By Vaishnav, For Vaishnav

Monday, 5 October 2026

व्रज –विस २०८३ आश्विन कृष्ण एकादशी Tuesday, 06 October 2026

व्रज –विस २०८३ आश्विन कृष्ण एकादशी 
Tuesday, 06 October 2026

प्रीतम प्रीत ही तें पैये ।
यद्यपि रूप गुण शील 
सुघरता ईन बातन न रीजैयें ।।१।।
सतकुल जन्म कर्म शुभ लच्छन
वेद पुरान पढ़ैये ।
गोविंद प्रभु बिना स्नेह सुवालों
रसना कहाजु नचैये ।।२।।

भावार्थ- विशुद्ध प्रेम ही अन्त:करण को पवित्र करता है. परम प्रीति ही भक्ति है. प्रभु प्रेम द्वारा ही वश में होते हैं.
रूप, गुण, शील, सुघड़ता इन सब से प्रभु प्रसन्न नहीं होते हैं. अच्छे कुल में जन्म होना, कर्म, शुभ लक्षण, वेद पुराणों का ज्ञान यह सब हो किन्तु प्रेम नहीं हो तो सब व्यर्थ है.

महादान एकादशी

विशेष – आज इंदिरा एकादशी है. इसे पुष्टिमार्ग में महादान एकादशी भी कहा जाता है.

आज दान का नियम का छटा मुकुट-काछनी का श्रृंगार धराया जाता है. 

दान के दिनों के मुकुट काछनी के श्रृंगार की कुछ और विशेषताएँ भी है. 

इन दिनों में जब भी मुकुट धराया जावे तब मुकुट को एक वस्त्र से बांधा जाता है जिससे जब प्रभु मटकी फोड़ने कूदें तब मुकुट गिरे नहीं. 
इसके अतिरिक्त दान के दिनों में मुकुट काछनी के श्रृंगार में स्वरुप के बायीं ओर चोटी (शिखा) नहीं धरायी जाती. इसके पीछे यह भाव है कि यदि चोटी (शिखा) रही तो प्रभु जब मटकी फोड़कर भाग रहे हों तब गोपियाँ उनकी चोटी (शिखा) पकड़ सकती हैं और प्रभु भाग नहीं पाएंगे.

Post में प्रदर्शित चित्र में द्रश्य नहीं हैं परन्तु आज प्रभु के स्वरुप से भी लम्बी एक लकुटी (छड़ी) प्रभु के पीठिका के सहारे खड़ी धरी जाती है जिसका भाव यह है कि भारी श्रृंगार के रहते प्रभु उछल के मटकी नहीं फोड़ पाएंगे अतः लम्बी वेत्रजी (छड़ी) पास में होगी होगी तो खड़े-खड़े ही प्रभु मटकी फोड़ देंगे.

आज प्रभु द्वारा शाकघर का महादान अंगीकार किया जाता है. 

गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में आज श्रीजी को शाकघर और दूधघर में विशेष रूप से सिद्ध किये गये दूध, दही, केशरिया दही, श्रीखंड, केशरी बासोंदी, मलाई बासोंदी, गुलाब-जामुन, छाछ, खट्टा-मीठा दही के बटेरा आदि अरोगाये जाते हैं. 
दान के अन्य दिनों के अपेक्षा आज प्रभु को कई गुना अधिक हांडियां अरोगायी जाती है.

आज व्रज के गोवर्धन के दान का भाव है. कीर्तनों में श्री हरिरायजी रचित बड़ी दानलीला गायी जाती है.

श्रीजी को एकादशी फलाहार के रूप में कोई विशेष भोग नहीं लगाया जाता, केवल संध्या आरती में प्रतिदिन अरोगायी जाने वाली खोवा (मिश्री-मावे का चूरा) एवं मलाई (रबड़ी) को मुखिया, भीतरिया आदि भीतर के सेवकों को एकादशी फलाहार के रूप में वितरित किया जाता है.

राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : सारंग)

कृपा अवलोकनि दान दै री महादानी श्रीवृषभान कुमारी l
त्रिषित लोचन चकोर मेरे तुव वदन इंदु किरन पान दैरी ll 1 ll
सबविधि सुधर सुजान सुन्दरि सुनि विनति तू कान दैरी l
‘गोविंद’ प्रभु पिय चरण परस कह्यौ याचक को तू मान दैरी ll 2 ll

साज – आज प्रातः श्रीजी में गहरवन में दूध-दही बेचने जाती गोपियों के पास से दान मांगते एवं दूध-दही लूटते श्री ठाकुरजी एवं सखा जनों के सुन्दर चित्रांकन वाली दानलीला की प्राचीन पिछवाई धरायी जाती है.
गादी, तकिया और चरणचौकी के ऊपर सफेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र - श्रीजी को आज केसरी रंग की मलमल पर रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित सूथन व कोयली काछनी दूसरी काछनी लाल तथा केसरी रास-पटका धराया जाता है. ठाड़े वस्त्र सफेद भातवार के धराये जाते हैं.

श्रृंगार – आज प्रभु को वनमाला (चरणारविन्द तक) का भारी श्रृंगार धराया जाता है. हीरा एवं जड़ाव सोने के सर्व आभरण धराये जाते हैं. 
श्रीमस्तक पर हीरा एवं स्वर्ण का जड़ाऊ मीनाकारी वाला मुकुट एवं बायीं ओर शीशफूल धराया जाता है. श्रीकर्ण में हीरा के मयूराकृति कुंडल धराये जाते हैं. 
कस्तूरी कली एवं कमल माला धराई जाती हैं.
पीले एवं श्वेत पुष्पों की रंग-बिरंगी थागवाली दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती है. 
श्रीहस्त में कमलछड़ी, लाल मीना के वेणुजी दो वेत्रजी (एक सोना का) धराये जाते हैं.
पट लाल व गोटी मोर की आती है.

Sunday, 4 October 2026

व्रज – विस २०८३ आश्विन कृष्ण दशमी Monday, 05 October 2026

व्रज – विस २०८३ आश्विन कृष्ण दशमी 
Monday, 05 October 2026

लाल पीली चौफुली चुंदड़ी का पिछोड़ा एवं श्रीमस्तक पर गोल पाग पर गोल बाक़ी चन्द्रिका के श्रृंगार

राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : सारंग)

ग्वालिनी मीठी तेरी छाछि l
कहा दूध में मेलि जमायो साँची कहै किन वांछि ll 1 ll
और भांति चितैवो तेरौ भ्रौह चलत है आछि l
ऐसो टक झक कबहु न दैख्यो तू जो रही कछि काछि ll 2 ll
रहसि कान्ह कर कुचगति परसत तु जो परति है पाछि l
‘परमानंद’ गोपाल आलिंगी गोप वधू हरिनाछि ll 3 ll

साज - श्रीजी में आज लाल पीली चौफुली चुंदड़ी की पिछवाई धरायी जाती है.

वस्त्र – श्रीजी में आज लाल पीली चौफुली चुंदड़ी का पिछोड़ा धराया जाता है. ठाड़े वस्त्र मेघश्याम रंग के होते हैं.

श्रृंगार – प्रभु को आज छेड़ान का श्रृंगार धराया जाता है. मोती के सर्व आभरण धराये जाते हैं.
 श्रीमस्तक पर गोल पाग के ऊपर गोल बाक़ी चन्द्रिका एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं.
 श्रीकर्ण में एक जोड़ी कर्णफूल धराये जाते हैं.

 रंग बिरंगे पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी व कमल के पुष्प की मालाजी  धरायी जाती हैं.
 श्रीहस्त में एक कमल की कमलछड़ी, लाल मीना के वेणु वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट लाल व गोटी चाँदी की बाघ बकरी की आती हैं.

Saturday, 3 October 2026

व्रज –विस २०८३ आश्विन कृष्ण नवमी (अष्टमी क्षय)Sunday, 04 October 2026

व्रज –विस २०८३ आश्विन कृष्ण नवमी (अष्टमी क्षय)
Sunday, 04 October 2026

विशेष – आज नित्यलीलास्थ गौस्वामी तिलकायत श्री गोविन्दलालजी महाराजश्री के बहूजी एवं वर्तमान तिलकायत पूज्य गौस्वामी श्री राकेशजी महाराज की मातृचरण नित्यलीलास्थ अखंड सौभाग्यकांक्षी श्री विजयलक्ष्मी बहूजी का उत्सव है. 

आज श्रीजी को दान का पाचवा व नियम का मुकुट-काछनी का श्रृंगार धराया जायेगा. 

श्रीजी में आज नित्यलीलास्थ गौस्वामी तिलकायत श्री गोविन्दलालजी महाराज के समस्त परिवारजनों के सुन्दर चित्रांकन से सुसज्जित पिछवाई धरी जाती है जिसमें स्वयं श्री गोविन्दलालजी महाराज बायीं ओर खड़े आरती कर रहे हैं, दोनों ओर उनके परिवार के सदस्य खड़े और विराजित हैं. 

आज तिलकायत परिवार की ओर से महादान की सामग्री अरोगायी जाती है. आज कदम्ब-खंडी के दान का भाव है.

श्रीजी मंदिर में आज संध्या-आरती पश्चात नन्दगाँव और बरसाना की सांझी मांडी जाती है.

राजभोग दर्शन – 

कीर्तन – (राग : सारंग)

जमुना घाट रोकी हो रसिक चन्द्रावलि l
हसि मुसिकयाय कहति व्रज सुंदरि छबीलै छैल छांडो अंचल ll 1 ll
दान निवेर लैहो व्रजसुंदरि छांडो अटपटी कित गहत अलकावलि l
करसों कर गहि हृदयसों लगाय लई ‘गोविंद’ प्रभुसो तु रासरंग मिलि ll 2 ll  

साज – श्रीजी में आज नित्यलीलास्थ गौस्वामी तिलकायत श्री गोविन्दलालजी महाराज के समस्त परिवारजनों के सुन्दर चित्रांकन से सुसज्जित पिछवाई धरी जाती है जिसमें स्वयं श्री गोविन्दलालजी महाराज बायीं ओर खड़े आरती कर रहे हैं और दायीं ओर क्रमशः नित्यलीलास्थ श्री राजीवजी (दाऊबावा), चिरंजीवी श्री विशालबावा, वर्तमान गौस्वामी तिलकायत श्री राकेशजी महाराज एवं उनकी माता श्री विजयलक्ष्मी बहूजी खड़ीं हैं. बायीं ओर विराजित स्वरूपों में बाएं से दूसरे श्री राजेश्वरीजी बहूजी (वर्तमान गौस्वामी तिलकायत श्री राकेश जी महाराज श्री के बहूजी) हैं. गादी, तकिया और चरण चौकी पर सफेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र - श्रीजी को आज लाल पीला लहरियाँ के वस्त्र पर रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित सूथन, काछनी तथा रास-पटका धराया जाता है. ठाड़े वस्त्र श्वेत भांतवार धराये जाते हैं.

श्रृंगार – आज प्रभु को वनमाला (चरणारविन्द तक) का भारी श्रृंगार धराया जाता है. हरे मीना के सर्व आभरण धराये जाते हैं. 
श्रीमस्तक पर हरे मीना का मुकुट और मुकुट पर मुकुट पिताम्बर एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में मयूराकृति कुंडल धराये जाते हैं. 
कस्तूरी, कली एवं कमल माला धराई जाती हैं.
श्वेत पुष्पों एवं कमल की थागवाली दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती है. 
श्रीहस्त में कमलछड़ी, फ़िरोज़ा के वेणुजी व दो वेत्रजी (एक सोना का) धराये जाते हैं.
पट लाल एवं गोटी मोर की आती हैं.

Friday, 2 October 2026

व्रज – विस २०८३ आश्विन कृष्ण सप्तमीSaturday, 03 October 2026

व्रज – विस २०८३ आश्विन कृष्ण सप्तमी
Saturday, 03 October 2026

श्री महाप्रभुजी के पौत्र पुरुषोत्तमजी का उत्सव 
(अष्टमी क्षय से आज)

विशेष – आज श्री महाप्रभुजी के ज्येष्ठ पुत्र श्री गोपीनाथजी के पुत्र श्री पुरुषोत्तमजी का उत्सव है. 
श्री गोपीनाथजी के नित्यलीला में प्रवेश के समय आपकी आयु 10 वर्ष की थी.
श्री विट्ठलनाथजी ने तब आपको पुष्टिमार्गीय आचार्य के रूप में तिलक किया. आपने भी केवल 19 वर्ष की अल्पायु में नित्यलीला प्रवेश किया अतः आपके जीवन चरित्र के विषय में अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है. 
आपके अविवाहित ही नित्यलीलास्थ होने से श्री गोपीनाथजी का वंश श्री पुरुषोत्तमजी के पश्चात वहीँ समाप्त हो गया.

राजभोग दर्शन – 

साज – श्रीजी में आज दान के दिवसों के अनुरूप, मस्तक पर गौरस की स्वर्ण गौरसियाँ (कलश) लेकर आती व्रजभक्त गोपीजनों के सुन्दर चित्रांकन वाली पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया और चरण चौकी पर सफेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र - श्रीजी को आज पीले रंग की मलमल पर रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित सूथन, काछनी तथा रास-पटका धराया जाता है. ठाड़े वस्त्र श्वेत भातवार के धराये जाते हैं. 

श्रृंगार – आज प्रभु को वनमाला (चरणारविन्द तक) का भारी श्रृंगार धराया जाता है. पन्ना एवं जड़ाव सोने के आभरण धराये जाते हैं.
 श्रीमस्तक पर हीरे तथा माणक का जड़ाऊ मुकुट एवं मुकुट पर मुकुट पिताम्बर एवं बायीं ओर शीशफूल धराया जाता है. श्रीकर्ण में मयूराकृति कुंडल धराये जाते हैं. 
कस्तूरी, कली एवं कमल माला धराई जाती हैं.
लाल गुलाब एवं श्वेत पुष्पों की रंग-बिरंगी थागवाली दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती है. 
श्रीहस्त में कमलछड़ी, हरे मीना के वेणुजी दो वैत्रजी ( एक स्वर्ण का) धराये जाते हैं.
पट पिला एवं गोटी दान की आती हैं.

Thursday, 1 October 2026

व्रज –विस २०८३ आश्विन कृष्ण षष्ठी Friday, 02 October 2026

व्रज –विस २०८३ आश्विन कृष्ण षष्ठी 
Friday, 02 October 2026

लाल चौफ़ुली चूंदड़ी के मल्लकाछ टिपारा के श्रृंगार

मल्लकाछ शब्द दो शब्दों (मल्ल एवं कच्छ) के मेल से बना है. ये एक विशेष परिधान है जो आम तौर पर पहलवान मल्ल (कुश्ती) के समय पहना करते हैं. यह श्रृंगार पराक्रमी प्रभु को वीर-रस की भावना से धराया जाता है.

मल्लकाछ शब्द दो शब्दों (मल्ल एवं कच्छ) से बना है. ये एक विशेष परिधान है जो आम तौर पर पहलवान मल्ल (कुश्ती) के समय पहना करते हैं. यह श्रृंगार पराक्रमी प्रभु को वीर-रस की भावना से धराया जाता है.

राजभोग दर्शन – 

कीर्तन – (राग : सारंग)

ग्वालिनी मीठी तेरी छाछि l
कहा दूध में मेलि जमायो साँची कहै किन वांछि ll 1 ll
और भांति चितैवो तेरौ भ्रौह चलत है आछि l
ऐसो टक झक कबहु न दैख्यो तू जो रही कछि काछि ll 2 ll
रहसि कान्ह कर कुचगति परसत तु जो परति है पाछि l
‘परमानंद’ गोपाल आलिंगी गोप वधू हरिनाछि ll 3 ll

साज – आज श्रीजी में श्री गोवर्धन शिखर, सांकरी खोर, गौरस बेचने जाती गोपियों एवं श्री ठाकुरजी एवं बलरामजी मल्लकाछ-टिपारा धराये भुजदंड से मटकी फोड़ने के लिए श्रीहस्त की छड़ी ऊंची कर रहे हैं एवं मटकी में से गौरस छलक रहा है ऐसे सुन्दर चित्रांकन वाली दानलीला की पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफेद रंग की बिछावट की जाती है.

वस्त्र – श्रीजी को आज लाल चौफ़ुली चूंदड़ी का मल्लकाछ एवं पटका धराया जाता है. इस श्रृंगार को मल्लकाछ-टिपारा का श्रृंगार कहा जाता है. ठाड़े वस्त्र श्याम रंग के धराये जाते हैं.

श्रृंगार – प्रभु को आज श्रीकंठ के शृंगार छेड़ान के बाक़ी भारी श्रृंगारवत धराया जाता है. गुलाबी मीना के सर्वआभरण धराये जाते हैं.
 श्रीमस्तक पर चौफ़ुली चूंदड़ी का टिपारा का साज धराया जाता है जिसमें स्वर्ण और मोती के टिपारे के ऊपर मध्य में मोरशिखा, दोनों ओर दोहरा कतरा एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में मयुराकृति कुंडल धराये जाते हैं. चोटीजी नहीं धराई जाती हैं.
कमल माला धराई जाती हैं.
श्वेत पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं. श्रीहस्त में कमलछड़ी, झिने लहरिया के वेणुजी और वेत्रजी का धराये जाते हैं.
पट लाल एवं गोटी चाँदी की बाघ-बकरी की आती हैं.

Wednesday, 30 September 2026

व्रज –विस २०८३ आश्विन कृष्ण पंचमीThursday, 01 October 2026

व्रज –विस २०८३ आश्विन कृष्ण पंचमी
Thursday, 01 October 2026

हो वारी इन वल्लभीयन पर,
मेरे तन को करों बिछौना,
सिस घरों इन के चरनन पर। 
भाव भरी देखो इन अँखियन,
मंडल मद्य बिराजत गिरिधर। 
ये तो मेरे प्राणजीवन धन,
दान दिये है श्रीवल्लभवर। 
पुष्टिमार्ग प्रकट करिबे को ,
प्रकटे श्रीविठ्ठल द्विज - वपु धर। 
दास 'रसिक 'बलैया लै लै,
वल्लभीयन की चरणरज अनुसर।

पुष्टिमार्गीय वैष्णवों के मध्य श्रीजी के दर्शन कर के उनके लिए मन में उपरोक्त भाव भावना वाले महाप्रभु श्री हरिरायजी के प्राकट्योंत्सव की ख़ूब ख़ूब बधाई

नित्यलीलास्थ गौस्वामी श्री हरिरायजी (1647) का उत्सव 

विशेष – आज नित्यलीलास्थ गौस्वामी श्री हरिरायजी का उत्सव है. 

आज श्रीजी को दान का चौथा मुकुट-काछनी का श्रृंगार धराया जायेगा. 

आज श्रृंगार दर्शन में प्रभु के बड़ी डांडी का कमल धराया जाता है.

श्रीजी को आज गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में विशेष रूप से मनोहर (इलायची-जलेबी) के लड्डू अरोगाये जाते हैं. 
आज दानगढ़-मानगढ़ का मनोरथ होता है, सांकरी खोर के महादान का भाव भी है इसलिए गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में दान की शाकघर व दूधघर में सिद्ध विशिष्ट हांडियां अरोगायी जाती है. 

आज श्रृंगार से राजभोग तक श्री हरिरायजी द्वारा रचित 35 पदों की बड़ी दानलीला एवं सायंकाल सांझी के विशेष कीर्तन भी गाये जाते हैं.  (अन्य पोस्ट में)
मणिकोठा में पुष्पों की सांझी भी मांडी जाती है जिसके पुष्प द्वितीय गृहाधीश्वर प्रभु श्री विट्ठलनाथजी के मंदिर से आते हैं.

राजभोग दर्शन –

साज – श्रीजी में आज प्रभु को गौरस अरोगाने पधारीं मुग्ध भाव की व्रजभक्त गोपियों के अद्भुत चित्रांकन से सुसज्जित पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी के ऊपर सफेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – श्रीजी को आज केसरी रंग की मलमल पर रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित सूथन, काछनी तथा रास-पटका धराया जाता है. ठाड़े वस्त्र श्वेत भांतवार धराये जाते हैं. 

श्रृंगार – आज प्रभु को वनमाला (चरणारविन्द तक) का भारी श्रृंगार धराया जाता है. मिलवा – हीरे व माणक के आभरण धराये जाते हैं. 
कली, कस्तूरी व वैजयंती माला धरायी जाती है. 
श्रीमस्तक पर स्वर्ण का श्रीगोकुलनाथजी के हीरे-जड़ित टोपी, मुकुट और मुकुट पर मुकुट पिताम्बर एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में मानक के मयूराकृति कुंडल धराये जाते हैं. 
श्वेत पुष्पों की रंग-बिरंगी थागवाली दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती है. 
श्रीहस्त में कमलछड़ी, सोने के पक्षी वाले वेणुजी दो वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट केसरी व गोटी दान की आती है. 

Tuesday, 29 September 2026

व्रज - अश्विन कृष्ण चतुर्थीWednesday, 30 September 2026

व्रज - अश्विन कृष्ण चतुर्थी
Wednesday, 30 September 2026

रूपहरी किनारी के धोरा के गुलाबी सुथन, फेंटा और पटका के श्रृंगार 

श्रीजी ने अपने सभी भक्तों को आश्रय दिया है, मान दिया है चाहे वो किसी भी जाति या धर्म से हो. 
इसी भाव से आज ठाकुर जी अपनी अनन्य मुस्लिम भक्त ताज़बीबी की भावना से सूथन-पटका का श्रृंगार धराते हैं. यह श्रृंगार ताज़बीबी की विनती पर सर्वप्रथम भक्तकामना पूरक श्री गुसांईजी ने धराया था. 

ताज़बीबी की ओर से यह श्रृंगार वर्ष में लगभग छह बार धराया जाता है यद्यपि इस श्रृंगार को धराने के दिन निश्चित नहीं हैं.

ताज़बीबी बादशाह अकबर की बेग़म, प्रभु की भक्त और श्री गुसांईजी की परम-भगवदीय सेवक थी. उन्होंने कई कीर्तनों की रचना भी की है और उनके सेव्य स्वरुप श्री ललितत्रिभंगी जी वर्तमान में गुजरात के पोरबंदर में श्री रणछोड़जी की हवेली में विराजित हैं.

राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : तोडी)

देख गजबाज़ आज वृजराज बिराजत गोपनके शीरताज ।
देस देस ते खटदरसन आवत मनवा छीत कूल पावत 
किरत अपरंपार ऊंचे चढ़े दान जहाज़ ।।१।।
सुरभि तिल पर्वत अर्ब खर्ब कंचन मनी दीने, सो सुत हित के काज ।
हरि नारायण श्यामदास के प्रभु को नाम कर्म करावन,
महेर मुदित मन बंधि है धर्म की पाज ।।२।।

साज – आज श्रीजी में दानलीला एवं  सांझीलीला के चित्रांकन वाली पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफेद रंग की बिछावट की जाती है.

वस्त्र - श्रीजी को आज गुलाबी रंग के रूपहरी धोरा का सुथन और राजशाही पटका धराया जाता है. दोनों वस्त्र रूपहरी ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित होते हैं. ठाड़े वस्त्र मेघश्याम रंग के होते हैं.

शृंगार - ठाकुरजी को आज मध्य का (घुटने तक) हल्का श्रृंगार धराया जाता है. सर्व आभरण फ़ीरोज़ी मीना के छेड़ान के धराये जाते हैं. श्रीमस्तक पर मेघश्याम फेंटा का साज धराया जाता है जिसमें मेघश्याम रंग के फेंटा के ऊपर सिरपैंच, बीच की चंद्रिका, कतरा एवं बायीं ओर शीशफूल धराया जाता है.
 श्रीकर्ण में लोलकबंदी लड़ वाले कर्णफूल धराये जाते हैं. 
श्वेत एवं पीले पुष्पों की रंग-बिरंगी कलात्मक थागवाली दो मालाजी धरायी जाती हैं.
 श्रीहस्त में एक कमल की कमलछड़ी, गुलाबी मीना के वेणुजी और दो वेत्रजी(एक सोना का) धराये जाते हैं.
पट गुलाबी रंग का व गोटी बाघ-बकरी की आती है.

व्रज –विस २०८३ आश्विन कृष्ण एकादशी Tuesday, 06 October 2026

व्रज –विस २०८३ आश्विन कृष्ण एकादशी  Tuesday, 06 October 2026 प्रीतम प्रीत ही तें पैये । यद्यपि रूप गुण शील  सुघरता ईन बातन न रीजैयें ।।१।। स...