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Monday, 24 August 2026

व्रज -विस २०८३ श्रावण शुक्ल द्वादशी (द्वितीया)Tuesday, 25 August 2026

व्रज -विस २०८३ श्रावण शुक्ल द्वादशी (द्वितीया)
Tuesday, 25 August 2026

पवित्रा द्वादशी

आज पवित्रा द्वादशी है.
श्रावण शुक्ल एकादशी की मध्यरात्रि को स्वयं ठाकुरजी ने प्रकट होकर श्री महाप्रभुजी को दैवीजीवों को ब्रह्म-सम्बन्ध देने की आज्ञा दी. 
इस प्रकार श्रावण शुक्ल द्वादशी के दिन श्रीवल्लभ ने सब से प्रथम ब्रह्म-सम्बन्ध वैष्णव दामोदर दास हरसानी को दिया. तब से एकादशी का दिन सभी वैष्णवों में पुष्टिमार्ग की स्थापना दिवस-समर्पण दिवस के रूप में मनाया जाता है. 

श्री महाप्रभुजी को स्वयं श्रीजी ने ब्रह्म-सम्बन्ध देने की आज्ञा प्रदान की इस कारण सभी वैष्णवों को वल्लभ कुल के बालकों से ही ब्रह्म-सम्बन्ध लेना चाहिए, किसी अन्य साधु-संत आदि से नहीं लिया जाना चाहिए. 
वल्लभ कुल के बालक श्री महाप्रभुजी की ओर से ब्रह्म-सम्बन्ध देते हैं अतः पुष्टिमार्ग के गुरु श्री महाप्रभुजी हैं.

जिस प्रकार हिन्दू धर्म के अन्य सम्प्रदायों में आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा (गुरु पूर्णिमा) को गुरु का पूजन किया जाता है उसी प्रकार पुष्टिमार्गीय वैष्णव संप्रदाय में आज के दिन गुरु का पूजन किया जाता है.

सभी वैष्णव आज के दिन श्री ठाकुरजी को पवित्रा धराये पश्चात अपने ब्रह्म-सम्बन्ध देने वाले गुरु को पवित्रा, यथाशक्ति भेंट आदि धरें एवं दंडवत करें इसके पश्चात वैष्णवों को परस्पर प्रसादी मिश्री देकर ‘जय श्री कृष्ण’ कहें. 

यदि गुरु किसी अन्य स्थान पर हों अर्थात उनके साक्षात् चरणस्पर्श दंडवत संभव न हों तो उन्हें पवित्रा व भेंट किसी भी रीती (पोस्ट से, कुरियर से अथवा किसी व्यक्ति के साथ) भेजें. भेंट भी भविष्य में साक्षात् होने पर उनके सम्मुख रखें.

यदि गुरु नित्यलीलास्थ हो गए हों तो ही उनके चित्र पर पवित्रा धराकर कर दंडवत करें, भेंट धरें और उपरांत उनके पुत्र को, उनके परिवार के किन्ही अन्य सदस्य को अथवा किसी अन्य गोस्वामी बालक जिनके आप संपर्क में हों उनको भेंट कर दें.

राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : सारंग)

सब ग्वाल नाचे गोपी गावे l प्रेम मगन कछु कहत न आवे ll 1 ll
हमारे राय घर ढोटा जायो l सुनि सब लोक बधाये आयो ll 2 ll
दूध दधि घृत कांवरि ढोरी l तंदुल डूब अलंकृत रोरी ll 3 ll
हरद दूध दधि छिरकत अंगा l लसत पीत पट बसन सुरंगा ll 4 ll
ताल पखावज दुंदुभि ढोला l हसत परस्पर करत कलोला ll 5 ll
अजिर पंक गुलफन चढि आये l रपटत फिरत पग न ठहराये ll 6 ll
वारि वारि पटभूषन दीने l लटकत फिरत महारस भीने ll 7 ll
सुधि न परे को काकी नारी l हसि हसि देत परस्पर तारी ll 8 ll
सुर विमान सब कौतिक भूले l मुदित त्रिलोक विमोहित फूले ll 9 ll

साज – आज श्रीजी में सफेद रंग की मलमल की धोरेवाली (थोड़े-थोड़े अंतर से रुपहली ज़री लगायी हुई) सुनहरी ज़री की हांशिया (किनारी) वाली पिछवाई धरायी जाती है. पिछवाई में सात स्वरूप श्री महाप्रभुजी श्रीजी को पवित्रा धरा रहे हैं एवं श्री गुसाई जी मोरछल की सेवा कर रहे हैं ऐसा सुन्दर चित्रांकन किया गया है. गादी और तकिया के ऊपर सफेद बिछावट की जाती है तथा स्वर्ण की रत्नजड़ित चरणचौकी के ऊपर हरी मखमल मढ़ी हुई होती है. पीठिका के ऊपर व इसी प्रकार से पिछवाई के ऊपर रेशम के रंग-बिरंगे पवित्रा धराये जाते हैं.

वस्त्र – श्रीजी को आज गुलाबी मलमल का रुपहली किनारी से सुसज्जित पिछोड़ा धराया जाता है. ठाड़े वस्त्र हरे रंग के धराये जाते हैं.

श्रृंगार – श्रीजी को आज छोटा (मध्य से दो अंगुल ऊपर) हल्का श्रृंगार धराया जाता है. 
पन्ना एवं सोने के आभरण धराये जाते हैं. एक कली की माला धरायी जाती है.
श्रीमस्तक पर पतंगी रंग की छज्जेदार पाग के ऊपर सिरपैंच, लूम, पन्ना वाली चमकनी चन्द्रिका एवं बायीं ओर शीशफूल धराया जाता है. 
श्रीकर्ण में पन्ना के चार कर्णफूल धराये जाते हैं. 
श्वेत पुष्पों की रंग-बिरंगी थाग वाली दो मालजी एवं विविध प्रकार के रंग-बिरंगे पवित्रा मालाजी के रूप में धराये जाते हैं. 
श्रीहस्त में कमलछड़ी, पन्ना के वेणुजी एवं दो वैत्रजी (एक पन्ना व एक सोने के) धराये जाते हैं.
पट गुलाबी, गोटी छोटी सोने की आती है.
आरसी शृंगार में लाल मख़मल की एवं राजभोग में सोना की डांडी की आती हैं.

Sunday, 23 August 2026

व्रज – विस २०८३ श्रावण शुक्ल एकादशीMonday, 24 August 2026

व्रज – विस २०८३ श्रावण शुक्ल एकादशी
Monday, 24 August 2026

पवित्रा पहेरत राजकुमार ।
तीन्यो लोक पवित्र कीये है श्रीविट्ठल गिरिधार ।।१।।
आती ही पवित्र प्रिया बहु विलसत निरख मगन भयों मार ।
परमानंद पवित्रा की माला गोकुल की ब्रजनार ।।२।।

पुत्रदा एकादशी (पवित्रा एकादशी)

आज प्रभु को नियम का सफेद मलमल का केशर की कोर का पिछोड़ा और श्रीमस्तक पर श्वेत मलमल की सुनहरी किनारी की कुल्हे के ऊपर तीन मोरपंख की चन्द्रिका की जोड़ धरायी जाती है.
आज से पूनम तक प्रतिदिन श्रृंगार समय मिश्री की गोल डली का भोग अरोगाया जाता है.

गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में विशेष रूप से श्रीजी को मनमनोहर (केशर-इलायची बूंदी), मेवाबाटी (सूखे मेवे से भरा खस्ता ठोड़) एवं दूधघर में सिद्ध की गयी केसर युक्त बासोंदी की हांडी अरोगायी जाती है.
राजभोग में अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता, सखड़ी में मीठी सेव व केशरयुक्त पेठा दोहरा अरोगाये जाते हैं.

आज उत्थापन के समय पवित्रा का अधिवासन होगा, धूप, दीप, शंखोदक किये जाएंगे और कुछ समय उपरांत पंखे का टेरा लेकर श्रीजी को पवित्रा धराये जायेंगे. 

पवित्रा धराये उपरांत उत्सव भोग धरे जायेंगे जिसमें विशेष रूप से मिश्री की गोल डलियाँ (सफ़ेद व केसरयुक्त), छुट्टी बूंदी, खस्ता शक्करपारा, दूधघर में सिद्ध मावे के पेड़ा-बरफी, दूधपूड़ी (मलाई-पूड़ी), केशर-युक्त बासोंदी, जीरा-युक्त दही, घी में तला बीज-चालनी के सूखे मेवे, विविध प्रकार के संदाना (आचार), विविध प्रकार के फलफूल, शीतल आदि अरोगाये जाते हैं.
आज प्रभु को उत्सव भोग में सभी गृहों से पधारी मिश्री भी अरोगायी जाती है.

भोग समय फीका के स्थान पर घी में तला बीज-चालनी का सूखा मेवा आरोगाया जाता है.

कल पवित्रा द्वादशी है. 
श्रावण शुक्ल एकादशी की मध्यरात्रि को स्वयं ठाकुरजी ने प्रकट होकर श्री महाप्रभु जी को दैवीजीवों को ब्रह्म सम्बन्ध देने की आज्ञा दी. 
इस प्रकार श्रावण शुक्ल द्वादशी के दिन श्रीवल्लभ ने सब से प्रथम ब्रह्म-सम्बन्ध वैष्णव दामोदर दासजी हरसानी को दिया. 
तब से आज का दिन सभी वैष्णवों में पुष्टिमार्ग की स्थापना दिवस-समर्पण दिवस के रूप में मनाया जाता है. 
पुष्टिमार्ग में गुरु का पूजन कल अर्थात श्रावण शुक्ल द्वादशी को किया जाता है. 
कल के दिन श्री ठाकुरजी को पवित्रा धराये पश्चात अपने ब्रह्म-सम्बन्ध देने वाले गुरु को पवित्रा, यथाशक्ति भेंट आदि धरें एवं दंडवत करें इसके पश्चात वैष्णवों को परस्पर पवित्रा धर के ‘जय श्री कृष्ण’ कहें. परस्पर प्रसादी मिश्री का प्रसाद लेवें.
श्री महाप्रभुजी को स्वयं श्रीजी ने ब्रह्म सम्बन्ध देने की आज्ञा प्रदान की इस कारण सभी वैष्णवों को श्री वल्लभ कुल के बालकों से ही ब्रह्म सम्बन्ध लेना चाहिए, किसी अन्य साधु-संत आदि से नहीं लिया जाना चाहिए. 
श्री वल्लभ कुल के बालक श्री महाप्रभुजी की ओर से ब्रह्म सम्बन्ध देते हैं. पुष्टिमार्ग के गुरु श्री महाप्रभुजी हैं.

राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : सारंग)

हेरि है आज नंदराय के आनंद भयो l
नाचत गोपी करत कुलाहल मंगल चार ठयो ll 1 ll
राती पीरी चोली पहेरे नौतन झुमक सारी l
चोवा चंदन अंग लगावे सेंदुर मांग संवारी ll 2 ll
माखन दूध दह्यो भरिभाजन सकल ग्वाल ले आये l
बाजत बेनु पखावज महुवरि गावति गीत सुहाये ll 3 ll
हरद दूब अक्षत दधि कुंकुम आँगन बाढ़ी कीच l
हसत परस्पर प्रेम मुदित मन लाग लाग भुज बीच ll 4 ll
चहुँ वेद ध्वनि करत महामुनि पंचशब्द ढ़म ढ़ोल l
‘परमानंद’ बढ्यो गोकुलमे आनंद हृदय कलोल ll 5 ll

साज – श्रीजी में आज सफेद डोरिया के वस्त्र पर धोरे (थोड़े-थोड़े अंतर से सुनहरी ज़री के धोरा वाली), सुनहरी ज़री की किनारी के हांशिया से सुसज्जित पिछवाई धरायी जाती है. 
गादी और तकिया के ऊपर सफेद बिछावट की जाती है तथा स्वर्ण की रत्नजड़ित चरणचौकी के ऊपर हरी मखमल मढ़ी हुई होती है.

चित्र में पीठिका के ऊपर व इसी प्रकार से पिछवाई के ऊपर रेशम के रंग-बिरंगे पवित्रा द्रश्य है.

वस्त्र – श्रीजी को आज सफेद केसर की किनारी का पिछोड़ा धराया जाता है. ठाड़े वस्त्र लाल रंग के होते हैं.

श्रृंगार - प्रभु को आज वनमाला का (चरणारविन्द से दो अंगुल ऊंचा) उत्सव का भारी श्रृंगार धराया जाता है. 
मिलवा हीरे की प्रधानता के मोती, माणक, पन्ना एवं जड़ाव स्वर्ण के आभरण धराये जाते हैं. 
श्रीमस्तक पर सफेद कुल्हे के ऊपर सिरपैंच, तीन मोरपंख की चन्द्रिका की जोड़ एवं बायीं ओर शीशफूल धराया जाता है. 
श्रीकर्ण में हीरे के मकराकृति कुंडल धराये जाते हैं. चित्र में रंग-बिरंगे पवित्रा मालाजी के रूप में द्रश्य हैं.
नीचे पाँच पदक ऊपर हीरा, पन्ना, माणक, मोती के हार व दुलडा धराया जाता हैं.कली की मालाजी धरायी जाती है.
श्रीहस्त में कमलछड़ी, हीरा के वेणुजी एवं दो वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट उत्सव का, गोटी सोने की जाली की  आती है.
आरसी शृंगार में चार झाड़ की एवं राजभोग में सोना की डांडी की आती हैं.

Saturday, 22 August 2026

व्रज – श्रावण शुक्ल एकादशी (पुत्रदा एकादशी व्रत कल द्वादशी को)Sunday, 23 August 2026

व्रज – श्रावण शुक्ल एकादशी (पुत्रदा एकादशी व्रत कल द्वादशी को)
Sunday, 23 August 2026

पवित्रा एकादशी के आगम का श्रृंगार

कल पवित्रा एकादशी का उत्सव है अतः आज श्रीजी को उत्सव के एक दिन पूर्व धराया जाने वाला आगम का हल्का श्रृंगार धराया जाता है. 

सामान्य तौर पर प्रत्येक बड़े उत्सव के एक दिन पूर्व लाल वस्त्र, पीले ठाड़े वस्त्र एवं पाग-चन्द्रिका का श्रृंगार धराया जाता है. 
यह श्रृंगार अनुराग के भाव से धराया जाता है. इस श्रृंगार के लाल वस्त्र विविध ऋतुओं के उत्सवों के अनुरूप होते हैं अर्थात ऊष्णकाल में जब गहरे रंग वर्जित हों तब कुछ हल्के और शुभ रंग के गुलाबी वस्त्र धराये जाते हैं. 

राजभोग दर्शन – 

कीर्तन – (राग : धनाश्री)

यशोदारानी जायो है सुत नीको l
आनंदभयो सकल गोकुलमे गोपवधू लाई टीको ll 1 ll
अक्षत दूब रोचन बंदन नंदे तिलक दही को l
अंचल बारि बारि मुख निरखत कमल नैन प्यारो जीकौ ll 2 ll
अपने अपने भवन से निकसी पहेरे चीर कसुम्भी को l
'यादवेन्द्र' व्रजकुल प्रति पालक कंस काल भय भीकौ ll 3 ll 

साज – श्रीजी में आज लाल रंग की मलमल पर रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी के हांशिया से सुसज्जित पिछवाई धरायी जाती है. गादी और तकिया के ऊपर सफेद बिछावट की जाती है तथा स्वर्ण की रत्नजड़ित चरणचौकी के ऊपर हरी मखमल मढ़ी हुई होती है. 

वस्त्र – श्रीजी को आज लाल रंग की मलमल का  सुनहरी किनारी का पिछोड़ा धराया जाता है. ठाड़े वस्त्र पीले रंग के होते हैं. 

श्रृंगार – प्रभु को आज छोटा (कमर तक) हल्का श्रृंगार धराया जाता है. पन्ना एवं सोने के सर्व आभरण धराये जाते हैं. 

श्रीमस्तक पर लाल रंग की छज्जेदार पाग के ऊपर सिरपैंच, लूम, मोरपंख की सादी चन्द्रिका एवं बायीं ओर शीशफूल धराया जाता है. 
श्रीकर्ण में पन्ना के कर्णफूल के दो जोड़ी धराये जाते हैं.
आज कमल माला धरायी जाती हैं.
 श्वेत पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं.
 श्रीहस्त में कमलछड़ी, हरे मीना के वेणुजी एवं वेत्रजी (एक स्वर्ण का) धराये जाते हैं. 
पट लाल, गोटी छोटी सोने की व आरसी श्रृंगार में सोना की आती है.

Friday, 21 August 2026

व्रज -विस 2083 श्रावण शुक्ल दशमीSaturday, 22 August 2026

व्रज -विस 2083 श्रावण शुक्ल दशमी
Saturday, 22 August 2026

लाल पीली एकदानी चूंदड़ी का पिछोड़ा और श्रीमस्तक पर ग्वाल पगा पर पगा चन्द्रिका के श्रृंगार 

राजभोग दर्शन – 

कीर्तन – (राग : धनाश्री)

यशोदारानी जायो है सुत नीको l
आनंदभयो सकल गोकुलमे गोपवधू लाई टीको ll 1 ll
अक्षत दूब रोचन बंदन नंदे तिलक दही को l
अंचल बारि बारि मुख निरखत कमल नैन प्यारो जीकौ ll 2 ll
अपने अपने भवन से निकसी पहेरे चीर कसुम्भी को l
'यादवेन्द्र' व्रजकुल प्रति पालक कंस काल भय भीकौ ll 3 ll 

साज - प्रभु को लाल पीली एकदानी चूंदड़ी की पिछवाई है. गादी और तकिया के ऊपर सफेद बिछावट की है तथा स्वर्ण की रत्नजड़ित चरणचौकी के ऊपर हरी मखमल मढ़ी हुई है.

वस्त्र – आज प्रभु को लाल पीली एकदानी चूंदड़ी का पिछोड़ा धराया है. ठाड़े वस्त्र हरे रंग के धराये हैं.

श्रृंगार – आज श्रीजी को छेड़ान का (कमर तक) श्रृंगार धराया है.
मोती के आभरण धराये हैं.
श्रीमस्तक पर लाल पीली एकदानी चूंदड़ी के ग्वाल पगा के ऊपर पगा चन्द्रिका धरायी है.
श्रीकर्ण में मोती के लोलकबिन्दी लड़ वाले कर्णफूल धराये हैं. कमल माला धरायी है.
पुष्पों की सुन्दर थाग वाली दो सुन्दर मालाजी धरायी हैं.
श्रीहस्त में कमलछड़ी, चांदी के वेणुजी एवं दो वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट लाल का गोटी बाघ बकरी की है.

Thursday, 20 August 2026

व्रज -विस २०८३ श्रावण शुक्ल नवमीFriday, 21 August 2026

व्रज -विस २०८३ श्रावण शुक्ल नवमी
Friday, 21 August 2026

नित्यलीलास्थ गौस्वामी तिलकायत श्री गोविन्दलालजी महाराज कृत सप्तस्वरूपोत्सव

श्रीजी को नियम से केसरी रंग की गोल-काछनी (मोर-काछनी), श्रीमस्तक पर गुलाबी गौ-कर्ण एवं स्वर्ण का रत्नजड़ित घेरा धराया जाता है. यह वस्त्र और श्रृंगार वर्ष में केवल आज के दिन ही धराये जाते हैं.

श्रीजी को गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में विशेष रूप से मूँग की दाल की मोहनथाल एवं दूधघर में सिद्ध की गयी केसर युक्त बासोंदी की हांडी अरोगायी जाती है. राजभोग में अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता अरोगाया जाता है.

राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : सारंग)

विहरत सातो रूप धरे l
सदा प्रकट श्रीवल्लभनंदन द्विज कुल भक्ति वरे ll 1 ll
श्रीगिरिधर राजाधिराज व्रजराज उध्योत करे l
श्रीगोविन्द इंदु जग किरणन सींचन सुधा करे ll 2 ll
श्रीबालकृष्ण लोचन विशाल देख मन्मथ कोटि डरे l
गुण लावण्य दयाल करुणानिधि गोकुलनाथ भरे ll 3 ll
श्रीरघुपति यदुपति घनसांवल मुनिजन शरण परे l
‘छीतस्वामी’ गिरिधर श्रीविट्ठल तिहि भज अखिल तरे ll 4 ll

साज – श्रीजी में आज श्याम रंग की गौस्वामी बालकों तथा गायों के सुन्दर चित्रांकन और रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी के हांशिया से सुसज्जित पिछवाई धरायी जाती है जिसमें श्रीजी के दोनों ओर सभी सप्तस्वरूप विराजित हैं और पास में उनके आचार्यचरण सेवा में उपस्थित हैं ऐसा सुन्दर चित्रांकन है 

गादी और तकिया के ऊपर सफेद बिछावट की जाती है तथा स्वर्ण की रत्नजड़ित चरणचौकी के ऊपर हरी मखमल मढ़ी हुई होती है.

वस्त्र – श्रीजी को आज केसरी रंग की मलमल की सूथन, गोल-काछनी (मोर काछनी) तथा रास-पटका धराया जाता है. सभी वस्त्र रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित होते हैं. ठाड़े वस्त्र मेघश्याम रंग के होते हैं.

श्रृंगार – प्रभु को आज वनमाला (चरणारविन्द तक) का भारी श्रृंगार धराया जाता है. हीरे की प्रधानता से मोती, माणक, पन्ना एवं जड़ाव सोने के आभरण धराये जाते हैं.
 श्रीमस्तक पर केसरी रंग की जडाऊ टिपारे की टोपी के ऊपर लाल रंग के सुनहरी किनारी वाले गौकर्ण, स्वर्ण का रत्नजड़ित घेरा एवं बायीं ओर मोती की चोटी धरायी जाती है. श्रीकर्ण में हीरा के मकराकृति कुंडल धराये जाते हैं. 
श्रीकंठ में कली,कस्तूरी आदि की माला आती हैं.नीचे सात पदक ऊपर हीरा, पन्ना, माणक, मोती के हार व दुलडा धराया जाता हैं. दो पाटन वाले हार धराये जाते हैं.
सफेद एवं पीले पुष्पों के रंग-बिरंगी थागवाली दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती है. श्रीहस्त में कमलछड़ी, हीरे के वेणुजी एवं दो वेत्रजी धराये जाते हैं.पट उत्सव का एवं गोटी सोना की बाघ-बकरी की आती हैं.
आरसी शृंगार में चार झाड़ की एवं राजभोग में सोना की डांडी की आती हैं. 

Wednesday, 19 August 2026

व्रज -विस २०८३ श्रावण शुक्ल अष्टमीThursday,20 August 2026

व्रज -विस २०८३ श्रावण शुक्ल अष्टमी
Thursday,20 August 2026

 बगीचा उत्सव (श्री नवनीतप्रियाजी)

विशेष – आज श्री नवनीतप्रियाजी में बगीचा उत्सव होगा. आज के दिन प्रभु श्री नवनीतप्रियाजी श्रीजी मंदिर में स्थित श्री महाप्रभुजी की बैठक वाले बगीचे में विहार एवं झूलने को पधारते हैं. 
व्रज में नन्दगाँव के पास नंदरायजी का बगीचा है जहाँ नंदकुमार खेलने एवं झूलने के लिए पधारते थे इस भाव से आज बैठक के बगीचे को नंदरायजी का बगीचा मानकर श्री नवनीतप्रियाजी वहां झूलने पधारते हैं. 
श्री नवनीतप्रियाजी वर्ष में दो बार (आज के दिन व फाल्गुन शुक्ल अष्टमी) के दिन महाप्रभु की बैठक स्थित इस बगीचे में पधारते हैं.
आज द्वितीय गृह पिठाधीश्वर श्री कृष्णरायजी (1857) का प्राकट्योंत्सव
होने से श्रीजी को धराये जाने वाले आज के वस्त्र द्वितीय गृहाधीश्वर प्रभु श्री विट्ठलनाथजी के घर (मंदिर) से सिद्ध हो कर आते हैं. वस्त्रों के साथ श्रीजी और श्री नवनीतप्रियाजी के भोग हेतु बूंदी के लड्डुओं की छाब भी वहीँ से आती है. 

नित्यलीलास्थ श्री कृष्णरायजी से जुड़ा एक प्रसंग मुझे स्मरण है जिसे मैं आपसे साझा करना चाहूँगा. 
निधि स्वरुप विराजित हैं तो वैसे भी घर का वैभव बढ़ ही जाता है परन्तु तब प्रभु श्री विट्ठलनाथजी की कृपा से द्वितीय गृह अत्यन्त वैभवपूर्ण स्वरुप में था और तत्समय श्रीजी में अत्यधिक ऋण हो गया. 
जब आपको यह ज्ञात हुआ तब आपने अपना अहोभाग्य मान कर प्रभु सुखार्थ अपना द्रव्य समर्पित किया और प्रधान पीठ को ऋणमुक्त कराया.

आप द्वारा की गयी इस अद्भुत सेवा के बदले में श्रीजी कृपा से आपको कार्तिक शुक्ल नवमी (अक्षय नवमी) की श्रीजी की की पूरे दिन की सेवा और श्रृंगार का अधिकार प्राप्त हुआ था. 
आज भी प्रभु श्री गोवर्धनधरण द्वितीय गृह के बालकों के हस्त से अक्षय नवमी के दिन की सेवा अंगीकार करते हैं.

राजभोग दर्शन – 

कीर्तन – (राग : गोड मल्हार)

माईरी घन मृदंग रसभेदसो बाजत नाचत चपला चंचल गति l
कोकिला अलापत पपैया उरपलेत मोर सुघर सूर साजत ll 1 ll
दादुर तालधार ध्वनि सुनियत रुनझुन रुनझुन नुपूर बाजत l
‘तानसेन’ के प्रभु तुम बहु नायक कुंज महेल दोउ राजत ll 2 ll

साज – वर्षाऋतु में बादलों की घटा एवं बिजली की चमक के मध्य यमुनाजी के किनारे कुंज में एक ओर श्री ठाकुरजी एवं दूसरी ओर स्वामिनीजी को व्रजभक्त झूला झुला रहे हैं. प्रभु की पीठिका के आसपास सोने के हिंडोलने का सुन्दर भावात्मक चित्रांकन किया है जिसमें ऐसा प्रतीत होता है कि प्रभु स्वर्ण हिंडोलना में झूल रहे हों, ऐसे सुन्दर चित्रांकन से सुशोभित पिछवाई आज श्रीजी में धरायी जाती है. 
गादी और तकिया के ऊपर सफेद बिछावट की जाती है तथा स्वर्ण की रत्नजड़ित चरणचौकी के ऊपर हरी मखमल मढ़ी हुई होती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को पीले रंग की मलमल की सुनहरी ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित सूथन, काछनी एवं रास पटका धराया जाता है. ठाड़े वस्त्र श्वेत डोरीया के धराये जाते है.

श्रृंगार - प्रभु को आज वनमाला (चरणारविन्द तक) का भारी श्रृंगार धराया जाता है. सर्वआभरण फ़ीरोज़ा के धराये जाते हैं.
 श्रीमस्तक पर सिलमा सितारा का मुकुट व टोपी एवं बायीं ओर शीशफूल धराया जाता है.
 श्रीकर्ण में फ़ीरोज़ा के मयूराकृति कुंडल धराये जाते हैं. चोटीजी मीना की आती हैं.श्रीकंठ में कली,कस्तूरी आदि की माला आती हैं.
पीले पुष्पों के रंग-बिरंगी थाग वाली दो सुन्दर मालाजी एवं कमल के फूल की मालाजी धरायी जाती है.
श्रीहस्त में एक कमल की कमलछड़ी, 
 भाभीजी वाले वेणुजी एवं दो वेत्रजी (एक सोना का) धराये जाते हैं.
पट पिला एवं गोटी मोर वाली धराई जाती हैं.

देखो माई भीज़त गिरिधरधारी,
मोर मुकुट तन श्याम पीत पट घनदामिनी अनुहारी.

Monday, 17 August 2026

व्रज - विस २०८३ श्रावण शुक्ल षष्ठी Tuesday, 17 August 2026

व्रज - विस २०८३ श्रावण शुक्ल षष्ठी 
Tuesday, 17 August 2026

रूपहरी किनारी के धोरा के गुलाबी सुथन, फेंटा और पटका के श्रृंगार 

श्रीजी ने अपने सभी भक्तों को आश्रय दिया है, मान दिया है चाहे वो किसी भी जाति या धर्म से हो. 
इसी भाव से आज ठाकुर जी अपनी अनन्य मुस्लिम भक्त ताज़बीबी की भावना से सूथन-पटका का श्रृंगार धराते हैं. यह श्रृंगार ताज़बीबी की विनती पर सर्वप्रथम भक्तकामना पूरक श्री गुसांईजी ने धराया था. 

ताज़बीबी की ओर से यह श्रृंगार वर्ष में लगभग छह बार धराया जाता है यद्यपि इस श्रृंगार को धराने के दिन निश्चित नहीं हैं.

ताज़बीबी बादशाह अकबर की बेग़म, प्रभु की भक्त और श्री गुसांईजी की परम-भगवदीय सेवक थी. उन्होंने कई कीर्तनों की रचना भी की है और उनके सेव्य स्वरुप श्री ललितत्रिभंगी जी वर्तमान में गुजरात के पोरबंदर में श्री रणछोड़जी की हवेली में विराजित हैं.

संध्या-आरती में श्री मदनमोहन जी सोना के हिंडोलने में झूलते हैं. उनके सभी वस्त्र श्रृंगार श्रीजी के जैसे ही होते हैं. आज श्री बालकृष्णलाल जी भी उनकी गोदी में विराजित हो झूलते हैं.

राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : तोडी)

देख गजबाज़ आज वृजराज बिराजत गोपनके शीरताज ।
देस देस ते खटदरसन आवत मनवा छीत कूल पावत 
किरत अपरंपार ऊंचे चढ़े दान जहाज़ ।।१।।
सुरभि तिल पर्वत अर्ब खर्ब कंचन मनी दीने, सो सुत हित के काज ।
हरि नारायण श्यामदास के प्रभु को नाम कर्म करावन,
महेर मुदित मन बंधि है धर्म की पाज ।।२।।

साज - श्रीजी में आज गुलाबी रंग की मलमल पर रूपहरी ज़री की तुईलैस की किनारी की धोरेवाली पिछवाई धरायी जाती है. गादी और तकिया के ऊपर सफ़ेद बिछावट की जाती है और चरणचौकी के ऊपर हरी मखमल जड़ी होती है.

वस्त्र - श्रीजी को आज गुलाबी रंग के धोरा का सुथन और राजशाही पटका धराया जाता है. दोनों वस्त्र रूपहरी ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित होते हैं. ठाड़े वस्त्र मेघस्याम रंग के होते हैं.

शृंगार - ठाकुरजी को आज मध्य का (घुटने तक) हल्का श्रृंगार धराया जाता है. सर्व आभरण फ़िरोज़ा के छेड़ान के धराये जाते हैं. श्रीमस्तक पर गुलाबी फेंटा का साज धराया जाता है जिसमें गुलाबी रंग के फेंटा के ऊपर सिरपैंच, बीच की चंद्रिका, कतरा एवं बायीं ओर शीशफूल धराया जाता है.
 श्रीकर्ण में लोलकबंदी लड़ वाले कर्णफूल धराये जाते हैं. 
श्वेत एवं पीले पुष्पों की रंग-बिरंगी कलात्मक थागवाली दो मालाजी धरायी जाती हैं.
 श्रीहस्त में एक कमल की कमलछड़ी, फ़िरोज़ी मीना के वेणुजी और दो वेत्रजी(एक सोना का) धराये जाते हैं.
पट गुलाबी रंग का व गोटी बाघ-बकरी की आती है.

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