By Vaishnav, For Vaishnav

Tuesday, 7 April 2026

व्रज - वैशाख कृष्ण षष्ठी

व्रज - वैशाख कृष्ण षष्ठी 
Wednesday, 08 April 2026

पिले मलमल के घेरदार वागा एवं श्रीमस्तक पर गोल पाग पर गोल चंद्रिका के शृंगार

राजभोग दर्शन – 

कीर्तन – (राग : नट)

नातर लीला होती जूनी।
जो पै श्रीवल्लभ प्रकट न होते वसुधा रहती सूनी।।१।।
दिनप्रति नईनई छबि लागत ज्यों कंचन बिच चूनी।
सगुनदास यह घरको सेवक जस गावत जाको मुनी।।२।।

साज – आज श्रीजी में पिले मलमल की पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी के ऊपर सफ़ेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को पिले मलमल का सूथन, चोली एवं घेरदार वागा धराये जाते हैं. ठाडे वस्त्र लाल रंग के धराये जाते हैं.

श्रृंगार – आज प्रभु को हल्का श्रृंगार धराया जाता है. माणक के सर्व आभरण धराये जाते हैं.
 श्रीमस्तक पर पीले रंग की गोल पाग के ऊपर सिरपैंच, गोल चन्द्रिका एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में एक जोड़ी कर्णफूल धराये जाते हैं.
 गुलाबी पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं.
 श्रीहस्त में पुष्पछड़ी, लाल मीना के वेणुजी एवं एक वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट पिला एवं गोटी मीना की आती है. 

संध्या-आरती दर्शन के उपरांत श्रीकंठ के आभरण बड़े कर छेड़ान के (छोटे) आभरण धराये जाते हैं. शयन दर्शन में श्रीमस्तक पर लूम-तुर्रा रूपहरी धराया जाता है.

Monday, 6 April 2026

व्रज - वैशाख कृष्ण पंचमी

व्रज - वैशाख कृष्ण पंचमी
Tuesday, 07 April 2026

श्री वल्लभाचार्यजी के उत्सव का प्रतिनिधि का श्रृंगार

आज से श्रीमद् वल्लभाचार्यजी के प्राकट्योत्सव की नौबत की बधाई बैठती है एवं उत्सव का प्रतिनिधि का श्रृंगार धराया जाता है. 

अधिकांश बड़े उत्सवों के पहले उस श्रृंगार का प्रतिनिधि का श्रृंगार धराया जाता है.
प्रतिनिधि के श्रृंगार और वस्त्र मूल उत्सव के दिन के प्रतिरूप जैसे ही होते हैं.

जन्माष्टमी के उत्सव के चार श्रृंगार धराये जाते हैं परन्तु श्री महाप्रभुजी एवं श्री गुसांईजी के उत्सव के तीन श्रृंगार (एक प्रतिनिधि का, दूसरा उत्सव के दिन एवं तीसरा उत्सव के अगले दिन का परचारगी श्रृंगार) ही धराये जाते हैं.
 
इसका कारण यह है कि जन्माष्टमी के चार श्रृंगार चार यूथाधिपतियों (स्वामिनी जी) के भाव से धराये जाते हैं परन्तु श्री महाप्रभुजी स्वयं स्वामिनीजी के एवं श्री गुसांईजी स्वयं चन्द्रावलीजी के स्वरुप हैं अतः आप स्वयं श्रृंगारकर्ता हों और स्वयं की ओर का श्रृंगार कैसे करें इस भाव से इन दोनों उत्सवों का एक-एक श्रृंगार कम हो जाता है.

सेवाक्रम- आज दो समय आरती थाली में की जाती है.
राजभोग में पीठका पर पुष्पों का चौखटा आता हैं.

आज ही के दिन श्री महाप्रभुजी के उत्सव, आगामी नृसिंह जयंती व वामन द्वादशी के दिन धराये जाने वाले वस्त्र केसर से रंगे जाते हैं. 

आज राजभोग आरती पश्चात श्रीजी के मुखियाजी, निज सेवक व दर्जीखाना के प्रभु सेवकों के सानिध्य में श्रीठाकुरजी के वस्त्र रंगे जायेंगे.

पंचमी के दिन वस्त्र रंगने का भाव ये हे कि इसमें श्री गोवर्धनधरण प्रभु से विनती का भाव है कि जिस प्रकार यह श्वेत वस्त्र आज केसर के रंग में रंग गए हैं, आज पंचमी के दिन मेरी पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ भी प्रभु रंग में रंग जाएँ. 

कीर्तन – (राग : सारंग)

शुभ वैशाख कृष्ण एकादशी श्री वल्लभ प्रभु प्रकट भये l
दैवी जीवन के भाग्य विस्तरे निरखत ताप तन के गये ll 1 ll
पुष्टि भक्तिरस निजदासनको अति उदार मन दान दिये l
‘माणिकचंद’ हिये बसो निरंतर श्रीवल्लभ आनंद मये ll 2 ll

साज – आज श्रीजी में केसरी मलमल की, उत्सव के कमल के काम (Work) वाली एवं रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी के हांशिया से सुसज्जित पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को केसरी मलमल का सूथन, चोली एवं खुलेबंद के चाकदार वागा धराये जाते हैं. सभी वस्त्र रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित होते हैं. ठाड़े वस्त्र श्वेत मलमल के धराये जाते हैं.

श्रृंगार – आज प्रभु को उत्सववत वनमाला का (चरणारविन्द तक) दो जोड़ी का भारी श्रृंगार धराया जाता है. एक हीरा का एवं एक हीरा तथा माणक के आभरण धराये जाते हैं.
 श्रीमस्तक पर केसरी रंग की कुल्हे के ऊपर तीन जोड़ी श्रृंगार धराए जाते हैं
 कुल्हे पर सिरपैंच, पांच मोरपंख की मोर-चंद्रिका की जोड़ एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं.
 श्रीकर्ण में मयूराकृति कुंडल धराये जाते हैं. बायीं ओर उत्सव की मीना की चोटी (शिखा) भी धरायी जाती है.
श्रीकंठ में कली,कस्तूरी आदि की माला आती हैं.
त्रवल, टोडर दोनों धराये जाते हैं.

 चैत्री गुलाबों एवं अन्य पुष्पों से निर्मित वन-चौखटा पीठिका के ऊपर धराया जाता है.
 श्वेत एवं गुलाबी पुष्पों की दो सुन्दर थागवाली वनमाला धरायी जाती हैं. श्रीहस्त में पुष्पछड़ी, हीरे के वेणुजी एवं दो वेत्रजी (एक स्वर्ण का) धराये जाते है.
पट उत्सव का एवं गोटी जड़ाऊ स्वर्ण की आती हैं.

Sunday, 5 April 2026

व्रज - वैशाख कृष्ण चतुर्थी

व्रज - वैशाख कृष्ण चतुर्थी 
Monday, 06 April 2026

लाल चुंदड़ी के चाकदार वागा एवं श्रीमस्तक पर छज्जेदार पाग पर सीधी चंद्रिका के श्रृंगार 

राजभोग दर्शन – 

कीर्तन – (राग : सारंग)

नयनन लागी हो चटपटी l
मदनमोहन पिय नीकसे द्वार व्है, शोभित पाग लटपटी ll 1 ll
दूर जाय फीर चितयेरी मो तन, नयन कमल मनोहर भृकुटी l
'गोविंद' प्रभु पिय चलत ललित गति, कछुक सखा अपनी गटी ll 2 ll

साज – आज श्रीजी में लाल चुंदड़ी की सुनहरी तुईलैस की किनारी के हांशिया से सुसज्जित पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को लाल चुंदड़ी का सूथन, चोली एवं खुलेबंद के चाकदार वागा धराये जाते हैं.  सभी वस्त्र रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित होते हैं. ठाड़े वस्त्र फ़िरोज़ी रंग के धराये जाते हैं.

श्रृंगार – प्रभु को आज छेड़ान का हल्का श्रृंगार धराया जाता है. पन्ना के सर्व आभरण धराये जाते हैं.
 श्रीमस्तक पर लाल चुंदड़ी की छज्जेदार पाग पर सिरपैंच, सीधी चंद्रिका, रुपहली लूम,तुर्रा एवं बायीं ओर शीशफूल धराया जाता है. 
श्रीकर्ण में दो जोड़ी कर्ण फूल धराये जाते हैं.
 श्वेत एवं गुलाबी पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं.
 श्रीहस्त में पुष्पछड़ी, फ़िरोज़ा के वेणुजी एवं एक वेत्रजी धराये जाते हैं. पट लाल व गोटी बाघ बकरी की चाँदी की आती है.

Saturday, 4 April 2026

व्रज - वैशाख कृष्ण तृतीया

व्रज - वैशाख कृष्ण तृतीया 
Sunday, 05 April 2026

लाल पीले लहरियाँ के घेरदार वागा एवं श्रीमस्तक पर गोल पाग पर दोहरा क़तरा के श्रृंगार 

राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : आसावरी)

देखो अद्भुत अविगतकी गति कैसो रूप धर्यो है हो ।
तीन लोक जाके उदर बसत है सो सुप के कोने पर्यो है ।।१।।
नारदादिक ब्रह्मादिक जाको सकल विश्व सर साधें हो ।
ताको नार छेदत व्रजयुवती वांटि तगासो बाँधे ।।२।।
जा मुख को सनकादिक लोचत सकल चातुरी ठाने ।
सोई मुख निरखत महरि यशोदा दूध लार लपटाने ।।३।।
जिन श्रवनन सुनी गजकी आपदा गरुडासन विसराये ।
तिन श्रवननके निकट जसोदा गाये और हुलरावे ।।४।।
जिन भूजान प्रहलाद उबार्यो हरनाकुस ऊर फारे ।
तेई भुज पकरि कहत व्रजगोपी नाचो नैक पियारे ।।५।।
अखिल लोक जाकी आस करत है सो  माखनदेखि अरे है ।
सोई अद्भुत गिरिवरहु ते भारे पलना मांझ परे है ।।६।।
सुर नर मुनि जाकौ ध्यान धरत है शंभु समाधि न टारी ।
सोई प्रभु सूरदास को ठाकुर गोकुल गोप बिहारी ।।७।।

साज – श्रीजी में आज लाल पीले लहरियाँ की रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी के हांशिया से सुसज्जित पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज प्रभु को लाल पीले लहरियाँ का सूथन, चोली एवं घेरदार वागा धराये जाते हैं. सभी वस्त्र रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित होते हैं. ठाड़े वस्त्र मेघश्याम रंग के धराये जाते हैं.

श्रृंगार – आज श्रीजी को छोटा (कमर तक) मोती के सर्व आभरण धराये जाते हैं. 
श्रीमस्तक पर लाल पीले लहरियाँ की गोल पाग के ऊपर सिरपैंच, दोहरा क़तरा एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में एक जोड़ी कर्णफूल धराये जाते हैं. 

चैत्री गुलाब के पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं. 
श्रीहस्त में पुष्पछड़ी, फिरोज़ा के वेणुजी एवं एक वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट लाल व गोटी मीना की आती है.

Friday, 3 April 2026

व्रज - वैशाख कृष्ण द्वितीया

व्रज - वैशाख कृष्ण द्वितीया 
Saturday, 04 April 2026

 केसरी मलमल के धोती पटका पर लाल खुले बन्ध के एवं श्रीमस्तक पर छज्जेदार पाग पर क़तरा के शृंगार

राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : आसावरी)

देखो अद्भुत अविगतकी गति कैसो रूप धर्यो है हो ।
तीन लोक जाके उदर बसत है सो सुप के कोने पर्यो है ।।१।।
नारदादिक ब्रह्मादिक जाको सकल विश्व सर साधें हो ।
ताको नार छेदत व्रजयुवती वांटि तगासो बाँधे ।।२।।
जा मुख को सनकादिक लोचत सकल चातुरी ठाने ।
सोई मुख निरखत महरि यशोदा दूध लार लपटाने ।।३।।
जिन श्रवनन सुनी गजकी आपदा गरुडासन विसराये ।
तिन श्रवननके निकट जसोदा गाये और हुलरावे ।।४।।
जिन भूजान प्रहलाद उबार्यो हरनाकुस ऊर फारे ।
तेई भुज पकरि कहत व्रजगोपी नाचो नैक पियारे ।।५।।
अखिल लोक जाकी आस करत है सो  माखनदेखि अरे है ।
सोई अद्भुत गिरिवरहु ते भारे पलना मांझ परे है ।।६।।
सुर नर मुनि जाकौ ध्यान धरत है शंभु समाधि न टारी ।
सोई प्रभु सूरदास को ठाकुर गोकुल गोप बिहारी ।।७।।

साज – आज श्रीजी में केसरी रंग की मलमल की, रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी के हांशिया से सुसज्जित पिछवाई धरायी जाती है.
गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती हे.

वस्त्र – आज श्रीजी को केसरी रंग की धोती, लाल रंग के खुलेबंद के चाकदार वागा, चोली एवं केसरी रंग का अंतरवास का राजशाही पटका धराया जाता है.
सभी वस्त्र रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित होते हैं. ठाड़े वस्त्र हरे रंग के धराये जाते हैं.

श्रृंगार – आज श्रीजी को छोटा (कमर तक) हल्का श्रृंगार धराया जाता है.
 पन्ना के सर्व आभरण धराया जाते हैं.
 श्रीमस्तक पर केसरी रंग की छज्जेदार पाग के ऊपर सिरपैंच, क़तरा ,तुर्री व लुम तथा बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं.
 श्रीकर्ण में दो जोड़ी कर्णफूल धराये जाते हैं. 
कमल माला धरावे.
गुलाबी एवं पीले पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं.
 श्रीहस्त में पुष्पछड़ी, हरे मीना के वेणुजी वेत्र धराये जाते हैं.
पट केसरी व गोटी मीना की आती है.

Thursday, 2 April 2026

व्रज - वैशाख कृष्ण प्रतिपदा

व्रज - वैशाख कृष्ण प्रतिपदा
Friday, 03 April 2026

पीले मलमल के घेरदार वागा एवं श्रीमस्तक पर गोल पाग पर दोहरा क़तरा के श्रृंगार 

राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : आसावरी)

देखो अद्भुत अविगतकी गति कैसो रूप धर्यो है हो ।
तीन लोक जाके उदर बसत है सो सुप के कोने पर्यो है ।।१।।
नारदादिक ब्रह्मादिक जाको सकल विश्व सर साधें हो ।
ताको नार छेदत व्रजयुवती वांटि तगासो बाँधे ।।२।।
जा मुख को सनकादिक लोचत सकल चातुरी ठाने ।
सोई मुख निरखत महरि यशोदा दूध लार लपटाने ।।३।।
जिन श्रवनन सुनी गजकी आपदा गरुडासन विसराये ।
तिन श्रवननके निकट जसोदा गाये और हुलरावे ।।४।।
जिन भूजान प्रहलाद उबार्यो हरनाकुस ऊर फारे ।
तेई भुज पकरि कहत व्रजगोपी नाचो नैक पियारे ।।५।।
अखिल लोक जाकी आस करत है सो  माखनदेखि अरे है ।
सोई अद्भुत गिरिवरहु ते भारे पलना मांझ परे है ।।६।।
सुर नर मुनि जाकौ ध्यान धरत है शंभु समाधि न टारी ।
सोई प्रभु सूरदास को ठाकुर गोकुल गोप बिहारी ।।७।।

साज – श्रीजी में आज पीले मलमल की रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी के हांशिया से सुसज्जित पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज प्रभु को पीले मलमल का सूथन, चोली एवं घेरदार वागा धराये जाते हैं. सभी वस्त्र रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित होते हैं. ठाड़े वस्त्र लाल रंग के धराये जाते हैं.

श्रृंगार – आज श्रीजी को छोटा (कमर तक) माणक के सर्व आभरण धराये जाते हैं. 
श्रीमस्तक पर पीले रंग की गोल पाग के ऊपर सिरपैंच, दोहरा क़तरा एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में एक जोड़ी कर्णफूल धराये जाते हैं. 

चैत्री गुलाब के पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं. 
श्रीहस्त में पुष्पछड़ी, स्याम मीना के वेणुजी एवं एक वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट पीला व गोटी चाँदी की आती है.

Wednesday, 1 April 2026

व्रज - चैत्र शुक्ल पूर्णिमा

व्रज - चैत्र शुक्ल पूर्णिमा
Thursday, 02 April 2026

पूरी पूरी पूरनमासी पूर्यो पूर्यो शरदको चन्दा।
पूर्यो है मुरली स्वर केदारो, कृष्ण कला संपूरन भामिनी रास रच्यो सुखकंदा।।१।।
तान मान गति मोहन सोहे कहियत औरहि मन मोहंदा।
नृत्य करत श्रीराधा प्यारी नचवत आप बिहारी ऊदघत थेई थेई थुंगन छंदा।।२।।
मन आकर्षि लियो व्रजसुंदरी जय जय रुचिर गति मन्दा।
सखी आसीस देत हरिवंश तैसेई विहरत श्रीवृंदावन कुंवरि कुंवर नंदनंदा।।३।।

विशेष – आश्विन शुक्ल पूर्णिमा (शरद पूर्णिमा) से चैत्र शुक्ल पूर्णिमा की रास की छः मास की रात्रि आज पूर्ण होने से आज रासोत्सव मनाया जाता है. 
कुछ पुष्टिमार्गीय वैष्णव मंदिरों में आज शरद उत्सव मनाया जाता है और शरद पूर्णिमा को अरोगायी जाने वाली सामग्रियां  अरोगायी जाती है यद्यपि श्रीजी में ऐसा सेवाक्रम नहीं होता है.

श्रीजी में आज रास की चार सखी के भाव के चित्रांकन की पिछवाई आती है. नियम का रास के भाव का मुकुट और गुलाबी काछनी का श्रृंगार धराया जाता है. 

राजभोग दर्शन – 

कीर्तन – (राग : सारंग)

ऐसी बंसी बाजी बनघनमें व्यापी रही घ्वनि महामुनिनकी समाधी लागी l
भयो ब्रह्मनाद ऊठत आह्लाद जहाँ तहाँ व्रज घोष रत्न वृंद भये सब त्यागी ll 1 ll
रास आदि अनेक लीला रसभाव पूरित मूरति मुखारविंद छबि धरे विरह अनंग जागी l
तब वेणुनाद द्वार अब श्रीलक्ष्मणभट भूपकुमार ‘पद्मनाभ’ दैवोद्धार अर्थ त्यागी ll 2 ll 

साज – आज श्रीजी में रास रमती चार गोपियों के चित्रांकन की सुन्दर पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – श्रीजी को आज गुलाबी मलमल का सूथन, काछनी, रास-पटका एवं श्याम मलमल की चोली धरायी जाती हैं. सभी वस्त्र रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित होते हैं. ठाड़े वस्त्र सफेद जामदानी (चिकन) के धराये जाते हैं.

श्रृंगार - श्रीजी को आज वनमाला (चरणारविन्द तक) का भारी श्रृंगार धराया जाता है. हीरा मोती के सर्व आभरण धराये जाते हैं. श्रीमस्तक पर हीरा का मुकुट एवं बायीं ओर शीशफूल धराया जाता है. श्रीकर्ण में हीरा के मयूराकृति कुंडल धराये जाते हैं. 
बायीं ओर हीरा की शिखा (चोटी) धरायी जाती है. 
श्रीकंठ में कली, कस्तूरी व कमल माला धरायी जाती है. श्वेत एवं गुलाबी पुष्पों की विविध पुष्पों की थागवाली दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती है. श्रीहस्त में पुष्पछड़ी, लहरिया के हीराजड़ित वेणुजी एवं दो वेत्रजी (लहरिया व सोने के) धराये जाते हैं.
पट गुलाबी व गोटी नाचते मोर की आती है.

संध्या-आरती दर्शन के उपरांत श्रीकंठ के आभरण, मुकुट व टोपी बड़े किये जाते हैं व श्रीमस्तक पर गुलाबी गोल-पाग धरायी जाती है. 
श्रीकंठ में छेड़ान के (छोटे) श्रृंगार धराये जाते हैं.

व्रज - वैशाख कृष्ण षष्ठी

व्रज - वैशाख कृष्ण षष्ठी  Wednesday, 08 April 2026 पिले मलमल के घेरदार वागा एवं श्रीमस्तक पर गोल पाग पर गोल चंद्रिका के शृंगार राजभोग दर्शन ...