By Vaishnav, For Vaishnav

Sunday, 1 May 2022

व्रज - वैशाख शुक्ल द्वितीया

व्रज - वैशाख शुक्ल द्वितीया
Monday, 02 May 2022

आगम का श्रृंगार

विशेष – आज के दिन भगवान परशुरामजी का जन्म भी हुआ था जो कि भगवान विष्णु के क्रोधवंत अंशावतार हैं. यध्यपि भगवान परशुरामजी को पुष्टिमार्ग में मान्यता नहीं दी गयी है
 
कल अक्षय-तृतीया है और आज श्रीजी को उत्सव के एक दिन पूर्व धराया जाने वाला हल्का श्रृंगार धराया जाता है. 

अधिकांश बड़े उत्सवों के एक दिन पूर्व लाल-पीले वस्त्र एवं पाग-चन्द्रिका का श्रृंगार धराया जाता है. इसे आगम का श्रृंगार कहा जाता है और यह श्रृंगार अनुराग के भाव से धराया जाता है. 

इस श्रृंगार के लाल वस्त्र विविध ऋतुओं के उत्सवों के अनुरूप होते हैं अर्थात गत वैशाख कृष्ण नवमी को श्री महाप्रभुजी के उत्सव के पूर्व के इस श्रृंगार में तत्कालीन ऋतु के अनुरूप घेरदार वागा धराये गए थे और वैशाख कृष्ण द्वादशी से सामान्यतया शीतकालीन वस्त्र अर्थात घेरदार, चाकदार एवं खुलेबंद के वागा नहीं धराये जाते अतः आज प्रभु को लाल मलमल का पिछोड़ा धराया जायेगा. 

कल अक्षय तृतीया है और चन्दन यात्रा का आरम्भ होगा. श्रीजी में सेवाक्रम में भी कई परिवर्तन होंगे. सिंहासन, चरणचौकी, पड़घा, झारीजी, बंटाजी, वेणुजी, वेत्रजी आदि स्वर्ण के प्रभु के सम्मुख इस ऋतु में आज अंतिम बार धरे जाते हैं अर्थात कल से सर्व-साज चांदी के साजे जायेंगे. 

आज से श्रीजी के श्रीहस्त में पुष्पछड़ी के स्थान पर कमल छड़ी धरायी जाएगी.

विगत कल प्रतिपदा को शयन समय चंदुआ एवं टेरा सफ़ेद बांधे जाते हैं.

राजभोग दर्शन – 

कीर्तन – (राग : सारंग)

आज की बानिक कही न जाय, बैठे निकस कुंजद्वार l
लटपटी पाग सिर सिथिल चिहुर चारू खसित बरुहा चंदरस भरें ब्रजराजकुमार ll 1 ll
श्रमजल बिंदु कपोल बिराजत मानों ओस कन नीलकमल पर l
‘गोविंद’ प्रभु लाडिलो ललन बलि कहा कहों अंग अंग सुंदर वर ll 2 ll

साज – आज श्रीजी में लाल सुनहरी लप्पा की, सुनहरी ज़री की तुईलैस के हांशिया से सुसज्जित पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज प्रभु को लाल मलमल का पिछोड़ा धराया जाता हैं. सभी वस्त्र रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित होते हैं. ठाड़े वस्त्र पीले रंग के धराये जाते हैं.

श्रृंगार – प्रभु को आज छोटा (कमर तक) हल्का श्रृंगार धराया जाता है. पन्ना के सर्व आभरण धराये जाते हैं. 
श्रीमस्तक पर लाल मलमल की छज्जेदार
 पाग के ऊपर सिरपैंच, लूम, मोरपंख की सादी चन्द्रिका एवं बायीं ओर शीशफूल धराया जाता है. 
श्रीकर्ण में एक जोड़ी पन्ना के कर्णफूल धराये जाते हैं. श्रीकंठ में पन्ना की चार माला धरायी जाती है. श्वेत पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं.
 श्रीहस्त में कमलछड़ी, हरे मीना के वेणुजी एवं एक वेत्रजी धराये जाते हैं. 
पट लाल, गोटी सोने की छोटी व आरसी श्रृंगार में सोना की एवं राजभोग में बटदार आती है.

Saturday, 30 April 2022

व्रज - वैशाख शुक्ल प्रतिपदा

व्रज - वैशाख शुक्ल प्रतिपदा 
Sunday, 01 May 2022

ग्रीष्म ऋतु का अंतिम मुकुट काछनी का श्रृंगार

विशेष - श्रीजी को आज इस ऋतु का अंतिम मुकुट का श्रृंगार धराया जायेगा. आज के पश्चात मुकुट-काछनी का श्रृंगार लगभग दो माह दस दिन पश्चात (आषाढ़ शुक्ल एकादशी को) धराया जायेगा.
आज के वस्त्र कांकरौली श्री द्वारिकाधीश मंदिर की तरफ़ से आते हैं.

प्रभु को मुख्य रूप से तीन लीलाओं (शरद-रास, दान और गौ-चारण) के भाव से मुकुट का श्रृंगार धराया जाता है. 

अधिक गर्मी एवं अधिक सर्दी के दिनों में मुकुट नहीं धराया जाता इस कारण देव-प्रबोधिनी से फाल्गुन कृष्ण सप्तमी (श्रीजी का पाटोत्सव) तक एवं अक्षय तृतीया से रथयात्रा तक मुकुट नहीं धराया जाता. 

जब भी मुकुट धराया जाता है वस्त्र में काछनी धरायी जाती है. काछनी के घेर में भक्तों को एकत्र करने का भाव है. 

जब मुकुट धराया जाये तब ठाड़े वस्त्र सदैव श्वेत रंग के होते हैं. ये श्वेत वस्त्र चांदनी छटा के भाव से धराये जाते हैं. 

जिस दिन मुकुट धराया जाये उस दिन विशेष रूप से भोग-आरती में सूखे मेवे के टुकड़ों से मिश्रित मिश्री की कणी अरोगायी जाती है. 

आज संभवतया श्रीजी के श्रीहस्त में पुष्पछड़ी अंतिम बार धरायी जाती है. कल से प्रभु के श्रीहस्त में कमल-छड़ी धरायी जायेगी.

कीर्तन – (राग : सारंग)

कुंजभवन तें निकसे माधो-राधा ये चले मेलि गले बांह l
तब प्यारी अरसाय पियसो मंद मंद ज्यों स्वेदकन वदन निहारत करत मुकुट की छांह ll 1 ll
श्रमित जान पट पीत छोरसो पवन ढुरावे हो व्रजवधु वनमांह l
‘जगन्नाथ’ कविराय की प्यारी देखत नयन सिराह ll 2 ll

साज – आज श्रीजी में लाल रंग की मलमल की, सुनहरी लप्पा की तुईलैस के हांशिया से सुसज्जित पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – श्रीजी को आज लाल रंग की मलमल का सूथन, काछनी एवं रास-पटका धराये जाते हैं. चोली नहीं धरायी जाती. 
सभी वस्त्र रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित होते हैं. ठाड़े वस्त्र सफेद जामदानी (चिकन) के धराये जाते हैं.

श्रृंगार - श्रीजी को आज वनमाला (चरणारविन्द तक) का भारी श्रृंगार धराया जाता है. स्वर्ण के सर्व आभरण धराये जाते हैं. 
श्रीमस्तक पर स्वर्ण का डांख का मुकुट एवं बायीं ओर शीशफूल धराया जाता है. 
श्रीकर्ण में हीरा के मयूराकृति कुंडल धराये जाते हैं. बायीं ओर उत्सव की मीना की शिखा (चोटी) धरायी जाती है. 
श्रीकंठ में कली, कस्तूरी व कमल माला धरायी जाती है.
 श्वेत पुष्पों की विविध पुष्पों की थागवाली दो सुन्दर कलात्मक वनमाला धरायी जाती है. 
श्रीहस्त में पुष्पछड़ी, सोने के लहरिया के वेणुजी एवं दो वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट लाल व गोटी शतरंज की आती है.

Friday, 29 April 2022

व्रज - वैशाख कृष्ण अमावस्या

व्रज - वैशाख कृष्ण अमावस्या
Saturday, 30 April 2022

 लाल सफ़ेद लहरियाँ का पिछोड़ा एवं छज्जेदार पाग के श्रृंगार 

जिन तिथियों के लिए प्रभु की सेवा प्रणालिका में कोई वस्त्र, श्रृंगार निर्धारित नहीं होते उन तिथियों में प्रभु को ऐच्छिक वस्त्र व श्रृंगार धराये जाते हैं. 
ऐच्छिक वस्त्र, श्रृंगार प्रभु श्री गोवर्धनधरण की इच्छा, ऋतु की अनुकूलता, ऐच्छिक श्रृंगारों की उपलब्धता, पूज्य श्री तिलकायत महाराजश्री की आज्ञा एवं प्रभु के तत्सुख की भावना से मुखियाजी के स्व-विवेक के आधार पर धराये जाते हैं.

ऐच्छिक वस्त्र, श्रृंगार के रूप में आज श्रीजी को लाल सफ़ेद लहरियाँ का पिछोड़ा व श्रीमस्तक पर छज्जेदार पाग और क़तरा का श्रृंगार धराया जायेगा

राजभोग दर्शन –

कीर्तन : (राग – सारंग)

आंगन खेलिये झनक मनक ।
लरिका यूथ संग मनमोहन बालक ननक ननक ।।१।।
पैया लागो पर घर जावो छांडो खनक खनक ।
परमानंद कहत नंदरानीबानिक तनक तनक ।।२।।

साज – आज श्रीजी में लाल सफ़ेद मलमल की, रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी के हांशिया से सुसज्जित पिछवाई धरायी जाती है.
गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती हे.

वस्त्र – श्रीजी को आज लाल सफ़ेद लहरियाँ का सुनहरी किनारी से सुसज्जित पिछोड़ा धराया जाता है. ठाड़े वस्त्र हरे रंग के होते हैं.

श्रृंगार – श्रीजी को आज छोटा (कमर तक) का हल्का श्रृंगार धराया जाता है. फ़िरोज़ा के सर्वआभरण धराये जाते हैं. 
श्रीमस्तक पर लहरियाँ की छज्जेदार पाग के ऊपर सिरपैंच, रूपहरी, लूम, क़तरा एवं बायीं ओर शीशफूल धराया जाता है. श्रीकर्ण में एक जोड़ी कर्णफूल धराये जाते हैं. .
 गुलाबी एवं सफ़ेद पुष्पों की सुन्दर दो मालाजी धरायी जाती हैं. 
श्रीहस्त में पुष्पछड़ी, स्याम मीना के वेणुजी एवं वैत्रजी धराये जाते हैं.
पट लाल का व गोटी मीना की आती है.

Thursday, 28 April 2022

व्रज - वैशाख कृष्ण चतुर्दशी

व्रज - वैशाख कृष्ण चतुर्दशी
Friday, 29 April 2022

मल्लकाछ टिपारा का श्रृंगार

विशेष – आज का श्रृंगार नियम का नहीं है परन्तु सामान्यतया आज के दिन धराया जाता है. 

श्री महाप्रभुजी के उत्सव पश्चात बाललीला के चार श्रृंगार धराये जाते हैं और इन चार दिन सभी समां में बाल-लीला के कीर्तन ही गाये जाते हैं. 

आज यह श्रृंगार बाललीला के भाव से धराया जा रहा है. 
मल्लकाछ (मल्ल एवं कच्छ) दो शब्दों से बना है और ये एक विशेष पहनावा है जो आम तौर पर पहलवान मल्ल (कुश्ती) के समय पहना करते हैं. 
सामान्यतया वीर-रस का यह श्रृंगार पराक्रमी प्रभु की चंचलता प्रदर्शित करने की भावना से धराया जाता है.

राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : सारंग)

गोविंद लाडिलो लडबोरा l
अपने रंग फिरत गोकुलमें श्यामवरण जैसे भोंरा ll 1 ll
किंकणी कणित चारू चल कुंडल तन चंदन की खोरा l
नृत्यत गावत वसन फिरावत हाथ फूलन के झोरा ll 2 ll
माथे कनक वरण को टिपारो ओढ़े पिछोरा l
‘परमानंद’ दास को जीवन संग दिठो नागोरा ll 3 ll 

साज – आज श्रीजी में माखनचोरी लीला के सुन्दर चित्रांकन से सुसज्जित सुन्दर पिछवाई धरायी जाती है जिसमें कृष्ण-बलराम अपने मित्रों के साथ मल्लकाछ-टिपारा का श्रृंगार धराये माखन चोरी कर रहे हैं. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को हल्के गुलाबी मलमल का मल्लकाछ एवं दो पटका धराये जाते हैं. दोनों वस्त्र रुपहली तुईलैस की किनारी से सुसज्जित होते हैं. ठाड़े वस्त्र श्याम रंग की मलमल के धराये जाते हैं.

श्रृंगार – आज प्रभु को मध्य का (घुटने तक) मध्यम श्रृंगार धराया जाता है. हरे मीना के सर्व आभरण धराये जाते हैं.
 श्रीमस्तक पर टिपारा का साज (गुलाबी रंग की मलमल की टिपारा की टोपी के ऊपर मध्य में मोरशिखा और दोनों ओर दोहरा कतरा) तथा बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में मयुराकृति कुंडल धराये जाते हैं. 
हांस, त्रवल, पायल आदि धराये जाते हैं. श्रीकंठ में कमल माला धरायी जाती है. श्वेत एवं गुलाबी पुष्पों की विविध पुष्पों की थागवाली दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती है.
 श्रीहस्त में पुष्पछड़ी, झिने लहरियाँ के वेणुजी तथा दो वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट गुलाबी व गोटी बाघ-बकरी की आती है. 

Wednesday, 27 April 2022

व्रज - वैशाख कृष्ण त्रयोदशी

व्रज - वैशाख कृष्ण त्रयोदशी
Thursday, 28 April 2022

श्री महाप्रभुजी के उत्सव उपरान्त बालभाव के श्रृंगार

विशेष – श्री महाप्रभुजी के उत्सव उपरान्त कुछ बालभाव के श्रृंगार धराये जाते हैं. आज श्रीजी को बाल-लीला के भाव से धोती-पटका का श्रृंगार धराया जाता है. सभी समां में बाल-लीला के कीर्तन ही गाये जाते हैं.

राजभोग दर्शन –

कीर्तन : (राग – सारंग)

जब मेरो मोहन चलेगो घटुरुवन तब हौं री करौंगी वधाई l
सर्वसु वारी देहुँगी तिहि छिनु मैया कहि तुतुराई ll 1 ll
यशोदा के वचन सुनत ‘केशो प्रभु’ जननी प्रीति जानी अधिकाई l
नंदसुवन सुख दियो मात कों अतिकृपाल मेरो नंद ललाई ll 2 ll

साज – आज श्रीजी में श्री ठाकुरजी को पलना झुलाते नंद-यशोदा जी, नंदोत्सव एवं छठी पूजन के सुन्दर कलात्मक चित्रांकन की पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को लाल मलमल की धोती एवं राजशाही पटका धराया जाता है. दोनों वस्त्र रुपहली ज़री की किनारी से सुसज्जित होते हैं. ठाड़े वस्त्र हरे रंग के धराये जाते हैं.

श्रृंगार – आज प्रभु को छोटा (कमर तक) हल्का श्रृंगार धराया जाता है. मोती के सर्व आभरण धराये जाते हैं.
 श्रीमस्तक पर लाल मलमल की गोल-पाग के ऊपर सिरपैंच, लूम, सुनहरी चमक की गोल-चंद्रिका एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में एक जोड़ी कर्णफूल धराये जाते हैं.
 मोती एवं माणक की हमेल धरायी जाती है.
 श्रीकंठ में हालरा व बघनखा धराये जाते हैं.
 श्वेत एवं गुलाबी पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं.
 श्रीहस्त में पुष्पछड़ी, हरे मीना के वेणुजी तथा एक वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट लाल व गोटी चांदी की आती है. 

Tuesday, 26 April 2022

व्रज - वैशाख कृष्ण द्वादशी

व्रज - वैशाख कृष्ण द्वादशी
Wednesday, 27 April 2022

श्री महाप्रभुजी के उत्सव का परचारगी श्रृंगार

विशेष – आज प्रातः मंगला से श्रृंगार तक श्री द्वारकेशजी महाराज कृत ‘मूल पुरुष’ गायी जाती है एवं सारे दिन प्रत्येक समां में बधाई एवं श्रीवल्लभ की बाल-लीला के कीर्तन गाये जाते हैं.

आज से श्रीजी के सेवाक्रम में भी कुछ परिवर्तन होते हैं. 
मंगला दर्शन में पीठिका के ऊपर धरायी जाने वाली दत्तु आज से नहीं धरायी जाती है. 
इसके अतिरिक्त घेरदार, चाकदार और खुलेबंद के वागा भी आज से नहीं धराये जायेंगे. 
आज से प्रभु को मलमल के उष्णकाल के वस्त्र (पिछोड़ा, परदनी, धोती-पटका, मल्लकाछ आदि) ही धराये जायेंगे.

आज दो समय की आरती थाली में की जाती है. झारीजी सभी समय यमुनाजल की आती है.

आज पिछवाई के अलावा सभी वस्त्र एवं श्रृंगार पिछली कल की भांति ही होते हैं. केवल कल के खुलेबन्द के वागा के स्थान पर पिछोड़ा धराया जाता है (यदि ऋतु में ठंडक हो तो आज खुलेबन्द भी धराये जा सकते हैं).

इसे परचारगी श्रृंगार कहते हैं. श्रीजी में अधिकांश बड़े उत्सवों के एक दिन बाद उस उत्सव का परचारगी श्रृंगार होता है. परचारगी श्रृंगार के श्रृंगारी श्रीजी के परचारक महाराज (चिरंजीवी श्री विशालबावा) होते हैं. यदि वो उपस्थित हों तो वही श्रृंगारी होते है

राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : सारंग)

दान देत श्री लक्ष्मण प्रमुदित मणिमाणिक कंचन पट गाय l
श्री व्रजराज कुंवर यशोदासुत करुणाकर प्रगटे हरि आय ll 1 ll
रही न मन अभिलाष कछू अब याचक ना महतो कोऊ l
‘विष्णुदास’ उमगे अंतर तें दे असीस तुमसे नहि कोय ll 2 ll

साज – आज श्रीजी में एक ओर अग्नि-कुंड में से श्री महाप्रभुजी के प्राकट्य और दूसरी ओर श्री गिरिराजजी की कन्दरा में से श्रीजी के प्राकट्य के सुन्दर चित्रांकन वाली पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को केसरी
 मलमल का पिछोड़ा धराया जाता है. वस्त्र रुपहली तुईलैस की किनारी से सुसज्जित होते हैं परन्तु किनारी बाहर दृश्य नहीं होती अर्थात भीतर की ओर मोड़ दी जाती है. ठाड़े वस्त्र श्वेत मलमल के धराये जाते हैं.

श्रृंगार – आज प्रभु को वनमाला का (चरणारविन्द तक) भारी श्रृंगार धराया जाता है. माणक एवं जड़ाव स्वर्ण के सर्व आभरण धराये जाते हैं.
 श्रीमस्तक पर केसरी की कुल्हे के ऊपर सिरपैंच, पांच मोरपंख की मोर-चंद्रिका की जोड़ एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं.
 श्रीकर्ण में मकराकृति कुंडल धराये जाते हैं. बायीं ओर उत्सव की मोती की चोटी (शिखा) भी धरायी जाती है.
आज बाजु पोची माणक की धरायी जाती हैं.
 चैत्री गुलाबों एवं अन्य पुष्पों से निर्मित जाली वाला अत्यंत सुन्दर वन-चौखटा पीठिका के ऊपर धराया जाता है.
 श्वेत एवं गुलाबी पुष्पों की दो सुन्दर थागवाली कलात्मक वनमाला धरायी जाती हैं.
 श्रीहस्त में पुष्पछड़ी, हीरा के वेणुजी एवं दो वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट एवं गोटी जड़ाऊ की व आरसी श्रृंगार में चार झाड़ की एवं राजभोग में सोना की आती 

Monday, 25 April 2022

व्रज - वैशाख कृष्ण एकादशी

व्रज - वैशाख कृष्ण एकादशी
Tuesday, 26 April 2022

दृढ़ इन चरनन केरो,
भरोसो दृढ़ इन चरनन केरो।
श्रीवल्लभनख चन्द्र छटा बिनु,
सब जग माँझ अन्धेरो।।
साधन और नहीं या कलि में,
जासों होत निबेरो।
सूर कहा कहे द्विविध आँधरो,
बिना मोल को चेरो।।
भरोसो दृढ़ इन चरनन केरो।

सभी वैष्णवों को पुष्टिमार्ग के प्रथम प्रणेता परमपूज्य जगद्गुरु श्रीमद्वल्लभाचार्य जी के ५४५ वे  प्राकट्योत्सव की ख़ूबख़ूब बधाई

जगद्गुरु श्रीमद्वल्लभाचार्यजी (श्री महाप्रभुजी) का प्राकट्योत्सव (जगद्गुरु श्रीमद्वल्लभाचार्यजी के बारे में विस्तृत जानकारी अन्य पोस्ट में )

आज वैशाख कृष्ण (वरूथिनी) एकादशी है और जगद्गुरु श्रीमद्वल्लाभाचार्यजी (श्रीमहाप्रभुजी) का प्राकट्योत्सव है. 

उत्सव विशेष – आज पुष्टिमार्ग के प्रथम प्रणेता जगद्गुरु श्रीमद्वल्लभाचार्यजी का प्राकट्योत्सव है अतः श्रीजी मंदिर के सभी मुख्य द्वारों की देहरी (देहलीज) को हल्दी से लीपी जाती हैं एवं आशापाल की सूत की डोरी की वंदनमाल बाँधी जाती हैं. 

आज प्रत्येक द्वार के ऊपर रंगोली भी मांडी जाती है. हल्दी को गला कर द्वार के ऊपर लीपी जाती है एवं सूखने के पश्चात उसके ऊपर गुलाल, अबीर एवं कुंकुम आदि से कलात्मक रूप से कमल, पुष्प-लता, स्वास्तिक, चरण-चिन्ह आदि का चित्रांकन किया जाता है और अक्षत छांटते हैं. इसे बड़ी देहरी मांडना कहते हैं. 

सभी समय झारीजी में यमुनाजल भरा जाता है. चारों समय (मंगला, राजभोग, संध्या-आरती व शयन) में आरती थाली में की जाती है. 

चरणचौकी, पड़घा, कुंजा, बंटा आदि सर्व साज जड़ाव स्वर्ण के धरे जाते हैं. तकिया आदि भी जड़ाऊ आते हैं. कमल के कामवाली पिछवाई धरायी जाती है. गेंद, चौगन, दीवला आदि सभी सोने के आते हैं.  
टेरा (पर्दा) केसरी जन्माष्टमी वाले आते हैं.

आज मंगला से सायं तक ठोड़ के वारा में जलेबी टूक के टोकरा अरोगाये जाते हैं.

मंगला दर्शन पश्चात प्रभु को चन्दन, आवंला, एवं फुलेल (सुगन्धित तेल) से अभ्यंग (स्नान) कराया जाता है. 
अभ्यंग के मध्य कीर्तन के छह पद नियम के गाये जाते  हैं.

आज के दिन श्रीजी के निज मंदिर में विराजित श्री महाप्रभुजी के पादुकाजी को भी अभ्यंग कराया जाता है.

आज श्रीजी को नियम के केसरी (अमरसी) मलमल के खुलेबन्ध के चाकदार वागा व श्वेत ठाडे वस्त्र धराये जाते हैं. वनमाला का दो जोड़ी का श्रृंगार धराया जाता है. हांस, हमेल, कठुला, त्रबल आदि धराये जाते हैं. श्रीमस्तक पर कुल्हे के ऊपर पांच मोरपंख की चन्द्रिका धरायी जाती है.
श्याम वस्त्र के ऊपर मोतियों की सज्जा वाला सुन्दर चौखटा प्रभु की पीठिका पर धराया जाता है. 

श्रीजी को गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में विशेष रूप से केशरयुक्त जलेबी के टूक, दूधघर में सिद्ध की गयी केसर युक्त बासोंदी की हांडी व शाकघर में सिद्ध चार विविध प्रकार के फलों के मीठा का अरोगाये जाते हैं. 

राजभोग में अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता, सखड़ी में केसरी पेठा, मीठी सेव, पांचभात (मेवा-भात, दही-भात, राई-भात, श्रीखंड-भात एवं वड़ी-भात) व घोला हुआ सतुवा अरोगाये जाते हैं. 

राजभोग समय उत्सव भोग रखे जाते हैं जिनमें प्रभु को केशरयुक्त जलेबी टूक के टोकरा, दूधघर में सिद्ध मावे के पेड़ा-बरफी, दूधपूड़ी (मलाई पूड़ी), बासोंदी, जीरा मिश्रित दही, केसरी-सफेद मावे की गुंजिया, श्रीखंड-वड़ी, घी में तला हुआ बीज-चालनी का सूखा मेवा, विविध प्रकार के संदाना (आचार) के बटेरा, विविध प्रकार के फलफूल, शीतल आदि अरोगाये जाते हैं.

इसी प्रकार श्रीजी के निज मंदिर में विराजित श्री महाप्रभुजी की गादी को भी एक थाल में यही सब सामग्रियां भोग अरोगायी जाती हैं.

राजभोग सरे उपरान्त श्रीजी को उस्ताजी की बड़ी आरसी दिखायी जाती हैं फिर राजभोग दर्शन खुलते है और श्रीजी को तिलक, अक्षत किये जाते है, बीड़ा पधराये जाते हैं और मुठिया वार के चून की आरती की जाती है.
इस उपरान्त श्री महाप्रभुजी के पादुकाजी को भी मुठिया वार के चून की आरती की जाती है.

आज श्रीजी को नियम के केसरी मलमल के खुले बन्ध (तनी बाँध के धरावे) चाकदार वागा व श्वेत ठाडे वस्त्र धराये जाते हैं. वनमाला का दो जोड़ी का श्रृंगार धराया जाता है. हांस, हमेल, कठुला, त्रबल आदि धराये जाते हैं.

राजभोग दर्शन -

कीर्तन – (राग : सारंग)

घरघर ग्वाल देत हे हेरी l
बाजत ताल मृदंग बांसुरी ढ़ोल दमामा भेरी ll 1 ll
लूटत झपटत खात मिठाई कहि न सकत कोऊ फेरी l
उनमद ग्वाल करत कोलाहल व्रजवनिता सब घेरी ll 2 ll
ध्वजा पताका तोरनमाला सबै सिंगारी सेरी l
जय जय कृष्ण कहत ‘परमानंद’ प्रकट्यो कंस को वैरी ll 3 ll 

कीर्तन – (राग : सारंग)

केसरकी धोती पहेरे केसरी उपरना ओढ़े तिलक मुद्रा धर बैठे श्री लक्ष्मण भट्ट धाम l
जन्म धोस जान जान अद्भुत रूचि मान मान नखशिखकी शोभा ऊपर वारों कोटि काम ll 1 ll
सुन्दरताई निकाई तेज प्रताप अतुल ताई आसपास युवतीजन करत है गुणगान l
‘पद्मनाभ’ प्रभु विलोक गिरिवरधर वागधीस यह अवसर जे हुते ते महा भाग्यवान ll 2 ll

कीर्तन – (राग : सारंग)

आज वधाई को दिन नीको l
नंदघरनी जसुमति जायौ है लाल भामतो जीकौ ll 1 ll
पांच शब्द बाजे बाजत घरघरतें आयो टीको l
मंगल कलश लीये व्रज सुंदरी ग्वाल बनावत छीको ll 2 ll
देत असीस सकल गोपीजन चिरजीयो कोटि वरीसो l
‘परमानंददास’को ठाकुर गोप भेष जगदीशो ll 3 ll

साज - आज श्रीजी में केसरी रंग की मलमल की, उत्सव के कमल के काम (Work) वाली एवं रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी के हांशिया से सुसज्जित पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को केसरी मलमल के खुले बन्ध (तनी बाँध के धरावे) का चाकदार वागा सूथन, पटका चोली फूल वाले किनारी के धराये जाते हैं. सभी वस्त्र रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित होते हैं. ठाड़े वस्त्र श्वेत मलमल के धराये जाते हैं. श्वेत ठाड़े वस्त्र श्रीवल्लभ के यश के भाव से धराये जाते हैं.

श्रृंगार – आज प्रभु को वनमाला का (चरणारविन्द तक) भारी श्रृंगार धराया जाता है. माणक की प्रधानता एवं जड़ाव स्वर्ण के सर्व आभरण धराये जाते हैं. 
नीचे पदक, ऊपर माला, दुलड़ा व हार उत्सववत धराये जाते हैं.
श्रीमस्तक पर केसरी कुल्हे के ऊपर सिरपैंच, पांच मोरपंख की मोर-चंद्रिका की जोड़ एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में मकराकृति कुंडल धराये जाते हैं. बायीं ओर उत्सव की मोती की चोटी (शिखा) भी धरायी जाती है. 

श्रीकंठ में कली,कस्तूरी आदि की माला आती हैं.आज श्रीजी को बघनखा धराया जाता हैं. 
उत्सव का मोती का चौखटा पीठिका के ऊपर धराया जाता है.
 श्वेत एवं गुलाबी पुष्पों की दो सुन्दर थागवाली कलात्मक वनमाला धरायी जाती हैं.
 श्रीहस्त में पुष्पछड़ी, हीरा के वेणुजी एवं दो वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट उत्सव का गोटी जड़ाऊ की व आरसी जड़ाऊ की आती है.

विशेष- श्री आचार्य जी , श्री प्रभु चरण श्री गुसाईं जी एवम् समस्त तिलकायत गृह आचार्यों ने सेवा प्रणालिका में सदैव तत्सुख को ही सर्वोपरि रखा है। सेवा रीति का जब सूक्ष्मता से विचार करें तो बारंबार इस प्रेम की पराकाष्ठा के दर्शन होते हैं। ऐसा ही एक क्रम श्री आचार्य जी के उत्सव के सेवा प्रकार में आता है *" आधी सफेदी उतरे"*
श्री आचार्य जी का उत्सव उष्णकाल में आता है, इसलिए पुरी सफेदी विजय करने पर श्री प्रभु को गर्मी से श्रम ना होवे इसलिए उत्सवान्तर्गत केवल तकियों की सफेदी उतारी जाती है बाकी सर्वत्र सफेदी यथावत रहती है और तकियों में भी तकिया पट्टी के मध्य सफेदी रखी जाती है । ये सेवा रीतियां केवल और केवल प्रेम की पराकाष्ठा को परिलक्षित करती हैं। आप सभी वाल्लभीय सृष्टि भी यथाशक्ति अनुसरण कर श्री प्रभु को इस महोत्सव पर प्रेम पूर्वक उत्तमोत्तम लाड़ लड़ाए।

व्रज - विस २०८३ श्रावण कृष्ण अमावस्या Wednesday, 12 August 2026

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