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Wednesday, 29 July 2026

व्रज- विस २०८३ श्रावण कृष्ण प्रतिपदाThursday, 30 July 2026

व्रज- विस २०८३ श्रावण कृष्ण प्रतिपदा
Thursday, 30 July 2026

हिन्डोलना रोपण

विशेष - श्रावण मास प्रारंभ हो चुका हैं.
आज प्रभु को हिंडोलना रोपण किया जायेगा. कल प्रभु को उष्णकाल के अंतिम मोती के आभरण धराये गये. आज से ठाड़े वस्त्र धराये जायेंगे. 

श्रावण मास में भगवान शंकर अपनी अर्धांगिनी माता पार्वतीजी के साथ पृथ्वी पर निवास करते हैं अतः इस मास में शिव की पूजा का विशेष महत्व है.

आज नियम का लाल पिछोड़ा और श्रीमस्तक पर पाग व मोर-चंद्रिका का श्रृंगार धराया जाता है. 

श्रीजी को गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में विशेष रूप से चारोली (चिरोंजी) के लड्डू एवं केशरी बासोंदी (रबड़ी) की हांड़ी का भोग अरोगाया जाता है. 
राजभोग में अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता, सखड़ी में मीठी सेव व केशरयुक्त पेठा अरोगाये जाते हैं. 

राजभोग दर्शन

कीर्तन – (राग : मल्हार)

सखीरी सावन दूल्हे आयो l
चार मास के लग्न लिखाये, बदरन अंबर छायो ll 1 ll
बिजुरी चमके बगुआ बराती कोयल शब्द सुनायो l
दादुर मोर पपैया बोले इन्द्र निशान बजायो ll 2 ll
हरी हरी भूमि पर इन्द्रवधु सी रंग बिछोना बिछायो l
‘सूरदास’ प्रभु तिहारे मिलनको सखियन मंगल गायो ll 3 ll  

साज – श्रीजी में आज लाल रंग की मलमल की सुनहरी ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित पिछवाई धरायी जाती है. गादी और तकिया के ऊपर सफेद बिछावट की जाती है. सिंहासन, चरणचौकी, पड़घा, झारीजी, बंटाजी आदि जड़ाव सोने के रखे जाते हैं. मात्र दो गुलाबदानी, माटी के झारीजी का पड़धा एवं त्रस्टीजी चांदी के रहते हैं. स्वर्ण की रत्नजड़ित चरणचौकी के ऊपर हरी मखमल मढ़ी हुई होती है. आज से चरणचौकी के ऊपर सफेद बिछावट नहीं की जाती.

वस्त्र – श्रीजी को आज लाल रंग की मलमल का सुनहरी लप्पा का पिछोड़ा धराया जाता है. ठाड़े वस्त्र पीले रंग के होते हैं. आज की सेवा ललिताजी एवं चन्द्रावली जी के भाव से होने के कारण लाल अनुराग के रंग के वस्त्र धराये जाते हैं. श्री स्वामिनीजी के भाव से पीले ठाड़े वस्त्र धराये जाते हैं.

श्रृंगार – प्रभु को आज वनमाला (चरणारविन्द तक) का भारी श्रृंगार धराया जाता है. उत्सव के हीरे के सर्व आभरण धराये जाते हैं.
नीचे पदक,ऊपर हीरा, पन्ना,मानक मोती के हार,माला,दुलड़ा धराये जाते हैं.
 कस्तूरी, कली आदि सभी माला धरायी जाती है.
श्रीमस्तक पर लाल (हरी बाहर की खिडकी की) छज्जेदार पाग के ऊपर सिरपैंच, लूम, मोरपंख की सादी चन्द्रिका एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में माणक के चार कर्णफूल धराये जाते हैं. 
रंग-बिरंगी पुष्पों की दो मालाजी धरायी जाती हैं.
 श्रीहस्त में एक कमल की कमलछड़ी, हीरा के वेणुजी एवं दो वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट उत्सव का, गोटी सोने की जाली की व आरसी श्रृंगार में चार झाड़ की एवं राजभोग में सोने की डांडी की आती है.

Tuesday, 28 July 2026

व्रज - विस २०८३ आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमाWednesday, 29 July 2026

व्रज - विस २०८३ आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा
Wednesday, 29 July 2026

पिय बीन लागत बूंद कटारी ।
छिन भीतर छिन बाहिर
आवत छिन छिन चढत अटारी ।।१।।
दादुर मोर बपैया बोले कोयल कुंजे कारि ।
सूरदास प्रभु तिहारे मिलन बीन दुख व्याप्यो मोहे भारी ।।२।।

कचौरी पूनम (गुरु पूर्णिमा)

विशेष - आज आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा है जिसे हम गुरु पूर्णिमा, आषाढ़ी पूर्णिमा, व्यास पूर्णिमा और पुष्टिमार्गीय वैष्णव मंदिरों में कचौरी पूनम के नाम से भी जानते हैं.

आज पुष्टिमार्गीय वैष्णव संप्रदाय के अलावा अन्य हिन्दू सम्प्रदायों के लोग अपने गुरु का दर्शन एवं पूजन करते हैं. पुष्टिमार्गीय वैष्णव संप्रदाय में गुरु का पूजन पवित्रा एकादशी के दूसरे दिन अर्थात श्रावण शुक्ल द्वादशी को किया जाता है.

आज वेदव्यासजी का जन्मदिवस है और वेदव्यासजी भगवान विष्णु के अवतार हैं अतः पुष्टिमार्ग में देहरी-वन्दनमाल का क्रम होता है.

आज से ऊष्णकाल विदा हो जाता है. प्रभु सेवा में ठाड़े वस्त्र आरम्भ हो जाते हैं. चंदन बरनी पर श्वेत के स्थान पर लाल वस्त्र चढ़ाया जाता है.
चंदवा एवं टेरा आज से रंगीन बदले जाते हैं.

आज श्रीजी में नियम से मुकुट-काछनी का श्रृंगार धराया जाता है. प्रभु को मुख्य रूप से तीन लीलाओं (शरद-रास, दान और गौ-चारण) के भाव से मुकुट का श्रृंगार धराया जाता है. 
अधिक गर्मी एवं अधिक सर्दी के दिनों में मुकुट नहीं धराया जाता इस कारण देव-प्रबोधिनी से फाल्गुन कृष्ण दशमी तक एवं अक्षय तृतीया से रथयात्रा तक मुकुट नहीं धराया जाता. 
जब भी मुकुट धराया जाता है वस्त्र में काछनी धरायी जाती है. काछनी के घेर में भक्तों को एकत्र करने का भाव है. 
जब मुकुट धराया जाये तब ठाड़े वस्त्र सदैव श्वेत रंग के होते हैं. ये श्वेत वस्त्र चांदनी छटा के भाव से धराये जाते हैं. 
जिस दिन मुकुट धराया जाये उस दिन विशेष रूप से भोग-आरती में सूखे मेवे के टुकड़ों से मिश्रित मिश्री की कणी अरोगायी जाती है. 

भोग विशेष - श्रीजी को आज गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में विशेष रूप से चारोली (चिरोंजी) के लाटा के लड्डू और दूधघर में सिद्ध की गयी केसर युक्त बासोंदी की हांडी अरोगायी जाती है. 
चारोली (चिरोंजी) के लाटा के लड्डू वर्ष भर में श्रीजी को एक बार ही गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में आरोगाये जाते हैं. 
राजभोग में अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता अरोगाया जाता है.

आज श्री नवनीतप्रियाजी को विशेष रूप से पलना के भोग में जोटापूड़ी (पतली पूड़ी) के स्थान पर एवं संध्या-आरती में भी फीके के स्थान पर उड़द की दाल की कचौरी अरोगायी जाती है. 
अधिकतर पुष्टिमार्गीय मंदिरों में आज के दिन ठाकुर जी को कचौरी अरोगायी जाती है.

राजभोग दर्शन – 

कीर्तन – (राग : मल्हार)

अरी इन मोरन की भांत देख नाचत गोपाला ।
मिलवत गति भेदनीके मोहन नटशाला ।।१।।
गरजत धन मंदमद दामिनी दरशावे ।
रमक झमक बुंद परे राग मल्हार गावे ।।२।।
चातक पिक सधन कुंज वारवार कूजे ।
वृंदावन कुसुम लता चरण कमल पूजे ।।३।।
सुरनर मुनि कामधेनु कौतुक सब आवे ।
वारफेर भक्ति उचित परमानंद पावे ।।४।।

साज – श्रीजी में आज वर्षाऋतु के आगमन पर चमकती बिजली, वन खड़े में ग्वाल-बाल, गायें एवं हिरणों के चित्रांकन से सुसज्जित पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया और चरणचौकी के ऊपर सफेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – श्रीजी को आज लाल चूंदड़ी का सूथन, छोटी काछनी लाल एकदानी चूंदड़ी की रूपहरी किनारी की एवं बड़ी काछनी श्याम रंग की सुनहरी किनारी तथा लाल रंग की एकदानी चूंदड़ी का रास-पटका धराया जाता है. सूथन तथा रास-पटका के ऊपर रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी शोभित है. ठाड़े वस्त्र सफेद डोरिया के धराये जाते हैं. आज से प्रतिदिन ठाड़े वस्त्र धराये जाएंगे.

श्रृंगार – प्रभु को आज वनमाला (चरणारविन्द तक) का ऊष्णकालीन हल्का श्रृंगार धराया जाता है. मोती के सर्वआभरण धराये जाते हैं.
 श्रीमस्तक पर मोती का सुन्दर मुकुट तथा बायीं ओर शीशफूल धराया जाता है. हास,त्रवल नहीं धराए जाते हे बध्धी धरायी जाती हैं.
नीचे पदक,ऊपर हरी मणी की माला धरायी जाती हैं.
मोती की शिखा (चोटी) और श्रीकर्ण में मयुराकृति कुंडल धराये जाते हैं. 
राजभोग में मोती का चोखटा आता हैं.
पीले पुष्पों की रंग-बिरंगी थागवाली दो मालाजी धरायी जाती हैं.
 श्रीहस्त में कमलछड़ी जड़ाव मोती के वेणुजी एवं दो वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट श्वेत रंग का सुनहरी किनारी का और गोटी मोती की धरायी जाती हैं.
आरसी श्रृंगार में  एक झाड़ की एवं राजभोग में सोना की दाँडी की आती है.

Monday, 27 July 2026

व्रज - विस २०८३ आषाढ़ शुक्ल चतुर्दशी Tuesday, 28 July 2026

व्रज - विस २०८३ आषाढ़ शुक्ल चतुर्दशी 
Tuesday, 28 July 2026

ऋतु की अंतिम श्वेत मलमल की परधनी एवं श्रीमस्तक पर श्वेत फेटा और मोरपंख का दोहरा क़तरा के श्रृंगार 

मैं नहीं जान्यो माई,
बहु नायक को नेह ।
मास अषाढ की धटा,घुमड आयी,
रिमझिम बरखत मेह ।।१।।
काहु त्रियन संग,नेह जोर के,
काहु के आवत प्रात उठ गेह ।
धोंधी के प्रभु रस बस कर लीने,
बड भागिन जुवति एह ।।२।।

विशेष – आज श्रीजी को नियम की परधनी
 व श्रीमस्तक पर फेटा के ऊपर मोरपंख का दोहरा कतरा का श्रृंगार धराया जाता हैं. आज ऊष्णकाल में अंतिम बार परधनी धरायी जायेगी.

राजभोग दर्शन 

कीर्तन – (राग : मल्हार)

अंग अंग घन कांति मोतीमाल बगपांत इन्द्र धनुष वनमाला शोभा छीन छीन है l
दामिनी की दमकन पीताम्बर की चमकन मुरली की घोर मोर नाचे रेन दिन है ll 1 ll
वृन्दावन चदरी जरी रे पंछी दीजे कहा री चहु न दीजे तो झंको न गिन है l
धरनी ते चंद्रिका लीनी सिरधारी गिरिधारी हंस बोले मोर तेरी मेरे रिन है ll 2 ll 

साज – आज श्रीजी में श्वेत रंग के मलमल की बिना किनारी की पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया और चरणचौकी के ऊपर सफेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को श्वेत रंग के मलमल की बिना किनारी की परधनी धरायी जाती है.

श्रृंगार – आज प्रभु को छोटा (कमर तक) ऊष्णकालीन हल्का श्रृंगार धराया जाता है.
 सर्व आभरण मोती के लड वाले, श्रीमस्तक पर स्याम झाई के श्वेत फेटा के ऊपर सिरपैंच, मोरपंख का दोहरा कतरा और बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं.
 श्रीकर्ण में मोती के झुमका वाले कर्णफूल धराये जाते हैं. बध्घी मोती के लड़ की आती हैं.
 श्वेत पुष्पों की कलात्मक थागवाली दो मालाजी धरायी जाती हैं.
 श्वेत पुष्पों की ही दो मालाजी हमेल की भांति भी धरायी जाती है एवं पीठिका के ऊपर श्वेत पुष्पों की मोटी मालाजी धरायी जाती है. श्रीहस्त में कमलछड़ी, गंगा जमनी  के वेणुजी और एक वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट उष्णकाल का व गोटी बड़ीं हक़ीक की आती हैं.

कल  आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा है जिसे हम गुरु पूर्णिमा, आषाढ़ी पूर्णिमा, व्यास पूर्णिमा और पुष्टिमार्गीय वैष्णव मंदिरों में कचौरी पूनम के नाम से भी जानते हैं.

Sunday, 26 July 2026

व्रज - विस २०८३ आषाढ़ शुक्ल त्रयोदशी Monday, 27 July 2026

व्रज - विस २०८३ आषाढ़ शुक्ल त्रयोदशी 
Monday, 27 July 2026

श्वेत मलमल का आड़बंद एवं श्रीमस्तक पर गोल छोरवाली पाग के ऊपर (श्वेत खंडेला) श्वेत मोरपंख का दोहरा क़तरा के शृंगार

विशेष – आज श्रीजी को नियम का आड़बंद व श्रीमस्तक पर गोल छोरवाली पाग के ऊपर श्वेत खंडेला (श्वेत मोरपंख का दोहरा कतरा) का श्रृंगार धराया जाता  आज ऊष्णकाल में अंतिम बार आड़बंद धराया जायेगा.

राजभोग दर्शन – 

कीर्तन – (राग : मल्हार)

हों इन मोरनकी बलिहारी l
जिनकी सुभग चंद्रिका माथे धरत गोवर्धनधारी ll 1 ll
बलिहारी या वंश कुल सजनी बंसी सी सुकुमारी l
सुन्दर कर सोहे मोहन के नेक हू होत न न्यारी ll 2 ll
बलिहारी गुंजाकी जात पर महाभाग्य की सारी l
सदा हृदय रहत श्याम के छिन हू टरत न टारी ll 3 ll
बलिहारी ब्रजभूमि मनोहर कुंजन की अनुहारी l
‘सूरदास’ प्रभु नंगे पायन अनुदिन गैया चारी ll 4 ll

साज – आज श्रीजी में श्वेत रंग के मलमल की बिना किनारी की पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया और चरणचौकी के ऊपर सफेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को श्वेत रंग की मलमल का बिना किनारी का आड़बंद धराया जाता है. ठाड़े वस्त्र नहीं धराये जाते हैं.

श्रृंगार – आज प्रभु को छोटा (कमर तक) ऊष्णकालीन हल्का श्रृंगार धराया जाता है. सर्व आभरण मोती के, श्रीमस्तक पर श्वेत मलमल की छोर वाली गोलपाग के ऊपर सिरपैंच, खंडेला (श्वेत मोरपंख का दोहरा कतरा)और बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं.
 श्रीकर्ण में एक जोड़ी मोती के कर्णफूल धराये जाते हैं. श्वेत पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं एवं श्वेत पुष्पों की ही दो मालाजी हमेल की भांति भी धरायी जाती है.
 श्रीहस्त में चार कमल की कमलछड़ी, चाँदी के वेणुजी और एक वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट उष्णकाल का व गोटी छोटी हक़ीक की धरायी जाती हैं.

भक्तवत्सल प्रभु श्रीजी ने अपने सभी भक्तों को मान दिया है एवं अपनी कृपा से व्रज के सभी जीवमात्रों, पेड़-पौधों को कृतार्थ किया है. 
श्री गोवर्धन पर्वत की चारों दिशाओं में 132 वन हैं जिनमें 96 सुगन्धित पुष्प एवं जीवोपयोगी वनौषधियां हैं जिनको कृतार्थ करने के भाव से कल श्रीजी को संध्या-आरती दर्शन में वनमाला धरायी जाएगी. यह वर्ष में केवल एक बार आषाढ़ शुक्ल चतुर्दशी को धरायी जाती है. 
कल प्रभु को ऊष्णकाल में अंतिम बार परधनी धरायी जाएगी.  

Saturday, 25 July 2026

व्रज - विस २०८३ आषाढ़ शुक्ल द्वादशी Sunday, 26 July 2026

व्रज - विस २०८३ आषाढ़ शुक्ल द्वादशी 
Sunday, 26 July 2026

केसरी धोती-पटका और श्रीमस्तक पर छज्जेदार पाग पर गोल चंद्रिका के श्रृंगार 

राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : मल्हार)

व्रज पर नीकी आजघटा l
नेन्ही नेन्ही बुंद सुहावनी लागत चमकत बीजछटा ll 1 ll
गरजत गगन मृदंग बजावत नाचत मोर नटा l
तैसेई सुर गावत आतक पिक प्रगट्यो है मदन भटा ll 2 ll
सब मिलि भेट देत नंदलाल हि बैठे ऊंची अटा l
‘कुंभनदास’ गिरिधरन लाल सिर कसुम्भी पीत पटा ll 3 ll  

साज – आज श्रीजी में श्वेत रंग की प्रभु को पलना झुलाते पूज्य गौस्वामी बालकों के चित्रांकन की पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र - श्रीजी को आजकेसरी धोती एवं राजशाही पटका धराये जाते हैं.

श्रृंगार - प्रभु को आज ऊष्णकालीन हल्का छेड़ान का श्रृंगार धराया जाता है. मोती के सर्व आभरण धराये जाते हैं.
 श्रीमस्तक पर केसरी रंग की छज्जेदार पाग के ऊपर सिरपैंच, लूम, गोल चंद्रिका एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं.
 श्रीकर्ण में मोती के कर्णफूल धराये जाते हैं. 
 तुलसी एवं श्वेत पुष्पों वाली दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती है. कली आदि माला धरायी जाती हैं.
 श्रीहस्त में तीन कमल की कमलछड़ी, झिने लहरिया के वेणुजी एवं वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट राग रंग का एवं गोटी हक़ीक की आती हैं.

Friday, 24 July 2026

व्रज - विस २०८३ आषाढ़ शुक्ल एकादशी Saturday, 25 July 2026

व्रज - विस २०८३ आषाढ़ शुक्ल एकादशी 
Saturday, 25 July 2026

देवशयनी एकादशी (चातुर्मास नियमारम्भ)

मुकुट-काछनी का श्रृंगार

विशेष – आज देवशयनी एकादशी है. 
सनातन धर्म में एकादशी का महत्वपूर्ण स्थान है. प्रत्येक वर्ष चौबीस एकादशी होती हैं.

आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को ही देवशयनी एकादशी कहा जाता है. कहीं-कहीं इस तिथि को 'पद्मनाभा' भी कहते हैं. 

सूर्य के मिथुन राशि में आने पर ये एकादशी आती है. इसी दिन से चातुर्मास का आरंभ माना जाता है. इस दिन से भगवान विष्णु क्षीरसागर में शयन करते हैं और फिर लगभग चार माह बाद तुला राशि में सूर्य के जाने पर उन्हें जगाया जाता है. 
उस दिन को देव प्रबोधिनी एकादशी (देवोत्थापन) कहा जाता है. इस बीच के अंतराल को चातुर्मास कहा जाता है. 

आज से चार माह अर्थात देव प्रबोधिनी एकादशी तक विवाहादि कुछ शुभ कार्य वर्जित होते हैं.

आज श्रीजी को लगभग तीन माह पश्चात इस ऋतु का प्रथम मुकुट-काछनी का श्रृंगार धराया जायेगा.

जब भी मुकुट धराया जाता है वस्त्र में काछनी धरायी जाती है. काछनी के घेर में भक्तों को एकत्र करने का भाव है. 

जब मुकुट धराया जाये तब ठाड़े वस्त्र सदैव श्वेत रंग के होते हैं. ये श्वेत वस्त्र चांदनी छटा के भाव से धराये जाते हैं. 

ज्येष्ठ और आषाढ़ मास की चारों एकादशियों में श्रीजी को गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में लिचोई (मिश्री के बूरे और इलायची पाउडर से सज्जित पतली पूड़ी) अरोगायी जाती है.

इसके अतिरिक्त आज विशेष रूप से द्वितीय गृहाधीश्वर प्रभु श्री विट्ठलनाथजी के घर से अनसखड़ी में श्रीजी के अरोगने हेतु मांडा (मीठी रोटी) और आमरस की सामग्री पधारती हैं जो कि प्रभु को संध्या-आरती में अरोगायी जाती है.

राजभोग दर्शन -

कीर्तन – (राग : मल्हार)

माईरी श्यामघन तन दामिनी दमकत पीताम्बर फरहरे l
मुक्ता माल बगजाल कही न परत छबी विशाल मानिनीकी अरहरे ll 1 ll
मोर मुकुट इन्द्रधनुष्यसो सुभग सोहत मोहत मानिनी धुत थरहरे l
‘कृष्णजीवन’ प्रभु पुरंदर की शोभा निधान मुरलिका की घोर घरहरे ll 2 ll

साज – आज श्रीजी में फ़िरोज़ी मलमल की पतंगी हाशिये की पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की गयी है.

वस्त्र – श्रीजी को आज फ़िरोज़ी रंग का सूथन, काछनी (पतंगी हांशिया की) तथा फ़िरोज़ी रंग का पतंगी हांशिया का रास-पटका धराया जाता है. ठाड़े वस्त्र श्वेत डोरिया के धराये जाते हैं.

श्रृंगार – प्रभु को आज वनमाला (चरणारविन्द तक) का ऊष्णकालीन हल्का श्रृंगार धराया जाता है. मोती के आभरण धराये जाते हैं. 
श्रीमस्तक पर मोती का अद्वितीय मुकुट तथा बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में मयुराकृति कुंडल धराये जाते हैं. 
स्वरुप की बायीं ओर मोती की चोटी धरायी जाती है. 
कली आदि सभी माला धरायी जाती हैं. श्वेत पुष्पों की रंग-बिरंगी थागवाली दो मालाजी धरायी जाती हैं. 
श्रीहस्त में कमलछड़ी, गंगा-जमनी (सोने-चांदी) के वेणुजी एवं दो वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट ऊष्णकाल का व गोटी बड़ी हकीक की आती है.

उत्थापन दर्शन पश्चात नियम का मोगरे की कली का शृंगार 

Thursday, 23 July 2026

व्रज – विस २०८३ आषाढ़ शुक्ल दशमीFriday, 24 July 2026

व्रज – विस २०८३ आषाढ़ शुक्ल दशमी
Friday, 24 July 2026

पीले मलमल का लाल हाशिये का आड़बंद एवं श्रीमस्तक पर पिली छज्जेदार पाग पर क़तरा के श्रृंगार 

राजभोग दर्शन

कीर्तन – (राग : मल्हार)

हों इन मोरनकी बलिहारी l
जिनकी सुभग चंद्रिका माथे धरत गोवर्धनधारी ll 1 ll
बलिहारी या वंश कुल सजनी बंसी सी सुकुमारी l
सुन्दर कर सोहे मोहन के नेक हू होत न न्यारी ll 2 ll
बलिहारी गुंजाकी जात पर महाभाग्य की सारी l
सदा हृदय रहत श्याम के छिन हू टरत न टारी ll 3 ll
बलिहारी ब्रजभूमि मनोहर कुंजन की अनुहारी l
‘सूरदास’ प्रभु नंगे पायन अनुदिन गैया चारी ll 4 ll

साज – आज श्रीजी में पीले मलमल की लाल हाशिये की पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की गयी है.

वस्त्र – आज श्रीजी को पीले मलमल का लाल हाशिये का आड़बंद धराया जाता है.

श्रृंगार – आज प्रभु को छोटा (कमर तक) ऊष्णकालीन हल्का श्रृंगार धराया जाता है. 
मोती के सर्व आभरण धराये जाते हैं. 
श्रीमस्तक पर पीले रंग की छज्जेदार पाग के ऊपर सिरपैंच, क़तरा एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. 
श्रीकर्ण में एक जोड़ी मोती के कर्णफूल धराये जाते हैं. 
श्वेत पुष्पों एवं तुलसी की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं वहीँ दो मालाजी हमेल की भांति भी धरायी जाती है. 
श्रीहस्त में तीन कमल की कमलछड़ी, सुवा वेणुजी एवं एक वेत्रजी धराये जाते हैं. पट ऊष्णकाल का गोटी हक़ीक की छोटी आती है.

व्रज- विस २०८३ श्रावण कृष्ण प्रतिपदाThursday, 30 July 2026

व्रज- विस २०८३ श्रावण कृष्ण प्रतिपदा Thursday, 30 July 2026 हिन्डोलना रोपण विशेष - श्रावण मास प्रारंभ हो चुका हैं. आज प्रभु को हिंडोलना रोपण...