व्रज - विस २०८३ ज्येष्ठ कृष्ण सप्तमी
Sunday, 07 June 2026
शरबती मलमल का पिछोड़ा एवं श्रीमस्तक पर ग्वाल पगा पर पगा चंद्रिका (मोरशिखा) के श्रृंगार
श्रीजी में
प्रातः - चंदन महल बन्यो अति सुंदर
शाम - छूटत फुवारे आगे निके
प्रियाजी में
प्रातः - बगीचे में पलना
शाम - रंग महल में बैठे पिय प्यारी
राजभोग दर्शन –
साज – (राग : रामकली)
मोहन देहो बसन हमारे ।
जाय कहों ब्रज्पतिजू के आगे,
करत अनीत ललारे ॥ १ ॥
तुम ब्रजराज कुमार लाडिले,
और सबहिन के प्राण पियारे ।
गोविन्द प्रभु पिया दासी तिहारी,
सुंदर वर सुकुमारे ॥ २ ॥
साज – आज श्रीजी में चीरहरण के भाव की चित्रांकन की पिछवाई धरायी जाती है.
वस्त्र – आज श्रीजी को शरबती मलमल का पिछोड़ा धराया जाता है.
श्रृंगार – आज श्रीजी को छोटा (कमर तक) ऊष्णकालीन हल्का छेड़ान का श्रृंगार धराया जाता है.
मोती के सर्व आभरण धराये जाते हैं.
श्रीमस्तक पर शरबती रंग के ग्वाल पगा पर मोती की लड़, पगा चंद्रिका (मोरशिखा) एवं बायीं ओर शीशफूल धराया जाता है.
श्वेत पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं एवं इसी प्रकार की एक कमल माला हमेल की भांति धरायी जाती हैं.
श्रीहस्त में तीन कमल की कमलछड़ी, सुवा के वेणुजी एवं वेत्रजी धराये जाते हैं.