By Vaishnav, For Vaishnav

Monday, 27 July 2026

व्रज - विस २०८३ आषाढ़ शुक्ल चतुर्दशी Tuesday, 28 July 2026

व्रज - विस २०८३ आषाढ़ शुक्ल चतुर्दशी 
Tuesday, 28 July 2026

ऋतु की अंतिम श्वेत मलमल की परधनी एवं श्रीमस्तक पर श्वेत फेटा और मोरपंख का दोहरा क़तरा के श्रृंगार 

मैं नहीं जान्यो माई,
बहु नायक को नेह ।
मास अषाढ की धटा,घुमड आयी,
रिमझिम बरखत मेह ।।१।।
काहु त्रियन संग,नेह जोर के,
काहु के आवत प्रात उठ गेह ।
धोंधी के प्रभु रस बस कर लीने,
बड भागिन जुवति एह ।।२।।

विशेष – आज श्रीजी को नियम की परधनी
 व श्रीमस्तक पर फेटा के ऊपर मोरपंख का दोहरा कतरा का श्रृंगार धराया जाता हैं. आज ऊष्णकाल में अंतिम बार परधनी धरायी जायेगी.

राजभोग दर्शन 

कीर्तन – (राग : मल्हार)

अंग अंग घन कांति मोतीमाल बगपांत इन्द्र धनुष वनमाला शोभा छीन छीन है l
दामिनी की दमकन पीताम्बर की चमकन मुरली की घोर मोर नाचे रेन दिन है ll 1 ll
वृन्दावन चदरी जरी रे पंछी दीजे कहा री चहु न दीजे तो झंको न गिन है l
धरनी ते चंद्रिका लीनी सिरधारी गिरिधारी हंस बोले मोर तेरी मेरे रिन है ll 2 ll 

साज – आज श्रीजी में श्वेत रंग के मलमल की बिना किनारी की पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया और चरणचौकी के ऊपर सफेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को श्वेत रंग के मलमल की बिना किनारी की परधनी धरायी जाती है.

श्रृंगार – आज प्रभु को छोटा (कमर तक) ऊष्णकालीन हल्का श्रृंगार धराया जाता है.
 सर्व आभरण मोती के लड वाले, श्रीमस्तक पर स्याम झाई के श्वेत फेटा के ऊपर सिरपैंच, मोरपंख का दोहरा कतरा और बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं.
 श्रीकर्ण में मोती के झुमका वाले कर्णफूल धराये जाते हैं. बध्घी मोती के लड़ की आती हैं.
 श्वेत पुष्पों की कलात्मक थागवाली दो मालाजी धरायी जाती हैं.
 श्वेत पुष्पों की ही दो मालाजी हमेल की भांति भी धरायी जाती है एवं पीठिका के ऊपर श्वेत पुष्पों की मोटी मालाजी धरायी जाती है. श्रीहस्त में कमलछड़ी, गंगा जमनी  के वेणुजी और एक वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट उष्णकाल का व गोटी बड़ीं हक़ीक की आती हैं.

कल  आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा है जिसे हम गुरु पूर्णिमा, आषाढ़ी पूर्णिमा, व्यास पूर्णिमा और पुष्टिमार्गीय वैष्णव मंदिरों में कचौरी पूनम के नाम से भी जानते हैं.

Sunday, 26 July 2026

व्रज - विस २०८३ आषाढ़ शुक्ल त्रयोदशी Monday, 27 July 2026

व्रज - विस २०८३ आषाढ़ शुक्ल त्रयोदशी 
Monday, 27 July 2026

श्वेत मलमल का आड़बंद एवं श्रीमस्तक पर गोल छोरवाली पाग के ऊपर (श्वेत खंडेला) श्वेत मोरपंख का दोहरा क़तरा के शृंगार

विशेष – आज श्रीजी को नियम का आड़बंद व श्रीमस्तक पर गोल छोरवाली पाग के ऊपर श्वेत खंडेला (श्वेत मोरपंख का दोहरा कतरा) का श्रृंगार धराया जाता  आज ऊष्णकाल में अंतिम बार आड़बंद धराया जायेगा.

राजभोग दर्शन – 

कीर्तन – (राग : मल्हार)

हों इन मोरनकी बलिहारी l
जिनकी सुभग चंद्रिका माथे धरत गोवर्धनधारी ll 1 ll
बलिहारी या वंश कुल सजनी बंसी सी सुकुमारी l
सुन्दर कर सोहे मोहन के नेक हू होत न न्यारी ll 2 ll
बलिहारी गुंजाकी जात पर महाभाग्य की सारी l
सदा हृदय रहत श्याम के छिन हू टरत न टारी ll 3 ll
बलिहारी ब्रजभूमि मनोहर कुंजन की अनुहारी l
‘सूरदास’ प्रभु नंगे पायन अनुदिन गैया चारी ll 4 ll

साज – आज श्रीजी में श्वेत रंग के मलमल की बिना किनारी की पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया और चरणचौकी के ऊपर सफेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को श्वेत रंग की मलमल का बिना किनारी का आड़बंद धराया जाता है. ठाड़े वस्त्र नहीं धराये जाते हैं.

श्रृंगार – आज प्रभु को छोटा (कमर तक) ऊष्णकालीन हल्का श्रृंगार धराया जाता है. सर्व आभरण मोती के, श्रीमस्तक पर श्वेत मलमल की छोर वाली गोलपाग के ऊपर सिरपैंच, खंडेला (श्वेत मोरपंख का दोहरा कतरा)और बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं.
 श्रीकर्ण में एक जोड़ी मोती के कर्णफूल धराये जाते हैं. श्वेत पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं एवं श्वेत पुष्पों की ही दो मालाजी हमेल की भांति भी धरायी जाती है.
 श्रीहस्त में चार कमल की कमलछड़ी, चाँदी के वेणुजी और एक वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट उष्णकाल का व गोटी छोटी हक़ीक की धरायी जाती हैं.

भक्तवत्सल प्रभु श्रीजी ने अपने सभी भक्तों को मान दिया है एवं अपनी कृपा से व्रज के सभी जीवमात्रों, पेड़-पौधों को कृतार्थ किया है. 
श्री गोवर्धन पर्वत की चारों दिशाओं में 132 वन हैं जिनमें 96 सुगन्धित पुष्प एवं जीवोपयोगी वनौषधियां हैं जिनको कृतार्थ करने के भाव से कल श्रीजी को संध्या-आरती दर्शन में वनमाला धरायी जाएगी. यह वर्ष में केवल एक बार आषाढ़ शुक्ल चतुर्दशी को धरायी जाती है. 
कल प्रभु को ऊष्णकाल में अंतिम बार परधनी धरायी जाएगी.  

Saturday, 25 July 2026

व्रज - विस २०८३ आषाढ़ शुक्ल द्वादशी Sunday, 26 July 2026

व्रज - विस २०८३ आषाढ़ शुक्ल द्वादशी 
Sunday, 26 July 2026

केसरी धोती-पटका और श्रीमस्तक पर छज्जेदार पाग पर गोल चंद्रिका के श्रृंगार 

राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : मल्हार)

व्रज पर नीकी आजघटा l
नेन्ही नेन्ही बुंद सुहावनी लागत चमकत बीजछटा ll 1 ll
गरजत गगन मृदंग बजावत नाचत मोर नटा l
तैसेई सुर गावत आतक पिक प्रगट्यो है मदन भटा ll 2 ll
सब मिलि भेट देत नंदलाल हि बैठे ऊंची अटा l
‘कुंभनदास’ गिरिधरन लाल सिर कसुम्भी पीत पटा ll 3 ll  

साज – आज श्रीजी में श्वेत रंग की प्रभु को पलना झुलाते पूज्य गौस्वामी बालकों के चित्रांकन की पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र - श्रीजी को आजकेसरी धोती एवं राजशाही पटका धराये जाते हैं.

श्रृंगार - प्रभु को आज ऊष्णकालीन हल्का छेड़ान का श्रृंगार धराया जाता है. मोती के सर्व आभरण धराये जाते हैं.
 श्रीमस्तक पर केसरी रंग की छज्जेदार पाग के ऊपर सिरपैंच, लूम, गोल चंद्रिका एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं.
 श्रीकर्ण में मोती के कर्णफूल धराये जाते हैं. 
 तुलसी एवं श्वेत पुष्पों वाली दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती है. कली आदि माला धरायी जाती हैं.
 श्रीहस्त में तीन कमल की कमलछड़ी, झिने लहरिया के वेणुजी एवं वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट राग रंग का एवं गोटी हक़ीक की आती हैं.

Friday, 24 July 2026

व्रज - विस २०८३ आषाढ़ शुक्ल एकादशी Saturday, 25 July 2026

व्रज - विस २०८३ आषाढ़ शुक्ल एकादशी 
Saturday, 25 July 2026

देवशयनी एकादशी (चातुर्मास नियमारम्भ)

मुकुट-काछनी का श्रृंगार

विशेष – आज देवशयनी एकादशी है. 
सनातन धर्म में एकादशी का महत्वपूर्ण स्थान है. प्रत्येक वर्ष चौबीस एकादशी होती हैं.

आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को ही देवशयनी एकादशी कहा जाता है. कहीं-कहीं इस तिथि को 'पद्मनाभा' भी कहते हैं. 

सूर्य के मिथुन राशि में आने पर ये एकादशी आती है. इसी दिन से चातुर्मास का आरंभ माना जाता है. इस दिन से भगवान विष्णु क्षीरसागर में शयन करते हैं और फिर लगभग चार माह बाद तुला राशि में सूर्य के जाने पर उन्हें जगाया जाता है. 
उस दिन को देव प्रबोधिनी एकादशी (देवोत्थापन) कहा जाता है. इस बीच के अंतराल को चातुर्मास कहा जाता है. 

आज से चार माह अर्थात देव प्रबोधिनी एकादशी तक विवाहादि कुछ शुभ कार्य वर्जित होते हैं.

आज श्रीजी को लगभग तीन माह पश्चात इस ऋतु का प्रथम मुकुट-काछनी का श्रृंगार धराया जायेगा.

जब भी मुकुट धराया जाता है वस्त्र में काछनी धरायी जाती है. काछनी के घेर में भक्तों को एकत्र करने का भाव है. 

जब मुकुट धराया जाये तब ठाड़े वस्त्र सदैव श्वेत रंग के होते हैं. ये श्वेत वस्त्र चांदनी छटा के भाव से धराये जाते हैं. 

ज्येष्ठ और आषाढ़ मास की चारों एकादशियों में श्रीजी को गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में लिचोई (मिश्री के बूरे और इलायची पाउडर से सज्जित पतली पूड़ी) अरोगायी जाती है.

इसके अतिरिक्त आज विशेष रूप से द्वितीय गृहाधीश्वर प्रभु श्री विट्ठलनाथजी के घर से अनसखड़ी में श्रीजी के अरोगने हेतु मांडा (मीठी रोटी) और आमरस की सामग्री पधारती हैं जो कि प्रभु को संध्या-आरती में अरोगायी जाती है.

राजभोग दर्शन -

कीर्तन – (राग : मल्हार)

माईरी श्यामघन तन दामिनी दमकत पीताम्बर फरहरे l
मुक्ता माल बगजाल कही न परत छबी विशाल मानिनीकी अरहरे ll 1 ll
मोर मुकुट इन्द्रधनुष्यसो सुभग सोहत मोहत मानिनी धुत थरहरे l
‘कृष्णजीवन’ प्रभु पुरंदर की शोभा निधान मुरलिका की घोर घरहरे ll 2 ll

साज – आज श्रीजी में फ़िरोज़ी मलमल की पतंगी हाशिये की पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की गयी है.

वस्त्र – श्रीजी को आज फ़िरोज़ी रंग का सूथन, काछनी (पतंगी हांशिया की) तथा फ़िरोज़ी रंग का पतंगी हांशिया का रास-पटका धराया जाता है. ठाड़े वस्त्र श्वेत डोरिया के धराये जाते हैं.

श्रृंगार – प्रभु को आज वनमाला (चरणारविन्द तक) का ऊष्णकालीन हल्का श्रृंगार धराया जाता है. मोती के आभरण धराये जाते हैं. 
श्रीमस्तक पर मोती का अद्वितीय मुकुट तथा बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में मयुराकृति कुंडल धराये जाते हैं. 
स्वरुप की बायीं ओर मोती की चोटी धरायी जाती है. 
कली आदि सभी माला धरायी जाती हैं. श्वेत पुष्पों की रंग-बिरंगी थागवाली दो मालाजी धरायी जाती हैं. 
श्रीहस्त में कमलछड़ी, गंगा-जमनी (सोने-चांदी) के वेणुजी एवं दो वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट ऊष्णकाल का व गोटी बड़ी हकीक की आती है.

उत्थापन दर्शन पश्चात नियम का मोगरे की कली का शृंगार 

Thursday, 23 July 2026

व्रज – विस २०८३ आषाढ़ शुक्ल दशमीFriday, 24 July 2026

व्रज – विस २०८३ आषाढ़ शुक्ल दशमी
Friday, 24 July 2026

पीले मलमल का लाल हाशिये का आड़बंद एवं श्रीमस्तक पर पिली छज्जेदार पाग पर क़तरा के श्रृंगार 

राजभोग दर्शन

कीर्तन – (राग : मल्हार)

हों इन मोरनकी बलिहारी l
जिनकी सुभग चंद्रिका माथे धरत गोवर्धनधारी ll 1 ll
बलिहारी या वंश कुल सजनी बंसी सी सुकुमारी l
सुन्दर कर सोहे मोहन के नेक हू होत न न्यारी ll 2 ll
बलिहारी गुंजाकी जात पर महाभाग्य की सारी l
सदा हृदय रहत श्याम के छिन हू टरत न टारी ll 3 ll
बलिहारी ब्रजभूमि मनोहर कुंजन की अनुहारी l
‘सूरदास’ प्रभु नंगे पायन अनुदिन गैया चारी ll 4 ll

साज – आज श्रीजी में पीले मलमल की लाल हाशिये की पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की गयी है.

वस्त्र – आज श्रीजी को पीले मलमल का लाल हाशिये का आड़बंद धराया जाता है.

श्रृंगार – आज प्रभु को छोटा (कमर तक) ऊष्णकालीन हल्का श्रृंगार धराया जाता है. 
मोती के सर्व आभरण धराये जाते हैं. 
श्रीमस्तक पर पीले रंग की छज्जेदार पाग के ऊपर सिरपैंच, क़तरा एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. 
श्रीकर्ण में एक जोड़ी मोती के कर्णफूल धराये जाते हैं. 
श्वेत पुष्पों एवं तुलसी की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं वहीँ दो मालाजी हमेल की भांति भी धरायी जाती है. 
श्रीहस्त में तीन कमल की कमलछड़ी, सुवा वेणुजी एवं एक वेत्रजी धराये जाते हैं. पट ऊष्णकाल का गोटी हक़ीक की छोटी आती है.

Wednesday, 22 July 2026

व्रज – विस २०८३ आषाढ़ शुक्ल नवमी (द्वितीय)Thursday, 23 July 2026

व्रज – विस २०८३ आषाढ़ शुक्ल नवमी (द्वितीय)
Thursday, 23 July 2026

मल्लकाछ टिपारा का श्रृंगार

मल्लकाछ (मल्ल एवं कच्छ) दो शब्दों से बना है और ये एक विशेष पहनावा है जो आम तौर पर पहलवान मल्ल (कुश्ती) के समय पहना करते हैं. 
सामान्यतया वीर-रस का यह श्रृंगार पराक्रमी प्रभु की चंचलता प्रदर्शित करने की भावना से धराया जाता है.

कीर्तन – (राग : मल्हार)

वृन्दावन कनकभूमि नृत्यत व्रज नृपतिकुंवर l
उघटत शब्द सुमुखी रसिक ग्रग्रतततत ता थेई थेई गति लेत सुधर ll 1 ll
लाल काछ कटि किंकिणी पग नूपुर रुनझुनत बीच बीच मुरली धरत अधर l
‘गोविंद’ प्रभु के जु मुदित संगी सखा करत प्रसंशा प्रेमभर ll 2 ll 

 साज – आज श्रीजी में माखनचोरी लीला के सुन्दर चित्रांकन से सुसज्जित सुन्दर पिछवाई धरायी जाती है जिसमें कृष्ण-बलराम अपने मित्रों के साथ मल्लकाछ-टिपारा का श्रृंगार धराये माखन चोरी कर रहे हैं. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – श्रीजी को आज सुआपंखी मलमल का रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी वाला मल्लकाछ एवं पटका धराया जाता है. इसी प्रकार अंगूरी रंग का रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी वाला पटका भी धराया जाता है. इस श्रृंगार को मल्लकाछ-टिपारा एवं दोहरा पटका का श्रृंगार कहा जाता है. ठाड़े वस्त्र गुलाबी रंग के धराये जाते हैं.

श्रृंगार – आज प्रभु को श्रीकंठ का शृंगार छेड़ान (हल्का) बाक़ी मध्य का (घुटने तक) ऊष्णक़ालीन श्रृंगार धराया जाता है. मोतियों के सर्व आभरण धराये जाते हैं. श्रीमस्तक पर टिपारा का साज (सुआपंखी मलमल की टिपारा की टोपी के ऊपर मध्य में मोरशिखा और दोनों ओर दोहरा कतरा) तथा बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में मयुराकृति कुंडल धराये जाते हैं. 
हांस, त्रवल, पायल कड़ा हस्तसाखलाआदि धराये जाते हैं. श्रीकंठ में श्वेत माला धरायी जाती है. श्वेत पुष्पों की विविध पुष्पों की थागवाली दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती है.
 श्रीहस्त में कमल के फूल की छड़ी, सुवा के वेणुजी तथा दो वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट उष्णकाल का व गोटी हक़ीक की आती है. 

Tuesday, 21 July 2026

व्रज – विस २०८३ आषाढ़ शुक्ल नवमीWednesday, 22 July 2026

व्रज – विस २०८३ आषाढ़ शुक्ल नवमी
Wednesday, 22 July 2026

 आज कछु कुंजनमें बरबासी ।
दलबादरमें देख सखीरी चमकत है चपलासी ।।१।।
न्हेनी न्हेनी बूदंन बरखन लागी पवन चलत सुखरासी ।
मंद मंद गरजन सुनियत है नाचत मोर कलासी ।।२।।

अधरंग (गहरे पतंगी) मलमल की परधनी एवं श्रीमस्तक पर गोल पाग और चमकनी गोल चंद्रिका के श्रृंगार 

राजभोग दर्शन –
 
कीर्तन – (राग : मल्हार)

कुंवर चलोजु आगे गहवरमें जहाँ बोलत मधुरे मोर l
विकसत वनराजी कोकिला करत रोर ।।१।।
मधुरे वचन सुनत प्रीतम के लीनो प्यारी चितचोर l
‘गोविंद’ बलबल पिय प्यारी की जोर ।।२।।

 साज – आज श्रीजी में श्री गिरिराजजी की कन्दरा में निकुंजलीला के सुन्दर चित्रांकन से सुशोभित पिछवाई धरायी जाती है जिसमें श्री स्वामिनीजी, श्री यमुनाजी एवं श्री गोपीजन श्रीप्रभु की सेवा में रत है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी के ऊपर सफ़ेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र - श्रीजी को अधरंग (गहरे पतंगी) मलमल की परधनी धरायी जाती है. ठाड़े वस्त्र नहीं धराये जाते हैं.

श्रृंगार - प्रभु को आज छोटा (कमर तक) ऊष्णकालीन हल्का श्रृंगार धराया जाता है. 
हीरा के सर्व आभरण, श्रीमस्तक पर अधरंग (गहरे पतंगी) रंग की गोल पाग के ऊपर सिरपैंच, लूम तथा चमकनी गोल चंद्रिका और बायीं ओर शीशफूल धराया जाता है.
 श्रीकर्ण में हीरा के कर्णफूल की एक जोड़ी धराये जाते हैं.
पीले पुष्पों की रंगीन थाग वाली दो कलात्मक सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं. इसी प्रकार दो मालाजी हमेल की भांति धरायी जाती है. 
श्रीहस्त में कमलछड़ी, चाँदी के वेणुजी एवं एक वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट ऊष्णकाल का एवं गोटी हक़ीक की आती है.

व्रज - विस २०८३ आषाढ़ शुक्ल चतुर्दशी Tuesday, 28 July 2026

व्रज - विस २०८३ आषाढ़ शुक्ल चतुर्दशी  Tuesday, 28 July 2026 ऋतु की अंतिम श्वेत मलमल की परधनी एवं श्रीमस्तक पर श्वेत फेटा और मोरपंख का दोहरा क...