व्रज – विस २०८३ भाद्रपद शुक्ल एकादशी
Tuesday, 23 September 2026
दान (परिवर्तिनी) एकादशी, दान आरंभ, दश-दिंगत विजयी नित्यलीलास्थ श्री पुरुषोत्तमजी का उत्सव
वामन जयंती
आज परिवर्तिनी एकादशी है जिसे पद्मा एकादशी भी कहा जाता है. पद्म पुराण के अनुसार चतुर्मास के दौरान आने वाली इस एकादशी का महत्व देवशयनी और देवप्रबोधिनी एकादशी के समान है.
इस दिन भगवान विष्णु चतुर्मास के शयन के दौरान करवट लेते हैं इसलिए देवी-देवता भी इनकी पूजा करते हैं.
आज के दिन दान देने और प्रभु को दान की सामग्री अरोगाने से देह की दशा में परिवर्तन होता है.
इसके अलावा आज वामन जयंती भी है.
जिस साल दान एकादशी और वामन जयंती एक दिन हो तब दान एकादशी के सेवाक्रम को प्राथमिकता दी जाती है क्योंकि दान लीला पूर्ण रूप से पुष्टिमार्ग की लीला है.
यद्यपि आज वामन द्वादशी के राग, भोग और दो राजभोग का क्रम आज ले लिया जाएगा.
वामन जयंती के श्रृंगार का क्रम अगले दिन लिया जाएगा.
अपने पांडित्य से दसों-दिशाओं में पुष्टिमार्ग की यश पताका फहराने वाले ‘दश-दिंगत विजयी’, नवलक्ष ग्रन्थकर्ता नित्यलीलास्थ श्री पुरुषोत्तमजी (१७१४) का भी आज उत्सव है.
आप के सेव्य स्वरुप सूरत (गुजरात) में विराजित प्रभु श्री बालकृष्णलालजी हैं.
पुष्टिमार्ग में आज की एकादशी को दान-एकादशी कहा जाता है.
नंदकुमार रसराज प्रभु ने व्रज की गोपियों से इन बीस दिनों तक दान लिया है. प्रभु ने तीन रीतियों (सात्विक, राजस एवं तामस) से दान लिए हैं.
दीनतायुक्त स्नेहपूर्वक, विनम्रता से दान मांगे वह सात्विक दान, वाद-विवाद व श्रीमंततापूर्वक दान ले वह राजस एवं हठपूर्वक, झगड़ा कर के अनिच्छा होते भी जोर-जबरदस्ती कर दान ले वह तामस दान है.
दान के दिनों में गाये जाने वाले कीर्तनों में इन तीनों प्रकार से लिये दान का बहुत सुन्दर वर्णन है.
प्रभु ने व्रजवितान में, दानघाटी सांकरी-खोर में, गहवर वन में, वृन्दावन में, गोवर्धन के मार्ग पर, कदम्बखंडी में, पनघट के ऊपर, यमुना घाट पर आदि विविध स्थलों पर व्रजभक्तों से दान लिया है और उन्हें अपने प्रेमरस का दान किया है.
भाद्रपद शुक्ल द्वादशी को प्रभु का वामन रूप में प्रादुर्भाव हुआ. प्रभु ने ब्राह्मण रूप में राजा बलि से दान लिया.
इस प्रकार दान-लीला के विविध भाव हैं.
दान की सामग्री में दूध श्री स्वामिनीजी के भाव से, दही श्री चन्द्रावलीजी के भाव से, छाछ श्री यमुनाजी के भाव से, और माखन श्री कुमारिकाजी के भाव से अरोगाया जाता है.
दान के बीस दिनों में पांच-पांच दिन चारों युथाधिपतियों के माने गए हैं.
कल तक बाल-लीला के पद गाये जाते थे. अब आज से प्रतिदिन दान के पद गाये जायेंगे.
श्रीजी का सेवाक्रम – उत्सव होने के कारण श्रीजी मंदिर के सभी मुख्य द्वारों की देहरी (देहलीज) को हल्दी से लीपी जाती हैं एवं आशापाल की सूत की डोरी की वंदनमाल बाँधी जाती हैं.
सभी समय यमुनाजल की झारीजी आती है. चारों समय (मंगला, राजभोग, संध्या व शयन) आरती थाली में की जाती है.
गेंद, चौगान, दीवाला आदि सभी सोने के आते हैं.
श्रृंगार समय दान के पद गाये जाते हैं. आज विशेष रूप से श्रृंगार दर्शन में बड़ा कमल धराया जाता है.
आज श्रीजी को नियम से मुकुट-काछनी का श्रृंगार धराया जायेगा. प्रभु को मुख्य रूप से तीन लीलाओं (शरद-रास, दान और गौ-चारण) के भाव से मुकुट का श्रृंगार धराया जाता है.
दान के दिनों के मुकुट काछनी के श्रृंगार की कुछ और विशेषताएँ भी है.
इन दिनों में जब भी मुकुट धराया जावे तब मुकुट को एक वस्त्र से बांधा जाता है जिसे मुकुट पीताम्बर कहा जाता है जिससे जब प्रभु मटकी फोड़ने कूदें तब मुकुट गिरे नहीं.
इसके अतिरिक्त दान के दिनों में मुकुट काछनी के श्रृंगार में स्वरुप के बायीं ओर चोटीजी नहीं धरायी जाती. इसके पीछे यह भाव है कि यदि चोटीजी रही तो प्रभु जब मटकी फोड़कर भाग रहे हों तब गोपियाँ उनकी चोटीजी पकड़ सकती हैं और प्रभु भाग नहीं पाएंगे.
श्रीजी को गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में बूंदी के लड्डू अरोगाये जाते हैं. इसके अतिरिक्त दूधघर में सिद्ध की गयी केशरयुक्त बासोंदी की हांडी प्रभु को अरोगायी जाएगी.
आज से 20 दिन तक प्रतिदिन ग्वाल भोग में श्री ठाकुरजी को दान की सामग्रियां अरोगायी जाती है. इन सामग्रियों में प्रभु को शाकघर और दूधघर में विशेष रूप से सिद्ध किये गये दूध, दही, केशरिया दही, श्रीखंड, केशरी बासोंदी, मलाई बासोंदी, गुलाब-जामुन, छाछ की हांडियां एवं खट्टा-मीठा दही के बटेरा आदि अरोगाये जाते हैं.
राजभोग में अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता व सखड़ी में दहीभात अरोगाया जाता है.
राजभोग दर्शन –
कीर्तन – (राग : सारंग)
कहि धो मोल या दधिको री ग्वालिन श्यामसुंदर हसिहसि बूझत है l
बैचेगी तो ठाडी रहि देखो धो कैसो जमायो, काहेको भागी जाति नयन विशालन ll 1 ll
वृषभान नंदिनी कौ निर्मोलक दह्यौ ताको मौल श्याम हीरा तुमपै न दीयो जाय,
सुनि व्रजराज लाडिले ललन हसि हसि कहत चलत गज चालन l
‘गोविंद’प्रभु पिय प्यारी नेह जान्यो तब मुसिकाय ठाडी भई ऐना बेनी कर सबै आलिन ll 2 ll
साज – आज प्रातः श्रृंगार समय श्रीजी में दानघाटी में दूध-दही बेचने जाती गोपियों के पास से दान मांगते एवं दूध-दही लूटते श्री ठाकुरजी एवं सखा जनों के सुन्दर चित्रांकन वाली दानलीला की प्राचीन पिछवाई धरायी जाती है.
राजभोग में पिछवाई बदल कर जन्माष्टमी वाली लाल लप्पा की पिछवाई आती है.
गादी, तकिया और चरणचौकी के ऊपर सफेद बिछावट की जाती है.
वस्त्र – श्रीजी को आज लाल रुपहली किनारी से सुसज्जित सूथन धराये जाता है. छोटी काछनी लाल रुपहली किनारी की एवं बड़ी काछनी कोयली सुनहरी किनारी की होती है.
लाल रुपहली ज़री की तुईलैस वाला पीताम्बर (रास-पटका) धराया जाता है. ठाड़े वस्त्र श्वेत जामदानी का धराये जाते हैं.
श्रृंगार – आज प्रभु को वनमाला (चरणारविन्द तक) का उत्सव का भारी श्रृंगार धराया जाता है. मिलवा, माणक की प्रधानता के सर्व आभरण धराये जाते हैं. कली, कस्तूरी आदि सभी माला धरायी जाती हैं. आज प्रभु को बघनखा धराये जाते हैं.
श्रीमस्तक पर श्री गोकुलनाथजी वाले टोपी व स्वर्ण का रत्नजड़ित मुकुट एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में मयुराकृति कुंडल धराये जाते हैं. चित्र में द्रश्य है परन्तु चोटी नहीं धरायी जाती है. पीले एवं श्वेत पुष्पों की दो मालाजी धरायी जाती है. श्रीहस्त में कमलछड़ी, वेणु, वेत्र माणक के व एक वेत्र हीरा के धराये जाते हैं.
सायं भोग समय अरोगाये जाने वाले फीका के स्थान पर बीज-चालनी के सूखे मेवे अरोगाये जाते हैं.
संध्या-आरती दर्शन में प्रभु के श्रीहस्त में हीरा का वैत्र ठाड़ा धराया जाता है.