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Tuesday, 13 October 2026

व्रज –विस २०८३ आश्विन शुक्ल चतुर्थी (दुहरा मनोरथ)Wednesday, 14 October 2026

व्रज –विस २०८३ आश्विन शुक्ल चतुर्थी (दुहरा मनोरथ)
Wednesday, 14 October 2026

चौथौ विलास कियौ श्यामाजू,
परासौली बन माँई ।
ताके वृक्षलता द्रुमवेली,
तन पुलकित आनंद न समाईं ।।१।।
चंद्रभगा मुख्य यथावलि,
अपनी सखी सब न्यौति बुलाई ।
खंडमंडा,जलेबी लडुआ,
प्रत्येक अंगकौ भाव जनाई ।।२।।
साज कियौ पूजन देविकौ,
बहू उपहार भेट लै आई ।
खेलन चली बनी तिहिंशोभा,
ज्यों धनमें चपला चमकाई ।।३।।
पोहोंची जाय दरस देवी तब है,
गये श्यामकिशोर कन्हाई ।
मनकौ चीत्यौ भयौ लालनकौ,
हास बिलास करत किलकाई ।।४।।
श्यामाश्याम भुज भर भेटे,
तृण तोरत,और लेत बलाई ।
कही न जाय शोभा ता सुख की.
कुंजन दुरे रसिक निधिपाई ।।५।।

विशेष – आज चतुर्थ विलास का लीलास्थल परासोली है. आज के मनोरथ की मुख्य सखी चंद्रभागाजी हैं और सामग्री खरमंडा, जलेबी और लड्डू हैं यद्यपि ये भोगक्रम श्रीजी में नहीं होता परन्तु कई अन्य गृहों में यह सेवाक्रम होता है.

ठाकुरजी को आज केसरी डोरिया के घेरदारवस्त्र भी दोहरी किनारी वाले धराये जाते हैं. प्रभु समक्ष वेणुजी, वैत्रजी भी दो धराये जाते हैं.

कीर्तन भी दोगुने होते हैं.आज पूरे दिन झांझ (एक प्रकार का वाध्य) बजे
ग्वाल समय होने वाले धूप दीप भी दो बार होते हैं.
मंगलाभोग से ले कर संध्या आरती के पश्चात धैया (दूध) अरोगे तब तक सभी ‘नित्य-नियम के भोग’ भी दोहरा (दोगुना) अरोगाये जाते हैं. 

शयन भोग में पुनः भोग का क्रम पूर्ववत हो जाता है. केवल शयन की बासोंदी दोहरी अरोगायी जाती है.

श्रीजी को आज गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में विशेष रूप से नवविलास के भाव से केशर की चाशनी युक्त घेवर व प्राकट्योत्सव के भाव से केशर-युक्त जलेबी के टूक और विशेष रूप से दूधघर में सिद्ध की गयी केसर युक्त बासोंदी की दो हांडियां अरोगायी जाती है.

राजभोग समय अनसखड़ी में दाख (किशमिश) और दूसरा केले का रायता अरोगाया जाता है. 

राजभोग में नियम का सभी सखड़ी महाप्रसाद भी दोहरा (दोगुना) अरोगाया जाता है जिसमें विशेष मीठा में बूंदी प्रकार आरोगाया जाता हैं.

आज की एक अति विशिष्ट प्राचीन परम्परा है कि आज के द्वितीय गृहाधीश्वर प्रभु श्री विट्ठलनाथजी व तृतीय गृहाधीश्वर श्री द्वारकाधीश प्रभु को धराये जाने वाले केसर से रंगे डोरिया के वस्त्र भी श्रीजी से सिद्ध होकर जाते हैं. इसके साथ प्रभु के अरोगवे की सामग्री भी पधारती है. 
प्रधानगृह, द्वितीय गृह और तृतीय गृह में पधारने वाले ये वस्त्र विगत आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को केसर से रंगे जाते हैं.
 
वर्ष में केवल दो बार श्रीजी से इन दोनों गृहों के वस्त्र पधारते हैं.

राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : सारंग)

सदा व्रजहीमें करत विहार l
तबके गोप भेख वपु धार्यो अब द्विजवर अवतार ll 1 ll
तब गोकुलमें नंदसुवन अब श्रीवल्लभ राजकुमार l
आपुन चरित्र सिखावत औरन निजमत सेवा सार ll 2 ll
युगलरूप गिरिधरन श्रीविट्ठल लीला ईक अनुसार l
‘चत्रभुज’ प्रभु सुख शैल निवासी भक्तन कृपा उदार ll 3 ll

साज – श्रीजी में आज नन्दमहोत्सव और छठी पूजन के चित्रांकन वाली पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया और चरणचौकी पर सफेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को केसरी घेरदार वागा, रुपहली ज़री की तुईलैस की दोहरी किनारी वाला जामदानी का सूथन, चोली, एवं पटका धराये जाते हैं. पटका का एक छोर ऊर्ध्व भुजा की ओर और एक शैया मन्दिर की और धराया जाता है. 
ठाड़े वस्त्र श्वेत रंग के जामदानी के धराये जाते है.

श्रृंगार – आज श्रीजी को छोटा (कमर तक) भारी श्रृंगार धराया जाता है. हीरे एवं पन्ना के सर्व आभरण धराये जाते हैं. 

श्रीमस्तक पर केसरी रंग के डोरिया की गोल पाग के ऊपर सिरपैंच, लूम की सुनहरी किलंगी एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. 
श्रीकर्ण में पन्ना के कर्णफूल धराये जाते हैं. विविध पुष्पों की चार सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं. 
आज अलक धराया जाता हैं.
श्रीहस्त में दो कमलछड़ी, पन्ना एवं हरे मीना के दो वेणुजी एवं वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट गोटी राग रांग की आती हैं.

Monday, 12 October 2026

व्रज - विस २०८३ आश्विन शुक्ल तृतीयाTuesday, 13 September 2026

व्रज - विस २०८३ आश्विन शुक्ल तृतीया
Tuesday, 13 September 2026

तृतिय विलास कियो श्यामाजू प्रविन ।
खेलनको उत्साह सखी एकत्र किन ।।१।।
तिनमे मुख्यसखी विशाखाजू ऐन ।
चलीनिकुंज महेलमें कोकिला ज्यौं बैंन ।।२।।
भोग धरी सँवार बासोंधी सनी । 
कुसुमरंग अनेक गुही कामिनी ।।३।।
गानस्वर कियो बनदेवी बिहार । 
नव त्रियाकौ वेष कोटि काम वार ।।४।।
ढिंग आसन कराय प्यारीकों बेठाय । 
दोउ एकत्र किन निरखत लेत बलाय ।।५।।
यह लीलाको द्यान मम ह्रदय ठहराय । 
देखत सुरनर मुनिभूले रसिक बलबल जाय ।।६।।

विशेष – आज तृतीय विलास का लीला स्थल निकुंज महल है. आज के मनोरथ की मुख्य सखी विशाखाजी हैं और सामग्री बासुंदी है. यद्यपि यह सामग्री श्रीजी में नहीं अरोगायी जाती परन्तु कई गृहों में प्रभु स्वरूपों को अरोगायी जाती है.

आज श्रीजी को गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में ‘चाशनीयुक्त कूर के गुंजा’ अरोगाये जाते हैं l
यह एक समोसे जैसी सामग्री है जिसके भीतर कूर (घी में सेका कसार और कुछ सूखा मेवा) भरा होता है. इसके ऊपर चाशनी चढ़ी होती है 

राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : सारंग)

बैठे हरि राधा संग कुंजभवन अपने रंग
कर मुरली अधर धरे सारंग मुख गाई l
मोहन अति ही सुजान परम चतुर गुन निधान
जान बुझ एक तान चूकके बजाई ll 1 ll
प्यारी जब गह्यो बीन सकल कला गुन प्रवीन 
अति नवीन रूप सहित, वही तान सूनाई ll 2 ll
‘वल्लभ’ गिरिधरन लाल रिझ दई अंकमाल
कहत भले भले जु लाल सुंदर सुखदाई ll 3 ll

साज – श्रीजी को आज हरे रंग के छापा की रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित हांशिया वाली पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया और चरणचौकी पर सफेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को लाल छापा का, सुनहरी ज़री की तुईलैस की किनारी वाला सूथन और इसी प्रकार हरे रंग के छापा के वस्त्र पर रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी वाले खुलेबंद के चाकदार वागा धराये जाते हैं. ठाड़े वस्त्र श्याम रंग के धराये जाते हैं.

श्रृंगार – प्रभु को आज छेड़ान का (घुटने तक) हल्का श्रृंगार धराया जाता है. मोती के सर्व आभरण धराये जाते हैं. 
श्रीमस्तक पर लाल रंग की की छज्जेदार पाग के ऊपर सिरपैंच, जमाव का नागफणी का कतरा व लूम और तुर्री सुनहरी जरी की एवं बायीं ओर शीशफूल धराया जाता है. श्रीकर्ण में कर्णफूल के दो जोड़ी धराये जाते हैं.
 श्वेत रंग के पुष्पों की रंग-बिरंगी थागवाली दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती है.
 श्रीहस्त में कमलछड़ी, चाँदी के वेणुजी और दो वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट हरा व गोटी चाँदी की आती है. 

Sunday, 11 October 2026

व्रज - विस २०८३ अश्विन शुक्ल द्वितीया Monday, 12 October 2026

व्रज - विस २०८३ अश्विन शुक्ल द्वितीया 
Monday, 12 October 2026

द्वितीय विलास कियौ श्यामाजू, खेल
समस्या कीनी ।
ताकी मुख्य सखी ललिताजू, आनंद महारस भीनी ।। १ ।।
चली संकेत बिहार करन बलि, पूजा साजि संपूरन ।
बहु उपहार भोग पायस लै, बाँह हलावत मूर ।।२।।
मंदिर देवी गान करत यश, आय मिले गिरिधारी ।
मन कौ भायौ भयौ सबन कौ, काम वेदना टारी ।।३।।
स्यामा कौ शृंगार श्याम कौ,
ललिता नीवी खोली ।
लीला निरखत दास रसिकजन, श्रीमुख
स्यामा बोली ।। ४ ।।

द्वितीय विलास के अंतर्गत सेहरा के श्रृंगार ,

नवविलास के अंतर्गत द्वितीय विलास के आधार पर आज द्वितीय विलास की भावना का स्थल व्रज में संकेत वन है. आज के मनोरथ की मुख्य सखी श्री ललिताजी है और सामग्री खीर की है. यद्यपि यह सामग्री श्रीजी में नहीं अरोगायी जाती परन्तु कई गृहों में नवविलास में अरोगायी जाती है.

आज श्रीजी प्रभु को नियम के पीले छापा के वस्त्र, पीला खूंट का दुमाला के ऊपर हीरा का सेहरा और आभरण में विशेष पन्ना के कुंडल व पन्ना की जोड़ी धरायी जाती है.
लगभग 2 माह 12 दिन पश्चात प्रभु आज पुनः सेहरा का श्रृंगार धरायेंगे. 
पूर्व में श्रावण कृष्ण षष्ठी के दिन भी संकेत वन में प्रभु सेहरा का श्रृंगार धरा कर श्रीस्वामिनीजी के संग झूले थे. 
आज भी प्रभु संकेत वन में ही स्वामिनीजी संग मंडप में विराजे हैं.

प्रभु को आज गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में विशेष रूप से बाबर (सूखे घेवर के ऊपर ठंडा घी और मिश्री का बूरा डाल कर बनाया खाद्य) का भोग अरोगाया जाता है.

राजभोग में सखड़ी भोग में खंडरा प्रकार अरोगाये जाते हैं.

राजभोग दर्शन – 

कीर्तन – (राग : सारंग)

दिन दुल्है मेरो कुंवर कन्हैया l 
नित उठ सखा सिंगार बनावत नितही आरती उतारत मैया ll 1 ll
नित उठ आँगन चंदन लिपावे नित ही मोतिन चौक पुरैया l
नित ही मंगल कलश धरावे नित ही बंधनवार बंधैया ll 2 ll
नित उठ व्याह गीत मंगलध्वनि नित सुरनरमुनि वेद पढ़ैया l
नित नित होत आनंद वारनिधि नित ही ‘गदाधर’ लेत बलैया ll 3 ll

साज – श्रीजी में आज संकेत वन में विवाह लीला के चित्रांकन वाली पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया और चरणचौकी पर सफेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – श्रीजी को आज लाल रंग की छापा की सुनहरी ज़री की तुईलैस की किनारी वाली धोती और इसी प्रकार का राजशाही पटका धराया जाता है. आज के वस्त्र विशिष्ठता लिए हुए है. आज विशेष रूप से धोती के ऊपर पीले रंग के छापा का रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी वाला खुलेबंद के चाकदार वागा एवं चोली भी धराये जाते हैं. ठाड़े वस्त्र मेघश्याम रंग के धराये जाते हैं.

श्रृंगार – प्रभु को आज वनमाला (चरणारविन्द तक) का भारी श्रृंगार धराया जाता है.पन्ना तथा जड़ाव सोने के सर्व आभरण धराये जाते हैं.
 श्रीमस्तक पर पीले रंग का छापा का खूंट का दुमाला के ऊपर हीरो का सेहरा एवं बायीं ओर शीशफूल धराया जाता है. दायीं ओर सेहरे की मोती की चोटी धरायी जाती है. श्रीकर्ण में पन्ना के मकराकृति कुंडल धराये जाते हैं.
कस्तूरी कली एवं कमल माला धराई जाती हैं.
 श्वेत रंग के पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती है.
 श्रीहस्त में कमलछड़ी, हरे मीना के वेणुजी और दो वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट लाल व गोटी राग रांग की आती हैं.

Saturday, 10 October 2026

व्रज – विस २०८३ आश्विन शुक्ल प्रतिपदा Sunday, 11 October 2026

व्रज – विस २०८३ आश्विन शुक्ल प्रतिपदा 
Sunday, 11 October 2026

प्रथम विलास कियो श्यामाजू 
                  किनौ विपिन विहारजू ।।
उनके बिधकी शोभा बरनो 
               कहत न आवे पारजू ।।१।।
बाके युथकी गणना नाहीं
                      निर्गुण भक्ति कहावे ।।
तारी संख्या कहत न आवै
                    शेषहू पार न पावे ।।२।।
घोषघोष प्रति गलिनगलिन प्रति
                         रंगरंग अंबर साजें ।।
कियौ शृंगार नखशिख अंग युवती
              ज्यों करनी गण साजें ।।३।।
बहु पूजा लै चली वृंदावन
                        पान फूल पकवानै ।।
तारे यूथ मुख्य संजावलि 
                     चंद्रकलासी बानै ।।४।।
पोहौंची जाय निकुंज भवनमें
                             दरसी वृंदादेवी ।।
तारे पद बदन करि माँग्यौ
                श्याम सुंदर वर एवा ।।५।।
तिहिंछिन प्रभुजी आप पधारे
                     कोटिक मन्मथ मोहै ।।
अंगअंग प्रति रुपरुप प्रति
              उपमा रवि शशि कोहै ।।६।।
द्वैजुग जाम श्याम श्यामा संग
                   केलि बिबिध रंग कीने ।।
उठत तरंग रंगरस उछलित 
               दास रसिक रस पीने ।।७।।

आजसे नौ दिन तक नव विलास की भाव भावना का आनंद ले

आश्विन नवरात्रि स्थापना, नवविलास आरम्भ

श्री हरिराय महाप्रभु ने इस नवविलास के भाव से नव पद की रचना की है. हालांकि श्रीजी मंदिर में ये पद नहीं गाये जाते परन्तु अन्यत्र कई वैष्णव मंदिरों में प्रतिदिन एक विलास गाया जाता है.

आज प्रथम विलास की भावना का स्थल निकुंजभवन है. आज के मनोरथ की मुख्य सखी चन्द्रावलीजी है. आज से मुरली एवं रास के पद गाये जाते हैं. इकाइयों के पद सायं भोग समय गाये जाते हैं और रास-पंचाध्यायी का पाठ भोग दर्शन का टेरा आये पश्चात एवं प्रभु शयन भोग अरोगें तब किया जाता है.

आज श्रीजी को नियम के लाल छापा के केसरी सूथन, चोली एवं चाकदार वागा और श्रीमस्तक पर कुल्हे धरायी जाती है.

श्रीजी को गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में विशेष रूप से चन्द्रकला (सूतर फेणी) और विशेष रूप से दूधघर में सिद्ध की गयी केसर-युक्त बासोंदी की हांडी अरोगायी जाती है. 
राजभोग में अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता अरोगाया जाता है.भोग आरती में फीका में चालनी (तला हुआ मेवा )आरोगाया जाता हैं.
सखड़ी में केसरी पेठा व मीठी सेव खडंरा प्रकार इत्यादि अरोगाया जाता हैं.

आज से प्रतिदिन दोनों अनोसर में सिंहासन से शैयाजी तक पेंडा (रुई से भरी पतली गादी) बिछाई जाती है जिससे हल्की ठंडी भूमि पर ठाकुरजी को शीत का आभास ना हो.

राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : सारंग)

बल बल आज की बानिक लाल l
कसुम्भी पाग पीत कुलह भरित कुसुम गुलाल ll 1 ll
विश्वमोहन नवकेसर को तिलक ललित भाल l
सुन्दर मुख कमल हि लपटावत मधुप जाल ll 2 ll
बरुनी पीत विथुरित बंद सुभग उर विसाल l
‘गोविंद’ प्रभुके पदनख परसत तरुन तुलसीमाल ll 3 ll

साज – आज श्रीजी में लाल रंग की छापा की त्रिशूल वाली सफेद ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित एवं हरे रंग के हांशिया वाली (किनारी वाली) पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया और चरणचौकी पर सफेद बिछावट की जाती है. 
सिंहासन, चरणचौकी, पड़घा, झारीजी, बंटाजी आदि सर्वसाज जड़ाव स्वर्ण के धरे जाते हैं. 
प्रभु के सम्मुख चांदी की त्रस्टीजी धरे जाते हैं जो कि दिन के अनोसर में ही धरे जाते हैं. 

वस्त्र – आज श्रीजी को लाल छापा का, रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी की चाकदार एवं चोली धरायी जाती है. सूथन हरे रंग का आता हैं.
ठाड़े वस्त्र श्वेत रंग के धराये जाते हैं.

श्रृंगार – प्रभु को आज वनमाला (चरणारविन्द तक) का भारी श्रृंगार धराया जाता है. हीरे एवं जड़ाव स्वर्ण के सर्व-आभरण धराये जाते हैं.
 श्रीमस्तक पर लाल छापा के कुल्हे के ऊपर सिरपैंच, पांच मोरपंख की चन्द्रिका की जोड़ और बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. बायीं ओर हीरा की चोटी धरायी जाती है. श्रीकर्ण में हीरा के मकराकृति कुंडल धराये जाते हैं. पीठिका के ऊपर प्राचीन हीरा का जड़ाव का चौखटा सुशोभित होता है. 
एक दुलड़ा एवं सतलड़ा धराया जाता हैं.
नीचे सात पदक एवं ऊपर हीरा पन्ना, मानक एवं मोती के हार धराए जाते है 
कली, कस्तूरी आदि सभी माला धरायी जाति हैं.रंग-बिरंगी पुष्पों की सुन्दर मालाजी धरायी जाती है.
श्रीहस्त में कमलछड़ी, हीरे के वेणुजी एवं दो वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट उत्सव का एवं गोटी सोने की जाली वाली आती हैं.
 आरसी श्रृंगार में चार झाड़ की एवं राजभोग में सोना की डाँडी की दिखाई जाती है.

Friday, 9 October 2026

व्रज – विस २०८३ आश्विन कृष्ण अमावस्या Friday, 10 October 2026

व्रज – विस २०८३ आश्विन कृष्ण अमावस्या 
Friday, 10 October 2026

अहो विधना तोपै अँचरा पसार माँगू, जनम-जनम दिजौ याहि बृज बसिबौ।
अहिर की जात समीप नन्दघर, घरि-घरि घनस्याम सौं हेरि -हेरि हसिबौ॥
दधि के दान मिष बृजकी बिथीन माँझ झकझौरन अँग-अँगकौ परसिबौ। 
छीतस्वामी गिरधारी विठ्ठलेश वपुघारी,सरदरैंन माँझ रस रास कौ बिलसिबौ॥

सर्वपितृ अमावस्या,
सायं कोट की आरती, सांझी की समाप्ति

विशेष – आज सर्वपितृ अमावस्या है. पुष्टिमार्ग में आज दानलीला का अंतिम दिन है और इस कारण श्रीजी में आज श्री हरिरायजी कृत बड़ी दानलीला गायी जाती है.

आज श्रृंगार दर्शन में जब प्रभु को आरसी दिखावें तब स्वरुप से भी लम्बी एक लकुटी (छड़ी) प्रभु के निकट धरी जाती है जिसका भाव यह है कि भारी श्रृंगार के रहते प्रभु उछल के मटकी नहीं फोड़ पाएंगे अतः लम्बी लकुटी (छड़ी) पास में होगी होगी तो खड़े-खड़े ही प्रभु मटकी फोड़ देंगे. दान के दिनों में जब भी वनमाला का भारी श्रृंगार धरा जावे तब यह छड़ी श्रीजी के निकट धरी जाती है.
आज प्रभु द्वारा दूधघर का महादान अंगीकार किया जाता है.

गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में आज श्रीजी को शाकघर और दूधघर में विशेष रूप से सिद्ध किये गये दूध, दही, केशरिया दही, श्रीखंड, केशरी बासोंदी, मलाई बासोंदी, गुलाब-जामुन, छाछ, खट्टा-मीठा दही के बटेरा आदि अरोगाये जाते हैं. 
दान के अन्य दिनों के अपेक्षा आज प्रभु को दूधघर की कई गुना अधिक हांडियां अरोगायी जाती है. 

राजभोग दर्शन – 

कीर्तन – (राग : सारंग)

दान निवेरी लाल घर आये l
आरती करत नंदजु की रानी और हँसी हँसी मंगल गीत गवाये ll 1 ll
ऐसे वचन सुने में श्रवणन बड़े महरि के पुत कहावे l
फिर फिर राय बात हँसि बूझत हमको कहौ कहा तुम लाये ll 2 ll
लाऊ कहा सुनों किन में छीन छीन सबकी दधि खाये l
‘श्रीविट्ठल गिरिधरलालने’ बातन ही दोऊ बौराये ll 3 ll

साज – आज श्रीजी में श्याम रंग की मलमल पर सुनहरी सूरजमुखी के फूल के छापा और सुनहरी ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया और चरणचौकी पर सफेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – श्रीजी को आज कोयली रंग की मलमल पर सुनहरी ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित सूथन, काछनी एवं रास-पटका धराया जाता है. ठाड़े वस्त्र सफेद जमदानी के होते हैं.

श्रृंगार – आज प्रभु को वनमाला (चरणारविन्द तक) का भारी श्रृंगार धराया जाता है. जड़ाव सोने के सर्व आभरण धराये जाते हैं.
 श्रीमस्तक पर नीलम जड़ित स्वर्ण का मुकुट और मुकुट पर मुकुट पिताम्बर एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में मयूराकृति कुंडल धराये जाते हैं. 
कस्तूरी कली एवं कमल माला धराई जाती हैं.
पीले एवं श्वेत पुष्पों की कलात्मक थागवाली दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती है. 
श्रीहस्त में कमलछड़ी, सोने के वेणुजी दो वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट स्याम व गोटी दान की आती है. 

Thursday, 8 October 2026

व्रज – विस २०८३ आश्विन कृष्ण चतुर्दशी Friday, 09 October 2026

व्रज – विस २०८३ आश्विन कृष्ण चतुर्दशी 
Friday, 09 October 2026

ऋतु का छेला (अंतिम) पिछोड़ा का शृंगार

भोपालशाही लहरियाँ का पिछोड़ा एवं श्रीमस्तक पर गोल पाग पर बाँकी गोल चंद्रिका के  श्रृंगार

राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : सारंग)

कृपा अवलोकन दान देरी महादान वृखभान दुल्हारी । 
तृषित लोचन चकोर मेरे तू व बदन इन्दु किरण पान देरी ॥१॥
सबविध सुघर सुजान सुन्दर सुनहि बिनती कानदेरी ।
गोविन्द प्रभु पिय चरण परस कहे जाचक को तू मानदेरी ॥२॥

साज – आज श्रीजी में श्री गोवर्धन शिखर, सांकरी खोर, गौरस बेचने जाती गोपियों एवं श्री ठाकुरजी एवं बलरामजी मल्लकाछ-टिपारा धराये भुजदंड से मटकी फोड़ने के लिए श्रीहस्त की छड़ी ऊंची कर रहे हैं एवं मटकी में से गौरस छलक रहा है ऐसे सुन्दर चित्रांकन वाली दानलीला की पिछवाई धरायी है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफेद रंग की बिछावट की गयी है.

वस्त्र – श्रीजी में आज भोपालशाही लहरियाँ का पिछोड़ा धराया जाता है. ठाड़े वस्त्र श्याम रंग के होते हैं.

श्रृंगार – श्रीजी को आज छोटा (कमर तक) हल्का श्रृंगार धराया जाता है. हीरा के सर्वआभरण धराये जाते हैं. 
श्रीमस्तक पर पचरंगी लहरियाँ की गोल पाग के ऊपर सिरपैंच, बाँकी गोल चंद्रिका एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में एक जोड़ी कर्णफूल धराये जाते हैं. 
पीले पुष्पों की दो मालाजी धरायी जाती है इसी प्रकार श्वेत पुष्पों की दो मालाजी हमेल की भांति भी धरायी जाती हैं. 
श्रीहस्त में कमलछड़ी, झीने लहरियाँ के वेणुजी एवं दो वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट लाल एवं गोटी चाँदी की धराई जाती हैं.

Wednesday, 7 October 2026

व्रज – विस २०८३ आश्विन कृष्ण त्रयोदशी Thursday, 08 October 2026

व्रज – विस २०८३ आश्विन कृष्ण त्रयोदशी 
Thursday, 08 October 2026

नित्यलीलास्थ गौस्वामी बालकृष्णजी का उत्सव

विशेष – आज श्री गुसांईजी के तृतीय पुत्र बालकृष्णजी का उत्सव है. 

श्रीजी को दान की हांडियों के अतिरिक्त गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में विशेष रूप से दूधघर में सिद्ध की गयी केसर युक्त बासोंदी की हांडी अरोगायी जाती है. राजभोग में अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता भोग लगाया जाता है.

श्री गुसांईजी के सभी सात पुत्रों के जन्मोत्सव सभी गृहों में मनाये जाते हैं परन्तु आपश्री तृतीय गृहाधीश्वर प्रभु श्री द्वारकाधीशजी के आचार्य थे अतः आज का उत्सव श्री द्वारकाधीश मंदिर (कांकरोली) में भव्य रूप से मनाया जाता है और इस अवसर पर वहां से जलेबी के टूक की सामग्री श्रीजी के भोग हेतु आती है.

राजभोग दर्शन – 

कीर्तन – (राग : सारंग)

श्रीवल्लभ नंदन रूप अनूप स्वरुप कह्यो न जाई l
प्रकट परमानंद गोकुल बसत है सब जगत के सुखदाई ll 1 ll
भक्ति मुक्ति देत सबनको निजजनको कृपा प्रेम बरखत अधिकाई l
सुखद एक रसना कहां लो वरनो ‘गोविंद’ बलबल जाई ll 2 ll

साज – आज श्रीजी में केसरी रंग की मलमल पर लाल रंग की गायों, हरे रंग की लता के भरतकाम वाली एवं लाल रंग के हांशिया से सुसज्जित पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया और चरण चौकी पर सफेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – श्रीजी को आज केसरी रंग की मलमल का रूपहरी किनारी से सुशोभित पिछोड़ा धराया जाता है. ठाड़े वस्त्र मेघश्याम रंग के धराये जाते हैं. 

श्रृंगार – श्रीजी को आज वनमाला (चरणारविन्द तक) का भारी श्रृंगार धराया जाता है. माणक तथा जड़ाव सोने के सर्व आभरण धराये जाते हैं.
 श्रीमस्तक पर केसरी रंग की कुल्हे के ऊपर सिरपैंच, सुनहरी चमक का घेरा एवं बायीं ओर शीशफूल धराया जाता है. श्रीकर्ण में मकराकृति कुंडल धराये जाते हैं. बायीं ओर मोती की चोटी (शिखा) धरायी जाती है. 
श्वेत पुष्पों और कमल की थागवाली दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती है.
 श्रीहस्त में कमलछड़ी,माणक के वेणुजी और दो वेत्रजी (एक स्वर्ण का)धराये जाते हैं.
पट पिला एवं गोटी श्याम मीना की आती हैं. आरसी शृंगार में पिले खंड की एवं राजभोग में सोना की डाँडी की दिखाई जाती है.

व्रज –विस २०८३ आश्विन शुक्ल चतुर्थी (दुहरा मनोरथ)Wednesday, 14 October 2026

व्रज –विस २०८३ आश्विन शुक्ल चतुर्थी (दुहरा मनोरथ) Wednesday, 14 October 2026 चौथौ विलास कियौ श्यामाजू, परासौली बन माँई । ताके वृक्षलता द्रुम...