमल की सादी पिछवाई धरायी जाती है जिसके ऊपर गुलाल व अबीर से भारी खेल किया जाता है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है. गुलाल खेल इतना अधिक होता है कि पिछवाई और साज का मूल रंग दिखायी ही नहीं पड़ता.  

वस्त्र – आज श्रीजी को सफ़ेद लट्ठा का सूथन, चोली तथा घेरदार वागा धराये जाते हैं. पटका मोठड़ा का धराया जाता है जिसके दोनों छोर आगे की ओर रहते हैं. 
सभी वस्त्रों पर गुलाल अबीर, एवं चोवा आदि से भारी खेल किया जाता है. ठाडे वस्त्र लाल रंग के धराये जाते हैं जिनपर गुलाल, अबीर आदि से खेल किया जाता है. 

श्रृंगार – आज प्रभु को मध्य का (छेड़ान से दो आंगुल नीचे तक) हल्का श्रृंगार धराया जाता है. लाल, हरे, सफ़ेद व मेघश्याम मीना एवं जड़ाव स्वर्ण के सर्व आभरण धराये जाते हैं. श्रीमस्तक पर सफ़ेद छज्जेदार श्याम झाईं वाली पाग के ऊपर हरा पट्टीदार सिरपैंच, मोरपंख की सादी चन्द्रिका एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में कर्णफूल धराये जाते हैं. 
श्रीकंठ में सात पदक, नौ माला धरायी जाती है. दो माला अक्काजी की धरायी जाती है. गुलाबी पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं. श्रीहस्त में पुष्पछड़ी, स्वर्ण के वेणुजी एवं दो वेत्रजी (स्वर्ण के बटदार व एक नाहरमुखी) धराये जाते हैं. पीठिका के ऊपर भी गुलाब के पुष्पों की एक मोटी मालाजी धरायी जाती है. 
पट चीड़ का व गोटी चांदी की आती है. आरसी दोनों समय बड़ी डांडी की आती है.
भारी खेल के कारण सर्व श्रृंगार रंगों से सरोबार हो जाते हैं और प्रभु की छटा अद्भुत प्रतीत होती है. 

संध्या-आरती दर्शन उपरांत श्रीकंठ व श्रीमस्तक के आभरण बड़े किये जाते हैं. श्रीमस्तक पर लूम-तुर्रा सुनहरी धराये जाते हैं. गठेली की हमेल धरायी जाती है.

शयन दर्शन में परंपरानुसार पूज्य श्री तिलकायत महाराज अथवा चिरंजीवी श्री विशाल बावा साहब प्रभु श्री गोवर्धनधरण की दाढ़ी रंगते हैं अर्थात प्रेम से प्रभु की दाढ़ी पर गुलाल लगाकर डोलोत्सव की परंपरागत शुरुआत करेंगे.

आज के दिन शयन में भी गुलाल खेल होता है और खूब गुलाल उड़ायी जाती है. आज शयन दर्शन में प्रभु को एक वेत्र श्रीहस्त में धरायी जाती है जिससे प्रभु व्रजभक्तों को घेर सके.

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