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Friday, 24 July 2026

व्रज - विस २०८३ आषाढ़ शुक्ल एकादशी Saturday, 25 July 2026

व्रज - विस २०८३ आषाढ़ शुक्ल एकादशी 
Saturday, 25 July 2026

देवशयनी एकादशी (चातुर्मास नियमारम्भ)

मुकुट-काछनी का श्रृंगार

विशेष – आज देवशयनी एकादशी है. 
सनातन धर्म में एकादशी का महत्वपूर्ण स्थान है. प्रत्येक वर्ष चौबीस एकादशी होती हैं.

आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को ही देवशयनी एकादशी कहा जाता है. कहीं-कहीं इस तिथि को 'पद्मनाभा' भी कहते हैं. 

सूर्य के मिथुन राशि में आने पर ये एकादशी आती है. इसी दिन से चातुर्मास का आरंभ माना जाता है. इस दिन से भगवान विष्णु क्षीरसागर में शयन करते हैं और फिर लगभग चार माह बाद तुला राशि में सूर्य के जाने पर उन्हें जगाया जाता है. 
उस दिन को देव प्रबोधिनी एकादशी (देवोत्थापन) कहा जाता है. इस बीच के अंतराल को चातुर्मास कहा जाता है. 

आज से चार माह अर्थात देव प्रबोधिनी एकादशी तक विवाहादि कुछ शुभ कार्य वर्जित होते हैं.

आज श्रीजी को लगभग तीन माह पश्चात इस ऋतु का प्रथम मुकुट-काछनी का श्रृंगार धराया जायेगा.

जब भी मुकुट धराया जाता है वस्त्र में काछनी धरायी जाती है. काछनी के घेर में भक्तों को एकत्र करने का भाव है. 

जब मुकुट धराया जाये तब ठाड़े वस्त्र सदैव श्वेत रंग के होते हैं. ये श्वेत वस्त्र चांदनी छटा के भाव से धराये जाते हैं. 

ज्येष्ठ और आषाढ़ मास की चारों एकादशियों में श्रीजी को गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में लिचोई (मिश्री के बूरे और इलायची पाउडर से सज्जित पतली पूड़ी) अरोगायी जाती है.

इसके अतिरिक्त आज विशेष रूप से द्वितीय गृहाधीश्वर प्रभु श्री विट्ठलनाथजी के घर से अनसखड़ी में श्रीजी के अरोगने हेतु मांडा (मीठी रोटी) और आमरस की सामग्री पधारती हैं जो कि प्रभु को संध्या-आरती में अरोगायी जाती है.

राजभोग दर्शन -

कीर्तन – (राग : मल्हार)

माईरी श्यामघन तन दामिनी दमकत पीताम्बर फरहरे l
मुक्ता माल बगजाल कही न परत छबी विशाल मानिनीकी अरहरे ll 1 ll
मोर मुकुट इन्द्रधनुष्यसो सुभग सोहत मोहत मानिनी धुत थरहरे l
‘कृष्णजीवन’ प्रभु पुरंदर की शोभा निधान मुरलिका की घोर घरहरे ll 2 ll

साज – आज श्रीजी में फ़िरोज़ी मलमल की पतंगी हाशिये की पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की गयी है.

वस्त्र – श्रीजी को आज फ़िरोज़ी रंग का सूथन, काछनी (पतंगी हांशिया की) तथा फ़िरोज़ी रंग का पतंगी हांशिया का रास-पटका धराया जाता है. ठाड़े वस्त्र श्वेत डोरिया के धराये जाते हैं.

श्रृंगार – प्रभु को आज वनमाला (चरणारविन्द तक) का ऊष्णकालीन हल्का श्रृंगार धराया जाता है. मोती के आभरण धराये जाते हैं. 
श्रीमस्तक पर मोती का अद्वितीय मुकुट तथा बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में मयुराकृति कुंडल धराये जाते हैं. 
स्वरुप की बायीं ओर मोती की चोटी धरायी जाती है. 
कली आदि सभी माला धरायी जाती हैं. श्वेत पुष्पों की रंग-बिरंगी थागवाली दो मालाजी धरायी जाती हैं. 
श्रीहस्त में कमलछड़ी, गंगा-जमनी (सोने-चांदी) के वेणुजी एवं दो वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट ऊष्णकाल का व गोटी बड़ी हकीक की आती है.

उत्थापन दर्शन पश्चात नियम का मोगरे की कली का शृंगार 

Thursday, 23 July 2026

व्रज – विस २०८३ आषाढ़ शुक्ल दशमीFriday, 24 July 2026

व्रज – विस २०८३ आषाढ़ शुक्ल दशमी
Friday, 24 July 2026

पीले मलमल का लाल हाशिये का आड़बंद एवं श्रीमस्तक पर पिली छज्जेदार पाग पर क़तरा के श्रृंगार 

राजभोग दर्शन

कीर्तन – (राग : मल्हार)

हों इन मोरनकी बलिहारी l
जिनकी सुभग चंद्रिका माथे धरत गोवर्धनधारी ll 1 ll
बलिहारी या वंश कुल सजनी बंसी सी सुकुमारी l
सुन्दर कर सोहे मोहन के नेक हू होत न न्यारी ll 2 ll
बलिहारी गुंजाकी जात पर महाभाग्य की सारी l
सदा हृदय रहत श्याम के छिन हू टरत न टारी ll 3 ll
बलिहारी ब्रजभूमि मनोहर कुंजन की अनुहारी l
‘सूरदास’ प्रभु नंगे पायन अनुदिन गैया चारी ll 4 ll

साज – आज श्रीजी में पीले मलमल की लाल हाशिये की पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की गयी है.

वस्त्र – आज श्रीजी को पीले मलमल का लाल हाशिये का आड़बंद धराया जाता है.

श्रृंगार – आज प्रभु को छोटा (कमर तक) ऊष्णकालीन हल्का श्रृंगार धराया जाता है. 
मोती के सर्व आभरण धराये जाते हैं. 
श्रीमस्तक पर पीले रंग की छज्जेदार पाग के ऊपर सिरपैंच, क़तरा एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. 
श्रीकर्ण में एक जोड़ी मोती के कर्णफूल धराये जाते हैं. 
श्वेत पुष्पों एवं तुलसी की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं वहीँ दो मालाजी हमेल की भांति भी धरायी जाती है. 
श्रीहस्त में तीन कमल की कमलछड़ी, सुवा वेणुजी एवं एक वेत्रजी धराये जाते हैं. पट ऊष्णकाल का गोटी हक़ीक की छोटी आती है.

Wednesday, 22 July 2026

व्रज – विस २०८३ आषाढ़ शुक्ल नवमी (द्वितीय)Thursday, 23 July 2026

व्रज – विस २०८३ आषाढ़ शुक्ल नवमी (द्वितीय)
Thursday, 23 July 2026

मल्लकाछ टिपारा का श्रृंगार

मल्लकाछ (मल्ल एवं कच्छ) दो शब्दों से बना है और ये एक विशेष पहनावा है जो आम तौर पर पहलवान मल्ल (कुश्ती) के समय पहना करते हैं. 
सामान्यतया वीर-रस का यह श्रृंगार पराक्रमी प्रभु की चंचलता प्रदर्शित करने की भावना से धराया जाता है.

कीर्तन – (राग : मल्हार)

वृन्दावन कनकभूमि नृत्यत व्रज नृपतिकुंवर l
उघटत शब्द सुमुखी रसिक ग्रग्रतततत ता थेई थेई गति लेत सुधर ll 1 ll
लाल काछ कटि किंकिणी पग नूपुर रुनझुनत बीच बीच मुरली धरत अधर l
‘गोविंद’ प्रभु के जु मुदित संगी सखा करत प्रसंशा प्रेमभर ll 2 ll 

 साज – आज श्रीजी में माखनचोरी लीला के सुन्दर चित्रांकन से सुसज्जित सुन्दर पिछवाई धरायी जाती है जिसमें कृष्ण-बलराम अपने मित्रों के साथ मल्लकाछ-टिपारा का श्रृंगार धराये माखन चोरी कर रहे हैं. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – श्रीजी को आज सुआपंखी मलमल का रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी वाला मल्लकाछ एवं पटका धराया जाता है. इसी प्रकार अंगूरी रंग का रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी वाला पटका भी धराया जाता है. इस श्रृंगार को मल्लकाछ-टिपारा एवं दोहरा पटका का श्रृंगार कहा जाता है. ठाड़े वस्त्र गुलाबी रंग के धराये जाते हैं.

श्रृंगार – आज प्रभु को श्रीकंठ का शृंगार छेड़ान (हल्का) बाक़ी मध्य का (घुटने तक) ऊष्णक़ालीन श्रृंगार धराया जाता है. मोतियों के सर्व आभरण धराये जाते हैं. श्रीमस्तक पर टिपारा का साज (सुआपंखी मलमल की टिपारा की टोपी के ऊपर मध्य में मोरशिखा और दोनों ओर दोहरा कतरा) तथा बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में मयुराकृति कुंडल धराये जाते हैं. 
हांस, त्रवल, पायल कड़ा हस्तसाखलाआदि धराये जाते हैं. श्रीकंठ में श्वेत माला धरायी जाती है. श्वेत पुष्पों की विविध पुष्पों की थागवाली दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती है.
 श्रीहस्त में कमल के फूल की छड़ी, सुवा के वेणुजी तथा दो वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट उष्णकाल का व गोटी हक़ीक की आती है. 

Tuesday, 21 July 2026

व्रज – विस २०८३ आषाढ़ शुक्ल नवमीWednesday, 22 July 2026

व्रज – विस २०८३ आषाढ़ शुक्ल नवमी
Wednesday, 22 July 2026

 आज कछु कुंजनमें बरबासी ।
दलबादरमें देख सखीरी चमकत है चपलासी ।।१।।
न्हेनी न्हेनी बूदंन बरखन लागी पवन चलत सुखरासी ।
मंद मंद गरजन सुनियत है नाचत मोर कलासी ।।२।।

अधरंग (गहरे पतंगी) मलमल की परधनी एवं श्रीमस्तक पर गोल पाग और चमकनी गोल चंद्रिका के श्रृंगार 

राजभोग दर्शन –
 
कीर्तन – (राग : मल्हार)

कुंवर चलोजु आगे गहवरमें जहाँ बोलत मधुरे मोर l
विकसत वनराजी कोकिला करत रोर ।।१।।
मधुरे वचन सुनत प्रीतम के लीनो प्यारी चितचोर l
‘गोविंद’ बलबल पिय प्यारी की जोर ।।२।।

 साज – आज श्रीजी में श्री गिरिराजजी की कन्दरा में निकुंजलीला के सुन्दर चित्रांकन से सुशोभित पिछवाई धरायी जाती है जिसमें श्री स्वामिनीजी, श्री यमुनाजी एवं श्री गोपीजन श्रीप्रभु की सेवा में रत है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी के ऊपर सफ़ेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र - श्रीजी को अधरंग (गहरे पतंगी) मलमल की परधनी धरायी जाती है. ठाड़े वस्त्र नहीं धराये जाते हैं.

श्रृंगार - प्रभु को आज छोटा (कमर तक) ऊष्णकालीन हल्का श्रृंगार धराया जाता है. 
हीरा के सर्व आभरण, श्रीमस्तक पर अधरंग (गहरे पतंगी) रंग की गोल पाग के ऊपर सिरपैंच, लूम तथा चमकनी गोल चंद्रिका और बायीं ओर शीशफूल धराया जाता है.
 श्रीकर्ण में हीरा के कर्णफूल की एक जोड़ी धराये जाते हैं.
पीले पुष्पों की रंगीन थाग वाली दो कलात्मक सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं. इसी प्रकार दो मालाजी हमेल की भांति धरायी जाती है. 
श्रीहस्त में कमलछड़ी, चाँदी के वेणुजी एवं एक वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट ऊष्णकाल का एवं गोटी हक़ीक की आती है.

Monday, 20 July 2026

व्रज – विस २०८३ आषाढ़ शुक्ल अष्टमी Tuesday, 21 July 2026

व्रज – विस २०८३ आषाढ़ शुक्ल अष्टमी 
Tuesday, 21 July 2026

पीले मलमल पर आसमानी हाशियां का पिछोड़ा एवं श्रीमस्तक पर ग्वाल पगा पर पगा चंद्रिका के श्रृंगार 

राजभोग दर्शन – 

साज – (राग : मल्हार)

ढाँय ढाँय नाचत मोर सुन सुन नवधनकी घोर, बोलत है चहुँ और अति ही सुहावने। 
घुमड़त घनघटा निहार आगम सुख जाय विचार,
 चातक पिक मुदित गावत द्रुमन बैठे सुहावने ।।१।।
 नवल वनमें पहरे तन में कसुंभी चीर कनक वरण, श्याम सुभग ओढ़े वसन पीत सुहावने।
 पावस ऋतु को रंग बिलास दास चतुर्भुज प्रभु के संग, 
मोहित कोटि अनंग गिरिधर पिय अंग अंग अतिही सुहावने ।।२।।

साज - श्रीजी में आज श्री गिरिराज जी, श्री यमुना जी, वन एवं उसमे यथेच्छ विहार करते पशु-पक्षियों के चित्रकाम वाली पिछवाई धराई जाती है. गादी,  तकिया एवं चरणचौकी के ऊपर सफेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को पीले मलमल पर आसमानी  हाशियाँ का पिछोड़ा धराया जाता है.

श्रृंगार – आज श्रीजी को छोटा (कमर तक) ऊष्णकालीन हल्का श्रृंगार धराया जाता है. 
मोती के सर्व आभरण धराये जाते हैं. 
श्रीमस्तक पर पीले ग्वाल पगा के ऊपर सिरपैंच, लूम, पगा चंद्रिका एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में एक जोड़ी मोती के कर्णफूल धराये जाते हैं. 
श्वेत पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं.
श्रीहस्त में तीन कमल की कमलछड़ी, सुवा के वेणुजी एवं वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट ऊष्णकाल का एवं गोटी हक़ीक की आते हैं.

Sunday, 19 July 2026

व्रज - विस २०८३ आषाढ़ शुक्ल सप्तमी Monday, 20 July 2026

व्रज - विस २०८३ आषाढ़ शुक्ल सप्तमी 
Monday, 20 July 2026

 आज कछु कुंजनमें बरबासी ।
दलबादरमें देख सखीरी चमकत है चपलासी ।।१।।
न्हेनी न्हेनी बूदंन बरखन लागी पवन चलत सुखरासी ।
मंद मंद गरजन सुनियत है नाचत मोर कलासी ।।२।।

अधरंग (गहरे पतंगी) मलमल के धोती पटका एवं श्रीमस्तक पर गोल पाग पर चमकनी गोल चंद्रिका के श्रृंगार 

राजभोग दर्शन –
 
कीर्तन – (राग : मल्हार)

कुंवर चलोजु आगे गहवरमें जहाँ बोलत मधुरे मोर l
विकसत वनराजी कोकिला करत रोर ।।१।।
मधुरे वचन सुनत प्रीतम के लीनो प्यारी चितचोर l
‘गोविंद’ बलबल पिय प्यारी की जोर ।।२।।

 साज – आज श्रीजी में श्री गिरिराजजी की कन्दरा में निकुंजलीला के सुन्दर चित्रांकन से सुशोभित पिछवाई धरायी जाती है जिसमें श्री स्वामिनीजी, श्री यमुनाजी एवं श्री गोपीजन श्रीप्रभु की सेवा में रत है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी के ऊपर सफ़ेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र - श्रीजी को अधरंग (गहरे पतंगी) मलमल के धोती पटका धरायी जाती है.

श्रृंगार - प्रभु को आज छोटा (कमर तक) ऊष्णकालीन हल्का श्रृंगार धराया जाता है. 
हीरा के सर्व आभरण, श्रीमस्तक पर अधरंग (गहरे पतंगी) रंग की गोल पाग के ऊपर सिरपैंच, लूम तथा चमकनी गोल चंद्रिका और बायीं ओर शीशफूल धराया जाता है.
 श्रीकर्ण में हीरा के कर्णफूल की एक जोड़ी धराये जाते हैं.
पीले पुष्पों की रंगीन थाग वाली दो कलात्मक सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं. इसी प्रकार दो मालाजी हमेल की भांति धरायी जाती है. 
श्रीहस्त में कमलछड़ी, चाँदी के वेणुजी एवं एक वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट ऊष्णकाल का एवं गोटी हक़ीक की आती है.

Saturday, 18 July 2026

व्रज - विस २०८३ आषाढ़ शुक्ल षष्ठी Sunday, 19 July 2026

व्रज - विस २०८३ आषाढ़ शुक्ल षष्ठी 
Sunday, 19 July 2026

देखो माई ये बड़भागी मोर ।
जिनके पंखको मुकुट बनत है सिर धरे नंदकिशोर।।१।।
ये बड़भागी नंद यशोदा पुण्य कीये भर झोर ।
वृंदावन हम क्यों न भई है लागत पग की ओर ।।२।।

कसूंभा (छठ) षष्ठी 

विशेष – आज का दिन पुष्टिमार्ग में विशेषकर पुष्टिमार्ग की प्रधानपीठ नाथद्वारा में अतिविशिष्ट है.

सर्वप्रथम आज श्री वल्लभाचार्यजी के लौकिक पितृचरण श्री लक्ष्मणभट्टजी का प्राकट्योत्सव है.

आज वर्तमान गौस्वामी तिलकायत श्री 108 श्री इन्द्रदमनजी (श्री राकेशजी) महाराजश्री का गादी उत्सव हैं. आज के दिन विक्रम संवत 2057 में आप गादी बिराजे थे.

आज भक्त ईच्छापूरक प्रभु श्रीनाथजी ने श्री गुसाईजी को विप्रयोगानुभव से मुक्त कर, दर्शन दे कर उनकी सेवा को पुनः अंगीकार किया था अतः अनुराग स्वरुप लाल (कसुम्भल) रंग के वस्त्र धराये जाते हैं और प्रभु के यशप्रसार के भाव से ठाड़े वस्त्र श्वेत धराये जाते हैं. आज के दिन ही चन्द्र-सरोवर के विप्र-योग अनुभव के पश्चात् श्री गुंसाईजी का सेवा में पुनः प्रवेश हुआ था. 
अष्टसखा कीर्तनकार कृष्णदासजी ने आज के दिन ही निम्नलिखित प्रसिद्द कीर्तन गाया एवं श्री गुंसाईजी ने कृष्णदासजी को प्रभु से साक्षात् कराया.

“परम कृपाल श्री वल्लभ नंदन करत कृपा निज हाथ दे माथे l
जे जन शरण आय अनुसरही गहे सोंपत श्री गोवर्धननाथ ll 1 ll 
परम उदार चतुर चिंतामणि राखत भवधारा बह्यो जाते l
भजि ‘कृष्णदास’ काज सब सरही जो जाने श्री विट्ठलनाथे ll 2 ll”

इसके अतिरिक्त आज धरायी जाने वाली पिछवाई के सन्दर्भ में एक सुंदर प्रसंग है. 

श्रीजी में आज अपनी गर्दन ऊँची कर कूकते, वर्षाऋतु के आगमन की बधाई देते मयूरों के क़सीदा वाली प्राचीन पिछवाई धरायी जाती है. बहुत कम लोग जानते हैं कि यह दो भागों में बनी हुई है.

कई वर्षों पूर्व एक वैष्णव ने इस पिछवाई का आधा भाग जो कि जापान के एक काफी विशिष्ट कपड़े पर निर्मित था जिसमें गर्दन उठा कर कूकते मयूरों का सुन्दर चित्रांकन था. 
तत्कालीन गौस्वामी तिलकायत श्री गोवर्धनलालजी को ये वस्त्र बहुत पसंद आया और वे इसे प्रभु की पिछवाई के रूप में प्रयोग करना चाहते थे पर प्रभु सेवा में आवश्यक माप से कम होने के कारण यह अनुपयोगी था. 

तब आपने घोषणा की कि जो भी व्यक्ति बिल्कुल ऐसा ही जापानी वस्त्र लायेगा उसे मुँहमाँगा पुरस्कार दिया जायेगा. तब एक गुजराती शिक्षक दम्पति बिलकुल ऐसा ही जापानी वस्त्र लाये और प्रभु में भेंट किया जिसे इस पिछवाई में जोड़कर नाथद्वारा के एक ख्यातनाम चित्रकार ने दुसरे भाग में भी ऐसा ही सुन्दर चित्रांकन किया. 

तबसे यह पिछवाई प्रतिवर्ष इस दिन प्रभु में नियम से धरायी जाती है. यद्यपि अत्यंत प्राचीन होने के कारण यह काफ़ी जर्जर हो चुकी है परन्तु इसकी अद्भुत चित्रकारी का आज भी कोई सानी नहीं है.

सेवाक्रम - उत्सव होने के कारण श्रीजी मंदिर के सभी मुख्य द्वारों की देहरी (देहलीज) को हल्दी से लीपी जाती हैं एवं आशापाल की सूत की डोरी की वंदनमाल बाँधी जाती हैं. 

सभी समय झारीजी में यमुना जल भरा जाता है. दिन में दो समय की आरती थाली में की जाती है.

मंगला में प्रभु को कसुम्भल (लाल) मलमल का उपरना धराया जाता है.
श्रृंगार समय प्रभु को नियम से पठानी किनारी से सुसज्जित कसुम्भल (लाल) मलमल का पिछोड़ा व श्रीमस्तक पर छज्जेदार पाग के ऊपर सादी मोरपंख की चन्द्रिका धरायी जाती है.

श्रीजी को आज गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में विशेष रूप से केशर-युक्त जलेबी के टूक, मनोर (इलायची-जलेबी) के लड्डू और दूधघर में सिद्ध की गयी केसर युक्त बासोंदी की हांडी अरोगायी जाती है. 
राजभोग में अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता व सखडी में मीठी सेव, केसर युक्त पेठा अरोगाये जाते हैं.

श्रीनवनीत प्रियाजी में भी विशेष रूप से सायंकाल शयन भोग में वर्तमान तिलकायत के गादी बिराजने के अवसर पर मनोरथ भोग अरोगाया जाता है जिसमें जलेबी टूक, मनोर के लड्डू, पतली पूड़ी, खीर, गुंजा-कचौरी, चना-दाल, बीज-चालनी के सूखे मेवे, दहीवड़ा, बूंदी का रायता, आमरस, आम का बिलसारू (मुरब्बा) आदि आरोगाये जाते हैं.
आज श्री नवनीतप्रियाजी शयन समय बाहर चबूतरा पर बिराजित हो आनन्द वर्षा करते हैं.

राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : सारंग)

श्रीवल्लभ नंदन रूप अनूप स्वरुप कह्यो न जाई l
प्रकट परमानंद गोकुल बसत है सब जगत के सुखदाई ll 1 ll
भक्ति मुक्ति देत सबनको निजजनको कृपा प्रेम बरखत अधिकाई l
सुखमें सुखद एक रसना कहां लो वरनौ ‘गोविंद’ बलि जाई ll 2 ll

साज - श्रीजी में आज अपनी गर्दन ऊँची कर कूकते, वर्षाऋतु के आगमन की बधाई देते मयूरों के सुन्दर क़सीदा वाली पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया और चरणचौकी के ऊपर सफेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र - श्रीजी को आज पठानी किनारी से सुसज्जित कसुम्भल (लाल) मलमल का पिछोड़ा धराया जाता है. ठाड़े वस्त्र सफेद भांतवार होते हैं.

श्रृंगार - प्रभु को आज वनमाला का (चरणारविन्द तक) ऊष्णकालीन हल्का श्रृंगार धराया जाता है.
 सर्व आभरण मोती के धराये जाते हैं. श्रीमस्तक पर कसुमल(लाल) मलमल की छज्जेदार पाग के ऊपर सिरपैंच, लूम, मोरपंख की सादी चन्द्रिका तथा बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. 
श्रीकर्ण में मोती के दो जोड़ी कर्णफूल धराये जाते हैं. 
कली, वल्लभी आदि सभी माला आती हैं. 
आज हांस, त्रवल आदि नहीं धराये जाते, वहीं जड़ाऊ थेगड़ा की बघ्घी धरायी जाती है.
 श्वेत पुष्पों की थागवाली दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती है. पीठिका के ऊपर श्वेत पुष्पों की थागवाली मालाजी धरायी जाती है.
 श्रीहस्त में कमलछड़ी, मोती के वेणुजी एवं दो वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट श्वेत (सुनहरी किनारी का), गोटी मोती की व आरसी श्रृंगार में  लाल मखमल की एवं राजभोग में सोना की डांडी की आती है.

सभी पुष्टि वैष्णवों को विविध दिव्य प्रसंगों की बधाई

व्रज - विस २०८३ आषाढ़ शुक्ल एकादशी Saturday, 25 July 2026

व्रज - विस २०८३ आषाढ़ शुक्ल एकादशी  Saturday, 25 July 2026 देवशयनी एकादशी (चातुर्मास नियमारम्भ) मुकुट-काछनी का श्रृंगार विशेष – आज देवशयनी एक...