By Vaishnav, For Vaishnav

Saturday, 14 February 2026

व्रज - फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी

व्रज - फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी
Sunday, 15 February 2026

भोरही आयो मेरे द्वार जोगिया अलख कहे कहे जाग ।
मोहन मूरति एनमेनसी नैन भरे अनुराग ।।
अंग विभूतिगरें बिचसेली देखीयत विरह बिराग ।
तनमन वारुं धीरज के प्रभु पर राखूंगी बांध सुहाग ।।
तुम कोनकेवस खेले हो रंगीले हो हो होरियां ।
अंजन अधरन पीक महावरि नेनरंगे रंगरोरियां ।।
वारंवार जृंभात परस्पर निकसिआई सब चोरियां ।
'नंददास' प्रभु उहांई वसोकिन जहां वसेवेगोरियां ।।

महा शिवरात्रि

विशेष – आज महाशिवरात्रि है. भगवान शंकर प्रथम वैष्णव हैं और श्रीजी के प्रिय भक्त हैं अतः आज नियम का मुकुट और गोल-काछनी का श्रृंगार धराया जाता है. 

गोल-काछनी को मोर-काछनी भी कहा जाता है क्योंकि यह यह देखने में नृत्यरत मयूर जैसी प्रतीत होती है. ऐसा प्रतीत होता है जैसे प्रभु गोपियों संग रास रचाते आनंद से मयूर की भांति नृत्य कर रहें हों. 
आज चोवा की चोली धरायी जाती है. आज प्रभु को अंगूरी (हल्के हरे) रंग की गोल-काछनी व रास पटका धराया जाता है जिस पर बसंत के छांटा होते हैं.

कई शिव-भक्त अंगूरी (हल्के हरे) रंग को शिव के प्रिय पेय भंग के रंग से जोड़कर भी देखते हैं यद्यपि यहाँ इस रंग का प्रयोग केवल प्रभु सुखार्थ किया जाता है.

श्रृंगार समय कमल के भाव की पिछवाई आती है जो कि श्रृंगार दर्शन उपरांत बड़ी कर श्वेत मलमल की सादी पिछवाई धरायी जाती है जिसपर राजभोग समय खेल होता है.

कीर्तन – (राग : सारंग)

कर तारी देदे नाचेही बोले सब होरी हो ll ध्रु ll
संगलिये बहु सहचरि वृषभान दुलारी हो l गावत आवत साजसो उतते गिरिधारी हो ll 1 ll
दोऊ प्रेम आनंदसो उमगे अतिभारी l चितवन भर अनुरागसो छुटी पिचकारी ll 2 ll
मृदुंग ताल डफ बाजही उपजे गति न्यारी l झुमक चेतव गावही यह मीठी गारी ll 3 ll
लाल गुलाल उड़ावही सोंधे सुखकारी l प्यारी मुखही लगावही प्यारो ललनविहारी ll 4 ll
हरे हरे आई दूर करी अबीर अंधियारी l घेर ले गयी कुंवरको भर के अंकवारि ll 5 ll
काहु गहिवेनी गुही रचि मांग संवारी l काहु अंजनसो आज अरु अंखिया अनियारी ll 6 ll
कोई सोंधेसो सानके पहरावत सारी l करते मुरली हरि लई वृषभान दुलारी ll 7 ll
तब ललिता मिलके कछु एक बात विचारी l पियावसन पियको दैहे पिय के दिये प्यारी ll 8 ll
मृगमद केसर घोंरके नखशिख तें ढारी l सखियन गढ़ जोरो कियो हस मुसकाय निहारी ll 9 ll
याही रस निवहो सदा यह केलि तिहारी l निरख ‘माधुरी’ सहचरी छबि पर बलिहारी ll 10 ll

साज - आज श्रीजी में आज कमल के भाव के चित्रांकन की पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – श्रीजी को आज अंगूरी (हल्के हरे) रंग का छाँट का सूथन, गोल-काछनी (मोर-काछनी), रास-पटका एवं चोवा की चोली धराये जाते हैं. सभी वस्त्र रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित होते हैं. ठाड़े वस्त्र सफेद जामदानी (लट्ठा) के धराये जाते हैं.

श्रृंगार - श्रीजी को आज वनमाला (चरणारविन्द तक) का हल्का श्रृंगार धराया जाता है. सोने के सर्व आभरण धराये जाते हैं. श्रीमस्तक पर सोने की मुकुट की टोपी पर मीनाकारी का स्वर्ण का मुकुट एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में मयूराकृति कुंडल धराये जाते हैं. आज शिखा (चोटी) नहीं धरायी जाती है.
श्रीकंठ में अक्काजी की दो माला धरायी जाती है. पुष्पों की विविध पुष्पों की थागवाली दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती है. श्रीहस्त में पुष्पछड़ी, सोने के वेणुजी दो वेत्रजी धराये जाते हैं.

Friday, 13 February 2026

व्रज - फाल्गुन कृष्ण द्वादशी

व्रज - फाल्गुन कृष्ण द्वादशी
Tuesday, 25 February 2025

ताजबीबी की भावपूर्ण अंतिम धमार

बहोरि डफ बाजन लागे, हेली।। ध्रुव.।। 
खेलत मोहन साँवरो,हो, केहिं मिस देंखन जाय।। 
सास ननद बैरिन भइ अब,  कीजे कोन उपाय।। १।। 
ओजत गागर ढारीये, यमुना जल के काज,।। 
यह मिस बाहिर निकसकें हम, जायें मिलें तजि लाज।।२।।
आओ बछरा मेलियें, बनकों देहिं विडार।। 
वे दे हें, हम ही पठे हम, रहेंगी घरी द्वे चार।। ३।। 
हा हा री हों जातहों मोपें, नाहिन परत रह्यो।। 
तू तो सोचत हीं रही तें, मान्यों न मेरो कह्यो।। ४।। 
राग रंग गहगड मच्यो, नंदराय दरबार।। 
गाय खेल हंस लिजिये, फाग बडो त्योहार।। ५।। 
तिनमें मोहन अति बने, नाचत सबे ग्वाल।। 
बाजे बहुविध बाजहि रंज, मुरज डफ ताल।। ६।। 
मुरली मुकुट बिराजही, कटिपट बाँधे पीत।। 

इस पंक्ति को गाते गाते अकबर बादशाह की बेगम ताजबीबी को अत्यंत विरह हुआ और अपना देह त्याग श्रीजी की लीला में प्रविष्ट हुई, उनके ये पद की अंतिम पंक्ति श्रीनाथजी ने पूर्ण की

नृत्यत आवत *ताज* के प्रभु गावत होरी गीत।।७।।

अबीर की चोली

विशेष - माघ और फाल्गुन मास में होली की धमार एवं विविध रसभरी गालियाँ भी गायी जाती हैं. विविध वाद्यों की ताल के साथ रंगों से भरे गोप-गोपियाँ झूमते हैं. 

कई बार गोपियाँ प्रभु को अपने झुण्ड में ले जाती हैं और सखी वेश पहनाकर नाच नचाती हैं और फगुआ लेकर ही छोडती हैं. 

इसी भाव से आज श्रीजी को नियम से अबीर की चोली धरायी जाती है. फाल्गुन मास में श्रीजी चोवा, गुलाल, चन्दन एवं अबीर की चोली धराकर सखीवेश में गोपियों को रिझाते हैं. 

राजभोग समय अष्टपदी गाई जाती है. अबीर की चोली पर कोई रंग (गुलाल आदि) नहीं लगाए जाते.

राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : सारंग)

ग्वालिनी सोंधे भीनी अंगिया सोहे केसरभीनी सारी l
लहेंगा छापेदार छबीलो छीन लंक छबि न्यारी ll 1 ll
अधिक वार रिझवार खिलवार चलत भुज डारी l
अत्तर लगाए चतुर नारी तब गावत होरी की गारी ll 2 ll
बड़ी बड़ी वरूणी तरुणी करुणी रूप जोबन मतवारी l 
छबि फुलेल अलके झलके ललके लख छेल विहारी ll 3 ll
हावभाव के भवन केंधो भूखन की उपमा भारी l
वशीकरण केंधो जंत्रमंत्र मोहन मन की फंदवारी ll 4 ll
अंचल में न समात बड़ी अखिया चंचल अनियारी l
जानो गांसी गजवेल कामकी श्रुति बरसा न संवारी ll 5 ll
वेसरके मोतिन की लटकन मटकन की बलिहारी l
मानो मदनमोहन जुको मन अचवत अधर सुधारी ll 6 ll
बीरी मुख मुसकान दसन, चमकत चंचल चाकोरी l
कोंधि जात मानो घन में दामिनी छबिके पुंज छटारी ll 7 ll
श्यामबिंदु गोरी ढोडीमें उपमा चतुर विचारी l
जानो अरविंद चूम्यो न चले मचल्यो अलिको चिकुलारी ll 8 ll
पोति जोति दुलरी तिलरी तरकुली श्रवण खुटि लारी l
खयन बने कंचन विजायके करन चूरी गजरारी ll 9 ll
चंपकली चोकी गुंजा गजमोतिन की मालारी l
करे चतुर चितकी चोरी डोरीके जुगल झवारी ll 10 ll....अपूर्ण

साज - आज श्रीजी में आज सफ़ेद रंग की सादी पिछवाई धरायी जाती है जिसके ऊपर गुलाल, अबीर व चन्दन से खेल किया जाता है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को बिना किनारी का पतंगी (रानी) रंग का सूथन, घेरदार वागा एवं चोली धराये जाते हैं. चोली के ऊपर अबीर की सफ़ेद चोली धरायी जाती है. 
रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित केसरी कटि-पटका ऊर्ध्वभुजा की ओर धराया जाता है. गहरे हरे रंग के ठाड़े वस्त्र धराये जाते हैं. 
सभी वस्त्रों पर अबीर, गुलाल आदि को छांटकर कलात्मक रूप से खेल किया जाता है. केवल चोली पर रंगों से खेल नहीं किया जाता.
प्रभु के कपोल पर भी गुलाल, अबीर लगाये जाते हैं. 

श्रृंगार – आज श्रीजी को छोटा (कमर तक) हल्का श्रृंगार धराया जाता है. हरे मीना के सर्व आभरण धराये जाते हैं. 
श्रीमस्तक पर पतंगी रंग की बाहर की खिड़की की छज्जेदार पाग के ऊपर सिरपैंच, मच्छी घाट को दोहरा कतरा एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में कर्णफूल धराये जाते हैं. 
श्रीकंठ में आज त्रवल नहीं धराये जाते, कंठी व पदक धराये जाते हैं.
सफ़ेद एवं पीले पुष्पों की कलात्मक थागवाली दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती है.
 श्रीहस्त में पुष्पछड़ी, हरे मीना के वेणुजी एवं एक वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट चीड़ का व गोटी फाल्गुन की आती है.

संध्या-आरती दर्शन उपरांत श्रीमस्तक व श्रीकंठ के आभरण बड़े किये जाते हैं परन्तु अबीर की चोली नहीं खोली जाती है. 
शयन समय श्रीमस्तक पर रुपहली लूम-तुर्रा धराये जाते हैं.

Thursday, 12 February 2026

व्रज – फाल्गुन कृष्ण एकादशी

व्रज –  फाल्गुन कृष्ण एकादशी
Friday, 13 February 2026

कान्हा धर्यो रे मुकुट खेले होरी कान्हा धर्यो रे ।। 

ईतते आये कुंवर कन्हाई, 
उतते आई राधा गोरी............... कान्हा 

कहां तेरो हार कहां नकवेसर, 
कहां मोतीयनकी लर तोरी........ कान्हा 

गोकुल मेरो हार मथुरा नकवेसर, 
बृदावन में लर तोरी.................. कान्हा 

चोवा चंदन अगर अरगजा, 
अबिर उडावो भर भर झोरी....... कान्हा 

पुरुषोत्तम प्रभु की छबी निरखत, 
फगुवा लियो भर भर झोरी........ कान्हा 

मुकुट-काछनी के श्रृंगार

विजया एकादशी

विशेष – आज विजया एकादशी है. विश्व के सभी धर्माचार्यों ने कई वस्तुओं को निषेध कहा है उन सभी वस्तुओं को श्री वल्लभाचार्यजी ने प्रभु की सेवा में जोड़ कर उनका सदुपयोग किया है. 

उदाहरणार्थ काम, क्रोध, मोह एवं लोभ मानव के शत्रु हैं एवं इनका त्याग करने को सर्व धर्माचार्य कहते हैं परन्तु श्रीमद वल्लभाचार्यजी ने इन चारों वस्तुओं को प्रभु सेवा से जोड़ने की आज्ञा की जिससे ये सभी भी भगवदीय बनें. इस अमूल्य आज्ञा के अनुसरण करने वाले कई प्रभु के कृपापात्र वैष्णवों ने काम, क्रोध, लोभ एवं मोह को प्रभु सेवा में विनियोग कर इन पर विजय प्राप्त की अतः आज की एकादशी को विजया एकादशी कहा जाता है.

शीत कम हो गयी है अतः आज से श्रीजी में मुकुट काछनी का श्रृंगार प्रारंभ हो जायेगा. गोपाष्टमी के बाद आज ही श्रीजी में मुकुट धराया जा रहा है. 

प्रभु को मुख्य रूप से तीन लीलाओं (शरद-रास, दान और गौ-चारण) के भाव से मुकुट का श्रृंगार धराया जाता है. 

अधिक गर्मी एवं अधिक सर्दी के दिनों में मुकुट नहीं धराया जाता इस कारण देव-प्रबोधिनी से फाल्गुन कृष्ण सप्तमी (श्रीजी का पाटोत्सव) तक एवं अक्षय तृतीया से रथयात्रा तक मुकुट नहीं धराया जाता.

जब भी मुकुट धराया जाता है वस्त्र में काछनी धरायी जाती है. काछनी के घेर में भक्तों को एकत्र करने का भाव है. 

जब मुकुट धराया जाये तब ठाड़े वस्त्र सदैव श्वेत रंग के होते हैं. ये श्वेत वस्त्र चांदनी छटा के भाव से धराये जाते हैं.

जिस दिन मुकुट धराया जाये उस दिन विशेष रूप से भोग-आरती में सूखे मेवे के टुकड़ों से मिश्रित मिश्री की कणी अरोगायी जाती है.

आज प्रभु को पीले बसंत के छांट की काछनी व पीताम्बर, चोवा की चोली व सफ़ेद लट्ठा के ठाडे वस्त्र धराये जाते हैं. 

आज की विशेषता यह है कि आज श्रीजी को धराये जाने वाले वस्त्र द्वितीय गृहाधीश्वर प्रभु श्री विट्ठलनाथजी के घर से सिद्ध हो कर आते हैं. वस्त्रों के साथ श्रीजी के भोग हेतु सामग्री की एक छाब भी वहां से आती है.

श्रृंगार दर्शन 

कीर्तन – (राग : काफी)

पीताम्बर काजर कहाँ लग्यो हो ललना
कोन के पोंछे हें नयन ll ध्रु ll
कोनके गेह नेह रस पागे वे गोरी कछु ओर l 
देहु बताय कान राखति हों ऐसे भये चितचोर ll 1 ll
अधरन अंजन लिलाट महावर राजत पिक कपोल l
घुमि रहे रजनी जागेसे दुरत न काम कलोल ll 2 ll
नखनिशान राजत छतियन पर निरखो नयन निहार l
झुम रहीं अलके अलबेली पागके पेंच संवार ll 3 ll
हम डरपे जसुदाजुके त्रासन नागर नंदकिशोर l
पाय परे फगुवा प्रभु देहो मुरली देहो अकोर ll 4 ll
धन्य धन्य गोकुलकी गोपी, जीन हरी लीने हराय l
‘नंददास’ प्रभु कीये कनोड़े छोड़े नाच नचाय ll 5 ll 

साज – आज श्रीजी में फ़िरोज़ी रंग के आधार-वस्त्र पर कमल के फूलों के चित्रांकन वाली सुन्दर पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है. यह पिछवाई केवल श्रृंगार दर्शन में ही धरायी जाती है क्योंकि उसके बाद सफ़ेद मलमल की सादी पिछवाई धरायी जाती है जिसके ऊपर गुलाल अबीर से खेल किया जाता है. 

वस्त्र – श्रीजी को आज पीले बसंत के छांट का सूथन, काछनी, रास-पटका एवं चोवा श्याम रंग की चोली धराये जाते हैं. सभी वस्त्र रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित होते हैं. ठाड़े वस्त्र सफेद जामदानी (लट्ठा) के धराये जाते हैं.

श्रृंगार - श्रीजी को आज वनमाला (चरणारविन्द तक) का हल्का श्रृंगार धराया जाता है. लाल, हरे, मेघश्याम एवं सफ़ेद मीना तथा जड़ाव सोने के सर्व आभरण धराये जाते हैं. 
श्रीमस्तक पर मीना की मुकुट टोपी, मीना का मुकुट एवं बायीं ओर शीशफूल धराया जाता है. श्रीकर्ण में जड़ाव मयूराकृति कुंडल धराये जाते हैं. बायीं ओर मीना की शिखा (चोटी) धरायी जाती है. 
दो माला अक्काजी की धरायी जाती है.
श्वेत एवं गुलाबी पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं.
 श्रीहस्त में पुष्प की छड़ी, लहरिया के वेणुजी एवं दो वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट चीड़ का व गोटी फागुन की आती है.

Wednesday, 11 February 2026

व्रज – फाल्गुन कृष्ण दशमी

व्रज – फाल्गुन कृष्ण दशमी
Thursday, 11 February 2026

हरे लट्ठा के चाकदार वागा एवं श्रीमस्तक पर फेटा पर फेटा के साज के श्रृंगार 

राजभोग दर्शन – 

कीर्तन – (राग : वसंत) 

श्रीवृंदावन खेलत गुपाल, बनि बनि आई व्रजकी बाल ll 1 ll
नवसुंदरी नवतमाल, फूले नवल कमल मधि नव रसाल ll 2 ll
अपने कर सुंदर रचित माल, अवलंबित नागर नंदलाल ll 3 l
नव गोप वधू राजत हे संग, गजमोतिन सुंदर लसत मंग ll 4 ll
नवकेसर मेद अरगजा धोरि, छिरकत नागरिकों नवकिशोर ll 5 ll
तहां गोपीग्वाल सुंदर सुदेश, राजत माला विविध केस ll 6 ll
नंदनंदन को भूवविलास, सदा रहो मन 'सूरदास' ll 7 ll

साज – आज श्रीजी में सफ़ेद रंग की मलमल की सादी पिछवाई धरायी जाती है जिसके ऊपर गुलाल, चन्दन से खेल किया जाता है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को हरे रंग का सूथन, चोली, चाकदार वागा धराये जाते हैं. ठाड़े वस्त्र अमरसी रंग के धराये जाते हैं. सभी वस्त्रों पर अबीर, गुलाल आदि की टिपकियों से कलात्मक रूप से खेल किया जाता है.

श्रृंगार – आज श्रीजी को फ़ागण का हल्का श्रृंगार धराया जाता है. लाल मीना के सर्व आभरण धराये जाते हैं.
श्रीमस्तक पर हरे रंग के फेंटा के ऊपर सिरपैंच, बीच की चंद्रिका, एक कतरा एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं.
श्रीकर्ण में लोलक बिंदी धरायी जाती हैं.
 गुलाबी एवं पीले पुष्पों की रंग-बिरंगी सुन्दर थागवाली दो मालाजी धरायी जाती हैं.
 श्रीहस्त में पुष्पछड़ी, लाल मीना के वेणुजी एवं दो वेत्रजी (एक सोना के) धराये जाते हैं.
पट चीड़ का एवं गोटी हाथीदाँत की आती है. 

संध्या-आरती दर्शन के उपरांत श्रीकंठ के श्रृंगार बड़े कर छेड़ान के (छोटे) श्रृंगार धराये जाते हैं. श्रीमस्तक पर फेटा रहे लूम-तुर्रा नहीं धराये जाते हैं.

Tuesday, 10 February 2026

व्रज – फाल्गुन कृष्ण नवमी

व्रज –  फाल्गुन कृष्ण नवमी
Wednesday, 11 February 2026

लाल लट्ठा के घेरदार वागा, श्रीमस्तक पर लाल गोल पाग पर  क़तरा के श्रृंगार 

राजभोग दर्शन – 

कीर्तन – (राग : वसंत) (अष्टपदी)

खेलत वसंत गिरिधरनलाल, कोकिल कल कूजत अति रसाल ll 1 ll
जमुनातट फूले तरु तमाल, केतकी कुंद नौतन प्रवाल ll 2 ll
तहां बाजत बीन मृदंग ताल, बिचबिच मुरली अति रसाल ll 3 ll
नवसत सज आई व्रजकी बाल, साजे भूखन बसन अंग तिलक भाल ll 4 ll
चोवा चन्दन अबीर गुलाल, छिरकत पिय मदनगुपाल लाल ll 5 ll
आलिंगन चुम्बन देत गाल, पहरावत उर फूलन की माल ll 6 ll
यह विध क्रीड़त व्रजनृपकुमार, सुमन वृष्टि करे सुरअपार ll 7 ll
श्रीगिरिवरधर मन हरित मार, ‘कुंभनदास’ बलबल विहार ll 8 ll

साज – आज श्रीजी में सफ़ेद रंग की मलमल की सादी पिछवाई धरायी जाती है जिसके ऊपर गुलाल, चन्दन से खेल किया जाता है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को लाल लट्ठा का सूथन, चोली, घेरदार वागा एवं लाल रंग के मोजाजी धराये जाते हैं. ठाड़े वस्त्र पिले रंग के धराये जाते हैं. पटका लाल रंग का धराया जाता हैं. सभी वस्त्रों पर अबीर, गुलाल आदि की टिपकियों से कलात्मक रूप से खेल किया जाता है.

श्रृंगार – आज श्रीजी को फ़ागण का हल्का श्रृंगार धराया जाता है. मीना के सर्व आभरण धराये जाते हैं.
श्रीमस्तक पर लाल रंग की गोल पाग के ऊपर सिरपैंच, क़तरा एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं.
श्रीकर्ण में मीना के कर्णफूल की एक जोड़ी धरायी जाती हैं.
 गुलाबी एवं पीले पुष्पों की रंग-बिरंगी सुन्दर थागवाली दो मालाजी धरायी जाती हैं.
 श्रीहस्त में पुष्पछड़ी, हरे मीना के वेणुजी एवं वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट चीड़ का एवं गोटी फागुण की आती है. 

संध्या-आरती दर्शन के उपरांत श्रीकंठ के श्रृंगार बड़े कर छेड़ान के (छोटे) श्रृंगार धराये जाते हैं. श्रीमस्तक पर लूम-तुर्रा रूपहरी धराये जाते हैं.

Sunday, 8 February 2026

व्रज – फाल्गुन कृष्ण अष्टमी

व्रज –  फाल्गुन कृष्ण अष्टमी
Monday, 09 February 2026

सेहरा के श्रृंगार 

आज श्रीजी को केसरी रंग का सूथन, चोली चाकदार वागा का श्रृंगार धराया जायेगा. श्रीमस्तक पर केसरी रंग के दुमाला के ऊपर मीना का सेहरा धराया जाता है.

राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : वसंत)

देखो राधा माधो,सरस जोर,
खेलत बसंत पिय नवल किशोर।।ध्रु।
  ईत हलधर संग,समस्त बाल।।
मधि नायक सोहे नंदलाल।।
उत जुवती जूथ,अदभूत रूप।।
मधि नायक सोहें,स्यामा अनूप।।१।।
  बहोरि निकसि चले जमुनातीर,।।
मानों रति नायक जात धीर।।
देखत रति नायक बने जाय।।
संग ऋतु बसंत ले परत पाय।।२।।
  बाजत ताल,मृदंग तूर,।।
पुनि भेरि निसान रवाब भूर।।
डफ सहनाई,झांझ ढोल।।
हसत परस्पर करत बोल।।३।।
  जाई जूही,चंपक रायवेलि।।
रसिक सखन में करत केलि।।४।।
  ब्रज बाढ्यो कोतिक अनंत।।
सुंदरि सब मिलि कियो मंत।।
तुम नंदनंदन को पकरि लेहु।।
सखी संकरषन को माखेहु।।५।।
  तब नवलवधू कींनो उपाई।।
चहुँ दिशते सब चली धाई।।
श्रीराधा पकरि स्याम कों लाई।।
सखी संकरषन ,जिन भाजिपाई।।६।
  अहो संकरषन जू सुनो बात बात।।
नंदलाल छांडि,तुम कहां जात।।
दे गारी बोहो विधि अनेक।।
तब हलधर पकरे सखी अनेक।।७।।
  अंजन हलधर नेन दीन।।
कुंकुम मुख मंजन जू किन।।
हरधवजू फगवा आनी देहु।।
जुम कमल नेन कों छुडाई लेहु।।८।।
      जो मांग्यो सो़ं फगूआ दीन ।।
नवललाल संग केलि कौन हसत,
खेलत चले अपने धाम।।
व्रज युवती भई पूरन काम।।९।।
  नंदरानी ठाडी पोरि द्वार।।
नोछावरि करि देत वार ।।
वृषभान सुता संग रसिकराय।।
जन माणिक चंद बलिहारि जाय।।१०।।

साज – आज श्रीजी में सफ़ेद रंग की मलमल की सादी पिछवाई धरायी जाती है जिसके ऊपर राजभोग में गुलाल से चवरी मांडी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – श्रीजी को आज केसरी रंग का सूथन, चोली एवं चाकदार वागा धराये जाते हैं एवं केसरी मलमल का रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित अंतरवास का राजशाही पटका धराया जाता है. ठाड़े वस्त्र मेघश्याम रंग के धराये जाते हैं. सभी वस्त्रों पर अबीर, गुलाल आदि की टिपकियों से कलात्मक रूप से खेल किया जाता है.

श्रृंगार – प्रभु को आज वनमाला का (चरणारविन्द तक) फागुण का श्रृंगार धराया जाता है. मीना के सर्व आभरण धराये जाते हैं. 
श्रीमस्तक पर केसरी रंग के दुमाला के ऊपर फ़ीरोज़ा का सेहरा एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. 
श्रीकर्ण में दो जोड़ी मीना मकराकृति कुंडल धराये जाते हैं. सेहरा पर मीना की चोटी दायीं ओर धरायी जाती है. 
आज अक्काजी वाली दो मालाजी धरायी जाती हैं.
लाल एवं पीले पुष्पों की विविध पुष्पों की थागवाली दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती है.
 श्रीहस्त में कमलछड़ी, लाल मीना के वेणुजी एवं वेत्रजी धराये जाते हैं. 
पट चीड़ का एवं गोटी फागुण की आती हैं.

संध्या-आरती दर्शन उपरांत प्रभु के शृंगार एवं श्रीकंठ के आभरण बड़े कर दिए जाते हैं.
दुमाला रहे लूम तुर्रा नहीं आवे.

Saturday, 7 February 2026

व्रज - फाल्गुन कृष्ण सप्तमी

व्रज - फाल्गुन कृष्ण सप्तमी
Sunday, 08 February 2026

आज की पोस्ट बहुत लम्बी पर उत्सव के आनंद के रंग से सराबोर है अतः समय देकर पूरी पढ़ें

सभी वैष्णवों को निकुंजनायक श्रीजी व श्री लाड़लेलाल प्रभु के पाटोत्सव की ख़ूबख़ूब बधाई

निकुंजनायक श्रीजी व श्री नवनीतप्रियाजी का पाटोत्सव

होली खेल के 40 दिनों में पाटोत्सव का अपना अलग ही महत्व है, जो प्रभु कृपा और सर्व-समर्पण की भावना से उत्पन्न हुआ है.

श्रीजी प्रभु आज ही के दिन, श्री गुसाईंजी के घर सतघरा पधारे थे। श्री गिरिधरजी ने श्रीजी की आज्ञा से आपश्री को अपने कंधों पर विराजित कर उन्हें अपने घर पधरा ले गए. 
वहाँ श्रीजी ने श्रीगुसाँईजी के परिवार के सभी बालक, बेटीजी और बहूजी के साथ होली खेली. 
तब श्री गिरिधरजी के परिवार की सभी महिलाओं ने अपने सभी आभरणों (आभूषणों) का प्रभु चरणों में समर्पण किया (आज भी सर्व-समर्पण का प्राचीन जडाव का चौखटा प्रभु जन्माष्टमी आदि कई विशिष्ट दिनों पर अंगीकार करते हैं).
इस समय जब श्री गिरिधरजी के बहूजी की नथ रह गयी, तब श्रीजी ने अपनी वेणुजी से संकेत किया और वह भी माँग ली.

इसे ही प्रभु कृपा कहते हैं.

विशेष – आज निकुंजनायक श्रीजी व श्री नवनीतप्रियाजी का पाटोत्सव है. 
आज के दिन श्रीजी प्रभु व्रज से पधारने के उपरांत वर्तमान श्रीजी मंदिर के बाहर के चौक में स्थित खर्च-भण्डार में बिराजे थे.यहाँ पर प्रभु तीन बार (संवत 1623, 1728 व 1864) में बिराजे एवं कुछ वर्ष उपरांत वर्तमान मंदिर निर्माण के पूर्ण होने पर डोलोत्सव के अगले दिन द्वितीया पाट के दिन अपने वर्तमान पाट पर विराजे.

खर्च-भण्डार में जिस स्थान पर प्रभु विराजे उस स्थान पर श्रीजी की छवि स्थित है और उसकी सेवा प्रतिदिन श्रीजी के घी-घरिया करते हैं. 
आज खर्च-भंडार में विराजित श्रीजी की छवि को सैंकड़ों लीटर केसर व मेवे युक्त दूध का भोग अरोगाया जाता है और शयन पश्चात सभी वैष्णवों एवं नगरवासियों को वितरित किया जाता है.

आज से सेवाक्रम में कुछ परिवर्तन होंगे. 

पुष्टिमार्ग में प्रत्येक ऋतु का आगमन व पूर्व ऋतु की विदाई प्रभु सुखार्थ धीरे-धीरे क्रमानुसार होती है. 

प्रभुसेवा में आज से शीतकाल की विदाई आरंभ हो गयी है अतः जल रंगों (Water Colors) के चित्रांकन की पिछवाईयां धरायी जानी प्रारंभ हो जाती है.

आज से डोलोत्सव तक इस प्रकार की पिछवाईयां केवल श्रृंगार के दर्शनों में ही धरायी जाती हैं एवं ग्वाल में बड़ी (हटा) कर सफ़ेद मलमल की सादी पिछवाई धरायी जाती हैं क्योंकि राजभोग में प्रभु को गुलाल खेलायी जाती है. 

आज से चरणारविंद के श्रृंगार धराये जाते हैं. आज से प्रभु को मोजाजी भी नहीं धराये जाते परन्तु यदि अधिक शीत हो तो आज का दिन छोड़कर प्रभु सुखार्थ शीत रहने तक राजभोग तक मोजाजी पुनः धराये जा सकते हैं.

आज से डोलोत्सव तक श्रीजी और श्री नवनीतप्रियाजी में ख्याल (स्वांग) प्रारंभ होंगे. ख्याल बनने वाले बालक, बालिकाएं विविध देवों, गन्धर्वों एवं सखाओं के रूप धरकर ख्याल बनकर शयन के दर्शन में प्रभु के समक्ष नाचते हैं जिससे बालभाव में प्रभु आनंदित होते हैं.

कई वर्षों पूर्व जब प्रभु व्रज में थे तब वहां इस प्रकार के ख्याल (स्वांग) निकलते थे. श्रीजी का मन ऐसे ख्याल (स्वांग) देखने बाहर जाने का हुआ तब श्री गिरधरजी ने प्रभु के सुखार्थ सतघरा में ही ख्याल (स्वांग) बनाने की प्रथा प्रारंभ की जो कि आज भी जारी है.

प्रभु को नियम के केसरी (अमरसी) डोरिया के रुपहली ज़री की तुईलैस की दोहरी किनारी से सुसज्जित घेरदार वागा, चोली एवं कटि-पटका धराये जाते हैं. चोली के ऊपर आधी बाँहों वाली श्याम रंग की चोवा की चोली धरायी जाती है. 

श्रीजी को गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में खरमंडा, केसर-युक्त गेहूं के रवा (संजाब) की खीर, श्रीखंडवड़ी का डबरा, मंगोड़ा (मूंग की दाल के गोल दहीवड़ा) की छाछ व दूधघर में सिद्ध की गयी केसर युक्त बासोंदी की हांडी का भोग अरोगाया जाता है. 

श्रृंगार दर्शन – 

कीर्तन – (राग : देवगंधार)

आज माई मोहन खेलन होरी l 
नवतन वेष काछी ठाड़े भये संग राधिकागोरी ll 1 ll
अपने भामते आये देखनको जुरि जुरि नवलकिशोरी l 
चोवा चन्दन और कुंकुमा मुख मांडत ले रोरी ll 2 ll
छूटी लाज तब तन संभारत अति विचित्र बनी जोरी l
मच्यो खेल रंग भयो भारे या उपमाको कोरी ll 3 ll
देत असीस सकल व्रजवनिता अंग अंग सब भोरी l 
‘परमानंद’ प्रभु प्यारीकी छबी पर गिरधर देत अकोरी ll 4 ll

साज – आज प्रभु को होली के सुन्दर चित्रांकन वाली पिछवाई धरायी जाती है जिसमें व्रजभक्त प्रभु को होली खिला रहे हैं और ढप वादन के संग होली के पदों का गान कर रहे हैं. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है.राजभोग में श्वेत मलमल की सादी पिछवाई धरायी जाती है जिसके ऊपर गुलाल, चन्दन से खेल किया जाता है.

वस्त्र – आज श्रीजी को केसरी डोरिया के दोहरा रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित सूथन, घेरदार वागा, चोली एवं कटि-पटका धराये जाते हैं. चोली के ऊपर आधी बाँहों वाली श्याम रंग की चोवा की चोली धरायी जाती है. ठाड़े वस्त्र श्वेत चिकने लट्ठा के धराये जाते हैं.

श्रृंगार – आज श्रीजी को छोटा (कमर तक) हल्का श्रृंगार धराया जाता है. फ़ीरोज़ा के सर्व आभरण धराये जाते हैं.
 श्रीमस्तक पर केसरी रंग की गोल पाग के ऊपर सिरपैंच, लूम की कीलंगी एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में फ़िरोज़ा के एक जोड़ी कर्णफूल धराये जाते हैं.
श्रीकंठ में चार माला धरायी जाती है.
 पीले पुष्पों की कलात्मक थागवाली एक मालाजी धरायी जाती हैं.
 श्रीहस्त में पुष्पछड़ी, फ़ीरोज़ा के वेणुजी एवं एक वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट चीड़ का एवं गोटी फागुन की आती है.

व्रज - फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी

व्रज - फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी Sunday, 15 February 2026 भोरही आयो मेरे द्वार जोगिया अलख कहे कहे जाग । मोहन मूरति एनमेनसी नैन भरे अनुराग ।। अं...