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Tuesday, 30 June 2026

व्रज – विस २०८३ आषाढ़ कृष्ण प्रतिपदा (द्वितीय)Wednesday, 01 July 2026

व्रज – विस २०८३ आषाढ़ कृष्ण प्रतिपदा (द्वितीय)
Wednesday, 01 July 2026

श्वेत मलमल के धोती पटका एवं श्रीमस्तक पर गोल पाग पर तुर्रा के श्रृंगार 

राजभोग दर्शन – 

कीर्तन – (राग : सारंग)

आज धरी गिरधर पिय धोती
अति झीनी अरगजा भीनी पीतांबर घन दामिनी जोती ll 1 ll
टेढ़ी पाग भृकुटी छबि राजत श्याम अंग अद्भुत छबि छाई l
मुक्तामाल फूली वनराई, 'परमानंद' प्रभु सब सुखदाई ll 2 ll

साज – आज श्रीजी में श्वेत रंग की मलमल की पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है. 

वस्त्र – आज श्रीजी को श्वेत रंग की मलमल के धोती एवं पटका धराये जाते है. दोनों वस्त्र रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित हैं.

श्रृंगार – आज प्रभु को ऊष्णकालीन हल्का श्रृंगार धराया जाता है. मोती के सर्व आभरण धराये जाते हैं.
 श्रीमस्तक पर श्वेत रंग की गोल पाग के ऊपर सिरपैंच, तुर्रा एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में मोती के कर्णफूल धराये जाते हैं.
 श्वेत पुष्पों की कलात्मक थागवाली दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं.
 श्रीहस्त में तीन कमल की कमलछड़ी, झीनें लहरियाँ के वेणुजी एवं वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट ऊष्णकाल का व गोटी छोटी हकीक की आती है.

Monday, 29 June 2026

व्रज – विस २०८३ आषाढ़ कृष्ण प्रतिपदाTuesday, 30 June 2026

व्रज – विस २०८३ आषाढ़ कृष्ण प्रतिपदा
Tuesday, 30 June 2026

प्रीतम प्रीत ही तें पैये ।
यद्यपि रूप गुण शील सुघरता, इन बातन न रीजैयें ॥१॥
सतकुल जन्म करम शुभ लक्षण, वेद पुरान पढ़ैये ।
“गोविंदके प्रभु” बिना स्नेह सुवालों, रसना कहा जू नचैये ॥२॥

भावार्थ- विशुद्ध प्रेम ही अन्त:करण को पवित्र करता है. परम प्रीति ही भक्ति है. प्रभु प्रेम द्वारा ही वश में होते हैं.
रूप, गुण, शील, सुघड़ता इन सब से प्रभु प्रसन्न नहीं होते हैं. अच्छे कुल में जन्म होना, कर्म, शुभ लक्षण, वेद पुराणों का ज्ञान यह सब हो किन्तु प्रेम नहीं हो तो सब व्यर्थ है.

नित्यलीलास्थ गौस्वामी तिलकायत श्री गोवर्धनलालजी महाराजश्री का गादी उत्सव

विशेष – आज नित्यलीलास्थ गौस्वामी तिलकायत श्री गोवर्धनलालजी महाराजश्री का गादी उत्सव हैं. विक्रम संवत १९३२ में आषाढ़ कृष्ण प्रतिपदा के दिन आप तिलकायत की गादी पर आसीन हुए थे. 
आपने प्रभु सुखार्थ कई भव्य मनोरथों का आयोजन किया और नाथद्वारा की उत्तरोत्तर प्रगति के क्षेत्र में कई कार्य किये अतः आपका युग नाथद्वारा के लिए स्वर्णयुग कहा जाता है.

सेवाक्रम - गादी उत्सव होने के कारण श्रीजी मंदिर के सभी मुख्य द्वारों की देहरी (देहलीज) को पूजन कर हल्दी से लीपी जाती हैं एवं आशापाल की सूत की डोरी की वंदनमाल बाँधी जाती हैं.

झारीजी में सभी समय यमुनाजल भरा जाता है. दो समय की आरती थाली में की जाती है.

आज का श्रृंगार भी निश्चित है. आज प्रभु को गुलाबी रंग की परधनी, श्रीमस्तक पर पाग एवं हीरा के आभरण धराये जाते हैं. 
आज से कीर्तनों में सूहा, बिलावल एवं सायंकाल सोरठ राग भी गाये जाते हैं.

गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में आज श्रीजी को विशेष रूप से आमरस की तवापूड़ी व दूधघर में सिद्ध की गयी केसर युक्त बासोंदी की हांडी अरोगायी जाती है. 
राजभोग में अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता व सखड़ी में आमरस-भात अरोगाये जाते हैं.

प्रभु को नियम से आमरस की तवापूड़ी वर्ष में केवल आज के दिन ही अरोगायी जाती है.
आज से सायंकाल भोग दर्शन के समय श्रीजी के सम्मुख मणिकोठा में पुष्पों पत्तियों से सुसज्जित फुलवारी धरी जाती है. 

राजभोग दर्शन – 

कीर्तन – (राग : सारंग)

गायनसों रति गोकुलसों रति गोवर्धनसों प्रीति निवाहीं l
श्रीगोपाल चरण सेवा रति गोप सखा सब अमित अथाई ll 1 ll
गोवाणी जो वेदकी कहियत श्रीभागवत भलें अवगाही ll 2 ll
‘छीतस्वामी’ गिरिधरन श्रीविट्ठल नंदनंदन की सब परछांई ll 3 ll

साज – आज श्रीजी में श्री गिरिराजजी की कन्दरा की निकुंज एवं श्री स्वामिनीजी आदि के सुन्दर चित्रांकन से सुसज्जित पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है. 

वस्त्र – आज श्रीजी को गुलाबी रंग की मलमल की परधनी धरायी जाती है. परधनी रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित होती है. 

श्रृंगार – आज प्रभु को छोटा (कमर तक) ऊष्णकालीन हल्का श्रृंगार धराया जाता है. 
हीरा के सर्व आभरण धराये जाते हैं. 
श्रीमस्तक पर गुलाबी रंग की ऊपर छोर व नीचे लटकन वाली पाग के ऊपर सिरपैंच, लूम की रुपहली किलंगी एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. 
श्रीकर्ण में कर्णफूल धराये जाते हैं. अलख धराये जाते हैं.
श्रीकंठ में हीरा की बघ्घी आती है व त्रवल नहीं धराये जाते. हरे एवं श्वेत पुष्पों की रंग-बिरंगी थागवाली दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं वहीं हीरे की एक सुन्दर माला हमेल की भांति भी धरायी जाती हैं. 
श्रीहस्त में तीन कमल की कमलछड़ी, हीरे के वेणुजी एवं एक वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट ऊष्णकाल का व गोटी बड़ी हकीक की आती है.

Sunday, 28 June 2026

व्रज - विस २०८३ ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा Monday, 29 June 2026

व्रज - विस २०८३ ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा 
Monday, 29 June 2026

शरबती मलमल पर गुलाबी छापा का आड़बंद एवं श्रीमस्तक पर छज्जेदार पाग पर श्वेत मोर चंद्रिका के श्रृंगार 

राजभोग दर्शन

कीर्तन – (राग : सारंग)

पनिया न जैहोरी आली नंदनंदन मेरी मटुकी झटकिके पटकी l
ठीक दुपहरीमें अटकी कुंजनमें कोऊ न जाने मेरे घटकी ll 1 ll
कहारी करो कछु बस नहि मेरो नागर नटसों अटकी l
‘नंददास’ प्रभुकी छबि निरखत सुधि न रही पनघटकी ll 2 ll

साज – आज श्रीजी में शरबती रंग की मलमल की छापा की पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को शरबती मलमल पर गुलाबी छापा का आड़बंद धराया जाता है.

श्रृंगार – आज प्रभु को छोटा (कमर तक) ऊष्णकालीन हल्का श्रृंगार धराया जाता है. 
मोती के सर्व आभरण धराये जाते हैं. 
श्रीमस्तक पर शरबती रंग की छज्जेदार पाग के ऊपर सिरपैंच, लूम, श्वेत मोर चंद्रिका एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. 
श्रीकर्ण में मोती के एक जोड़ी कर्णफूल धराये जाते हैं.
 श्वेत पुष्पों की कलात्मक थागवाली दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं.
श्रीहस्त में तीन कमल की कमलछड़ी, झीनें लहरियां के वेणुजी एवं एक वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट ऊष्णकाल का व गोटी हक़ीक की छोटी आती है.

Saturday, 27 June 2026

व्रज - विस २०८३ ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्दशीSunday, 28 May 2026

व्रज - विस २०८३ ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्दशी
Sunday, 28 May 2026

नंदको मन वांछित दिन आयो,
फुली फरत यशोदा रोहिणी,
उर आनंद न समायो ।।
गाम गाम ते जाति बलाई
मोतिन चोक पुरायो 
व्रज वनिता सब मंल गावत,
बाजत घोष बधायो ।।
प्रथम रात्रि यमुना जल घट भरि,
अधिवासन करवायो ।।
उठि प्रातकंचन चोकी धरी
ता पर लाल बैठायो ।।
राज बेठ अभिषेक करत है
विप्रन वेद पठायो ।
जेष्ठ शुकल पून्यो दिन सुर बधु,
हरखि फूल बरखायो ।।
रंगी कोर धोती उपरणा,
आभूषण सब साज, ।
द्वारकेश आनंद भयो प्रभु,
नाम धर्यो ब्रजराज

ज्येष्ठाभिषेक (स्नान-यात्रा)

श्री नंदरायजी ने श्री ठाकुरजी का राज्याभिषेक कर उनको व्रजराजकुंवर से व्रजराज के पद पर आसीन किया, यह उसका उत्सव है. 

इसी भाव से स्नान-अभिषेक के समय वेदमन्त्रों-पुरुषसूक्त का वाचन किया जाता है. वेदोक्त उत्सव होने के कारण सर्वप्रथम शंख से स्नान कराया जाता है.

इस आनंद के अवसर पर व्रजवासी अपनी ओर से प्रभु को अपनी ओर से अपनी ऋतु के फल की भेंट के रूप में उत्तमोत्तम ‘रसस्वरुप’ आम प्रभु को भोग रखते हैं इस भाव से आज श्रीजी को सवा लाख (1,25,000) आम (विशेषकर रत्नागिरी व केसर) आरोगाये जाते हैं.

ऐसा भी कहा जाता है कि व्रज में ज्येष्ठ मास में पूरे माह श्री यमुनाजी के पद, गुणगान, जल-विहार के मनोरथ आदि हुए. इसके उद्यापन स्वरुप आज प्रभु को सवालक्ष आम अरोगा कर पूर्णता की.

स्नान का कीर्तन - (राग-बिलावल)

मंगल ज्येष्ठ जेष्ठा पून्यो करत स्नान गोवर्धनधारी l
दधि और दूब मधु ले सखीरी केसरघट जल डारत प्यारी ll 1 ll
चोवा चन्दन मृगमद सौरभ सरस सुगंध कपूरन न्यारी l
अरगजा अंग अंग प्रतिलेपन कालिंदी मध्य केलि विहारी ll 2 ll
सखियन यूथयूथ मिलि छिरकत गावत तान तरंगन भारी l
केशो किशोर सकल सुखदाता श्रीवल्लभनंदनकी बलिहारी ll 3 ll

स्नान में लगभग आधा घंटे का समय लगता है और लगभग डेढ़ से दो घंटे तक दर्शन खुले रहते हैं. 

दर्शन पश्चात श्रीजी मंदिर के पातलघर की पोली पर कोठरी वाले के द्वारा वैष्णवों को स्नान का जल वितरित किया जाता है.

मंगला दर्शन उपरांत श्रीजी को श्वेत मलमल का केशर के छापा वाला पिछोड़ा और श्रीमस्तक पर सफ़ेद कुल्हे के ऊपर तीन मोरपंख की चन्द्रिका की जोड़ धराये जाते हैं.

मंगला दर्शन के पश्चात मणिकोठा और डोल तिबारी को जल से खासा कर वहां आम के भोग रखे जाते हैं. इस कारण आज श्रृंगार व ग्वाल के दर्शन बाहर नहीं खोले जाते.

गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में आज श्रीजी को विशेष रूप से मेवाबाटी व दूधघर में सिद्ध की गयी केसर युक्त बासोंदी की हांडी अरोगायी जाती है. 
राजभोग में अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता अरोगाया जाता है.
सखड़ी में घोला हुआ सतुवा, श्रीखण्ड भात, दहीभात, मीठी सेव, केशरयुक्त पेठा व खरबूजा की कढ़ी अरोगाये जाते हैं.

गोपीवल्लभ (ग्वाल) में ही उत्सव भोग भी रखे जाते हैं जिसमें खरबूजा के बीज और चिरोंजी के लड्डू, दूधघर में सिद्ध मावे के पेड़ा-बरफी, दूधपूड़ी, बासोंदी, जीरा मिश्रित दही, केसरी-सफेद मावे की गुंजिया, घी में तला हुआ चालनी का सूखा मेवा, विविध प्रकार के संदाना (आचार) के बटेरा, विविध प्रकार के फलफूल, शीतल के दो हांडा, चार थाल अंकुरी (अंकुरित मूंग) आदि अरोगाये जाते हैं.

इसके अतिरिक्त आज ठाकुरजी को अंकूरी (अंकुरित मूंग) एवं फल में आम, जामुन का भोग अरोगाने का विशेष महत्व है.

 अक्षय तृतीया से रथयात्रा तक प्रतिदिन संध्या-आरती में प्रभु को बारी-बारी से जल में भीगी (अजवायन युक्त) चने की दाल, भीगी मूँग दाल व तीसरे दिन अंकुरित मूँग (अंकूरी) अरोगाये जाते हैं. 

इस श्रृंखला में आज विशेष रूप से ठाकुरजी को छुकमां मूँग (घी में पके हुए व नमक आदि मसाले से युक्त) अरोगाये जाते हैं.

राजभोग दर्शन  –

कीर्तन – (राग : सारंग)

जमुनाजल गिरिधर करत विहार ।
आसपास युवति मिल छिरकत कमलमुख चार ॥ 1 ll
काहुके कंचुकी बंद टूटे काहुके टूटे ऊर हार ।
काहुके वसन पलट मन मोहन काहु अंग न संभार ll 2 ll
काहुकी खुभी काहुकी नकवेसर काहुके बिथुरे वार ।
‘सूरदास’ प्रभु कहां लो वरनौ लीला अगम अपार ll 3 ll

साज – आज श्रीजी में श्वेत मलमल की पिछवाई धरायी जाती है जिसमें केशर के छापा व केशर की किनार की गयी है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज प्रभु को श्वेत मलमल का केशर के छापा वाला पिछोड़ा धराया जाता है.

श्रृंगार – प्रभु को आज वनमाला का (चरणारविन्द तक) उष्णकालीन हल्का श्रृंगार धराया जाता है. 
हीरा एवं मोती के उत्सव के मिलमा आभरण धराये जाते हैं.
 श्रीमस्तक पर केसर की छाप वाली श्वेत  रंग की कुल्हे के ऊपर सिरपैंच, तीन मोरपंख की चंद्रिका की जोड़ तथा बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में मकराकृति कुंडल धराये जाते हैं. 
श्रीकंठ में बघ्घी धरायी जाती है व हांस, त्रवल नहीं धराये जाते. कली आदि सभी माला धरायी जाती हैं. तुलसी एवं श्वेत पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं.
 श्रीहस्त में चार कमल की कमलछड़ी, मोती के वेणुजी तथा दो वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट ऊष्णकाल का व गोटी मोती की आती है.
आरसी श्रृंगार में हरे मख़मल की एवं राजभोग में सोने की डांडी की आती है.

आज शयन में आम की मंडली आवे

Friday, 26 June 2026

व्रज - विस २०८३ ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशीSaturday, 27 June 2026

व्रज - विस २०८३ ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी
Saturday, 27 June 2026

नित्यलीलास्थ तिलकायत श्री गिरिधारीजी महाराज श्री (वि.सं.१८९९) का उत्सव
केसरी धोती पटका एवं श्रीमस्तक पर दुमाला पर सेहरा के शृंगार

दिन दुल्हे तेरे सोहे शीश सुहावनो ।
मणि मोतिन को शेहरो सोहे बसियो मन मेरे ।।१।।
मुख पून्यो को चंद है मुक्ताहल तारे । 
उन के नयन चकोर हैं, ऐ सब देखन हारे ।।२।।
पिय बने प्यारि, अति सुंदर बनि आय । 
परम आगरी रूप नागरी ऐ सब देखन आई ।।३।। 
दुलहनि रेन सुहाग की, दुलह सुंदर वर पायो । 
श्रीनंदलाल को शेहरो, जन परमानंद यश गायो ।।४।।

विशेष – आज नित्यलीलास्थ तिलकायत श्री गिरिधारीजी महाराज श्री (वि.सं.१८९९) का उत्सव है. आप सभी को नित्यलीलास्थ तिलकायत श्री (वीर) गिरधारी जी महाराज के उत्सव की बधाई

प्रभु को नियम के वस्त्र और श्रृंगार - केसरी धोती, पटका व दुमाला के ऊपर सेहरा धराया जाता है.

श्रीजी को गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में विशेष रूप से केशरयुक्त जलेबी के टूक व दूधघर में सिद्ध की गयी केसर युक्त बासोंदी की हांडी अरोगायी जाती है. 

राजभोग में अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता व सखड़ी में खंडरा प्रकार अरोगाये जाते हैं. 

खंडरा प्रकार प्रसिद्द गुजराती व्यंजन खांडवी का ही रूप है. इसे सिद्ध करने की प्रक्रिया व बहुत हद तक उससे प्रेरित है, केवल खंडरा सिद्ध कर उन्हें घी में तला जाता है फिर अलग से घी में हींग-जीरा का छौंक लगाकर खांड का रस पधराया जाता है और तले खंडरा उसमें पधराकर थोडा नमक डाला जाता है. प्रभु सेवा में इस सामग्री को खंडरा की कढ़ी कहा जाता है और यह सामग्री वर्ष में कई बार बड़े उत्सवों पर व विशेषकर अन्नकूट पर अरोगायी जाती है. 

भोग समय फीका में घी में तला बीज-चालनी का सूखा मेवा अरोगाया जाता है.

राजभोग दर्शन -

कीर्तन – (राग : सारंग)

आज बने गिरिधारी दूलहे,
चंदन की तन खोर करें ।।
सकल सिंगार बने मोतीनके,
बिविध कुसुम की माला गरें ।।१।।
खासा को कटि बन्यो पिछोरा,
मोतीन सहेरो शीश धरें ।।
राते नयन बंक अनियारे,
चंचल खंजन मान हरें ।।२।।
ठाडे कमल फिराजत,
गावत कुंडल श्रमकण बिंदु परें ।।
सूरदास मदन मोहन मिल,
राधासों रति केलि करें ।।३।।

बधाई-

केसरकी धोती पहेरे केसरी उपरना ओढ़े
तिलक मुद्रा धर बैठे श्री लक्ष्मण भट्ट धाम l
जन्मधोस जान जान अद्भुत रूचि मान मान,
नखशिखकी शोभा ऊपर वारों कोटि काम ll 1 ll
सुन्दरताई निकाई तेज प्रताप अतुल ताई
आसपास युवतीजन करत है गुणगान l
‘पद्मनाभ’ प्रभु विलोक गिरिवरधर वागधीस
यह अवसर जे हुते ते महा भाग्यवान ll 2 ll

साज – आज श्रीजी में केसरी मलमल की, उत्सव के कमल के काम वाली एवं रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी के हांशिया से सुसज्जित पिछवाई धरायी गया है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की गयी है.

वस्त्र – आज श्रीजी को केसरी मलमल की धोती एवं राजशाही पटका धराया गया है. दोनों वस्त्र रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित हैं.

श्रृंगार – प्रभु को आज मध्य से दो अंगुल नीचे (घुटने तक) ऊष्णकालीन हल्का श्रृंगार धराया गया है. हीरा व मोती के मिलवा उत्सव के सर्व आभरण धराये जाते हैं.
श्रीमस्तक पर केसरी रंग के दुमाला के ऊपर मोती का सेहरा पर पांच हीरा के फूल एवं बायीं ओर शीशफूल धराये हैं. दायीं ओर सेहरे की हीरे की चोटी धरायी गयी है. मोती की बग्घी धरायी जाती है. श्रीकर्ण में हीरा के मयूराकृति कुंडल धराये हैं.
श्रीकंठ में कली आदि सब माला धरायी जाती है. आज हांस-त्रवल नहीं धराये जाते. 
श्वेत पुष्पों की दो सुन्दर कलात्मक मालाजी धरायी जाती हैं.
 श्रीहस्त में दो कमल की कमलछड़ी, जड़ाव मोती के वेणुजी एवं दो वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट ऊष्णकाल का, गोटी राग-रंग की, आरसी श्रृंगार में पीले खंड की व राजभोग में सोने की डांडी की आती है.

Thursday, 25 June 2026

व्रज - विस २०८३ ज्येष्ठ शुक्ल द्वादशी Friday, 26 June 2026

व्रज - विस २०८३ ज्येष्ठ शुक्ल द्वादशी 
Friday, 26 June 2026

यमुना जल घट भर चलि चंद्रावली नारि ।
मारग में खेलत मिले घनश्याम मुरारि ।।१।।
नयनन सों नयना मिले मन हर लियो लुभाय ।
मोहन मूरति मन बसी पग धर्यो न जाय ।।२।।

स्नान को जल भरवे के भाव को श्रृंगार
चतुर्दशी के दिन स्नान यात्रा उत्सव होने से आज ज्येष्ठाभिषेक के लिए जल त्रयोदशी यानी शनिवार, 27 जून 2026 को भरा जाएगा 

राजभोग दर्शन – 

कीर्तन – (राग : सारंग)

दुपहरी झनक भई तामें आये पिय मेरे मैं ऊठ कीनो आदर l
आँखे भर ले गई तनकी तपत सब ठौर ठौर बूंदन चमक ll 1 ll
रोम रोम सुख संतोष भयो गयो अनंग तनमें न रह्यो ननक l
मोहें मिल्यो अब ‘धोंधी’ के प्रभु मिट गई विरहकी जनक ll 2 ll

राजभोग दर्शन –

साज – आज श्रीजी में श्वेत जालीदार वस्त्र पर जल भरकर लाती गोपियों के सुन्दर काम से सुशोभित पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर श्वेत बिछावट की गयी है.

वस्त्र – आज श्रीजी को गुलाबी मलमल का, रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित आड़बंद धराया जाता है.

श्रृंगार – आज प्रभु को छोटा (कमर तक) ऊष्णकालीन हल्का श्रृंगार धराया जाता है. मोती के सर्व आभरण धराये जाते हैं.
श्रीमस्तक पर गुलाबी मलमल की छज्जेदार पाग के ऊपर सिरपैंच, श्वेत मोरपंख के कतरा (खंडेला) एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में मोती के एक जोड़ी कर्णफूल धराये जाते हैं. तुलसी एवं श्वेत पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं वहीं ऐसी ही दो मालाजी हमेल की भांति भी धरायी जाती है.
श्रीहस्त में कमलछड़ी, सोने-चांदी (गंगा-जमुना) के वेणुजी एवं एक वेत्रजी धराये जाते हैं. पट-गोटी उष्णकाल के आते हैं.

Wednesday, 24 June 2026

व्रज - ज्येष्ठ शुक्ल एकादशीThursday, 25 June 2026

व्रज - ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी
Thursday, 25 June 2026

निर्जला एकादशी व्रत

श्वेत मलमल का पिछोड़ा एवं श्रीमस्तक पर मोती का किरीट के शृंगार

विशेष – आज निर्जला एकादशी है. आज के दिन कई लोग निर्जल रह कर एकादशी करते हैं यद्यपि पुष्टिमार्ग में कोई भी व्रत निर्जल रह कर नहीं किया जाता अतः वैष्णव हल्का फलाहार महाप्रसाद अवश्य लें. 

अति ऊष्णकाल में मुकुट नहीं धराया जाता अतः इन दिनों में किरीट धराया जा सकता है.
कुछ वैष्णव किरीट और मुकुट को एक ही समझते हैं. किरीट दिखने में मुकुट जैसा ही होता है परन्तु मुकुट एवं किरीट में कुछ अंतर होते हैं.

मुकुट अकार में किरीट की तुलना में बड़ा होता है.

मुकुट अधिक गर्मी एवं अधिक सर्दी के दिनों में नहीं धराया जाता अतः इस कारण देव-प्रबोधिनी से डोलोत्सव तक एवं अक्षय तृतीया से रथयात्रा तक नहीं धराया जाता परन्तु इन दिनों में किरीट धराया जा सकता है.

मुकुट धराया जावे तब वस्त्र में काछनी ही धरायी जाती है परन्तु किरीट के साथ चाकदार, घेरदार वागा, धोती-पटका अथवा पिछोड़ा धराये जा सकते हैं.

मुकुट सदैव मुकुट की टोपी पर धराया जाता है परन्तु किरीट को कुल्हे एवं अन्य श्रीमस्तक के श्रृंगारों के साथ धराया जा सकता है.

ज्येष्ठ और आषाढ़ मास की चारों एकादशियों में श्रीजी को गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में लिचोई (मिश्री के बूरे और पीसी हुई इलायची से सज्जित पतली पूड़ी) अरोगायी जाती है.

श्रीजी को एकादशी फलाहार के रूप में कोई विशेष भोग नहीं लगाया जाता, केवल संध्या आरती में प्रतिदिन अरोगायी जाने वाली खोवा (मिश्री-मावे का चूरा) एवं मलाई (रबड़ी) को मुखिया, भीतरिया आदि भीतर के सेवकों को एकादशी फलाहार के रूप में वितरित किया जाता है.

राजभोग दर्शन – 

कीर्तन – (राग : सारंग)

आज ठाड़े लाल मुकुट धरे l
वदन लसत मकराकृत कुंडल रतिपति मन जु हरे ll 1 ll
अरुन अधर और चिबुक चारु बन्यो दुलरी मोहन माल गरे l
अति सुगंध और चंदन खोर किये पहोंची मोतीन की लरे ll 2 ll
कर मुरली कटि लाल काछनी किंकणी नूपुर शब्द करे l
गुन भरे ‘कृष्णदास’ प्रभु राधा निरख नेन ईत ऊत न टरे ll 3 ll

साज – आज श्रीजी में श्वेत मलमल की पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की गयी है.

वस्त्र – आज श्रीजी को श्वेत रंग की मलमल का पिछोड़ा धराया जाता है. पिछोड़ा रुपहली तुईलैस की किनारी से सुसज्जित होता है परन्तु किनारी बाहर आंशिक ही दृश्य होती है अर्थात भीतर की ओर मोड़ दी जाती है.

श्रृंगार – आज श्रीजी को वनमाला का (चरणारविन्द तक) ऊष्णकालीन हल्का श्रृंगार धराया जाता है. मोती के सर्व आभरण धराये जाते हैं. श्रीमस्तक पर मोती का किरीट एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में मोती के मयूराकृति कुंडल धराये जाते हैं. 
चोटीजी मोती की धरायी जाती है.
श्रीकंठ में कली आदि सभी माला धरायी जाती हैं. तुलसी एवं श्वेत पुष्पों की दो सुन्दर, कलात्मक मालाजी धरायी जाती हैं. श्रीहस्त में तीन कमल की कमलछड़ी, चांदी के वेणुजी एवं दो वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट ऊष्णकाल का व गोटी हकीक की बड़ी आती है.

Tuesday, 23 June 2026

व्रज - ज्येष्ठ शुक्ल दशमी (गंगा दशमी)Thursday, 05 June 2025

व्रज - ज्येष्ठ शुक्ल दशमी (गंगा दशमी)
Thursday, 05 June 2025

आगे आगे भाज्यो जात भागीरथ को रथ, पाछे पाछे आवत रंग भरी गंग । 
झलमलात उज्वल जल ज्योति अब निरखत, मानो सीस भर मोतिन मंग ।।१।।
जहां परे है भूप कबके भस्म रूप ठोर ठोर, 
जाग उठे होत सलिल संग ।
नंददास मानों अग्नि के यंत्र छूटे, ऐसे 
सुर पुर चले धरें दिव्य अंग।।२।।

गंगादशमी, नित्यलीलास्थ गोस्वामी तिलकायत श्री गोविन्दलालजी महाराज का गादी उत्सव

श्रीजी को नियम के केसरी पिछोड़ा व श्रीमस्तक पर केसरी रंग की श्याम झाईं वाली छज्जेदार पाग के ऊपर रुपहली लूम की किलंगी धरायी जाती है.

आज के दिन ही नित्यलीलास्थ गौस्वामी तिलकायत श्री गोविन्दलाल जी महाराज श्री का गादी उत्सव भी है. दो उत्सव होने के कारण आज श्रीजी को गोपीवल्लभ भोग में दो नवीन प्रकार की सामग्रियां अरोगायी जाती हैं.

आज श्रीजी को गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में विशेष रूप से मनोर (इलायची-जलेबी) के लड्डू, केशरयुक्त जलेबी के टूक व दूधघर में सिद्ध की गयी केसर युक्त बासोंदी की हांडी अरोगायी जाती है. 

राजभोग में अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता व सखड़ी में दहीभात, सतुवा, केसरयुक्त पेठा व मीठी सेव अरोगायी जाती है.

राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : सारंग)

जाको वेद रटत ब्रह्मा रटत शम्भु रटत शेष रटत,
नारद शुक व्यास रटत पावत नहीं पाररी l
ध्रुवजन प्रह्लाद रटत कुंती के कुंवर रटत,
द्रुपद सुता रटत नाथ अनाथन प्रति पालरी ll 1 ll
गणिका गज गीध रटत गौतम की नार रटत,
राजन की रमणी रटत सुतन दे दे प्याररी l
‘नंददास’ श्रीगोपाल गिरिवरधर रूपजाल,
यशोदा को कुंवर प्यारी राधा उर हार री ll 2 ll

साज - आज श्रीजी में केसरी रंग की मलमल की, उत्सव के कमल के काम और रुपहली तुईलैस की किनारी से सुशोभित पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को केसरी मलमल का किनारी वाला पिछोड़ा धराया जाता है.

श्रृंगार – आज श्रीजी को छोटा (कमर तक) ऊष्णकालीन हल्का श्रृंगार धराया जाता है. 
उत्सव के हीरा एवं उष्णकाल के मिलमा आभरण धराये जाते हैं. 
श्रीमस्तक पर केसरी मलमल की श्याम झाईं वाली छज्जेदार पाग के ऊपर सिरपैंच, रुपहली लूम की किलंगी एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. 
श्रीकर्ण में एक जोड़ी झुमका वाले कर्णफूल धराये जाते हैं. 
श्रीकंठ में त्रवल की जगह कंठी धरायी जाती हैं.
तुलसी एवं श्वेत पुष्पों की दो सुन्दर कलात्मक मालाजी धरायी जाती हैं एवं इसी प्रकार श्वेत व गुलाबी पुष्पों की दो मालाजी हमेल की भांति धरायी जाती हैं. 
श्रीहस्त में चार कमल की कमलछड़ी, मोती के वेणुजी एवं एक वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट ऊष्णकाल का व गोटी मोती की आती है.

Monday, 22 June 2026

व्रज - विस २०८३ ज्येष्ठ शुक्ल नवमी Tuesday, 23 June 2026

व्रज - विस २०८३ ज्येष्ठ शुक्ल नवमी 
Tuesday, 23 June 2026

गुलाबी मलमल की परधनी एवं श्रीमस्तक पर गोल पाग पर तुर्रा के श्रृंगार 

राजभोग दर्शन – 

कीर्तन – (राग : सारंग)

भलेई मेरे आये हो पिय 
भलेई मेरे आये हो पिय ठीक दुपहरी की बिरियाँ l
शुभदिन शुभ नक्षत्र शुभ महूरत शुभपल छिन शुभ घरियाँ ll 1 ll
भयो है आनंद कंद मिट्यो विरह दुःख द्वंद चंदन घस अंगलेपन और पायन परियां l
'तानसेन' के प्रभु मया कीनी मों पर सुखी वेल करी हरियां ll 2 ll

 साज - श्रीजी में आज गुलाबी मलमल की पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया और चरणचौकी के ऊपर सफेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को गुलाबी रंग की मलमल की गोल छोर वाली रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित परधनी धरायी जाती है.

शृंगार – आज प्रभु को छोटा (कमर तक) ऊष्णकालीन हल्का श्रृंगार धराया जाता है. 
मोती के सर्व आभरण धराये जाते हैं. 
श्रीमस्तक पर गुलाबी रंग की गोल पाग के ऊपर सिरपैंच, तुर्रा एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. 

श्रीकर्ण में मोती के एक जोड़ी कर्णफूल धराये जाते हैं.

श्रीकंठ में मोती का चोलड़ा धराया जाता हैं.
 श्वेत पुष्पों की कलात्मक थागवाली दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं.
श्रीहस्त में तीन कमल की कमलछड़ी, चाँदी के वेणुजी एवं एक वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट ऊष्णकाल का व गोटी छोटी हकीक की आती है.

Sunday, 21 June 2026

व्रज - विस २०८३ ज्येष्ठ शुक्ल अष्टमीMonday, 22 June 2026

व्रज - विस २०८३ ज्येष्ठ शुक्ल अष्टमी
Monday, 22 June 2026

केसरी मलमल का पिछोड़ा एवं श्रीमस्तक पर छज्जेदार पाग पर तुर्रा के श्रृंगार 

ज्येष्ठ मास तपत घाम एसेमें कहां सीधारे श्याम एसी कोन चतुर नार जाको बीरा लीनो हे।।
नेकधों कृपा कीजे हमहूको सुज दीजे जैये फेरि वाके धाम जाको नेह नवीनो हे।।1।।
बाँह पकरि भवन लाई सैया पर दिये बैठाई अरगजा अंग लगाई हियो सीतल कीनो है।।
रसिक प्रीतम कंठ लगाय रसमें रस सो मिलाय अरसपरस केल करत प्रीतम बस कीनो है।।2।।

राजभोग दर्शन – 

कीर्तन – (राग : सारंग)

सखी सुगंध जल घोरके चंदन हरि अंग लगावत l
वदन कमल अलके मधुपनसी टेढ़ी पाग मनभावन ll 1 ll
कोऊ बिंजना कुसुमन के ढोरत कुसुम भूषन ले ले पहेरावत l
मृदुवेली सायंतर क्रीड़त ‘व्रजाधीश’ गुन गावत ll 2 ll

साज - आज श्रीजी में केसरी मलमल की, रुपहली ज़री की किनारी के पतले हांशिया से सुसज्जित पिछवाई धरायी जाती है. 
गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को केसरी मलमल का बिना किनारी का पिछोड़ा धराया जाता है. 

श्रृंगार – आज प्रभु को छोटा (कमर तक) ऊष्णकालीन हल्का श्रृंगार धराया जाता है. मोती के सर्व आभरण धराये जाते हैं. 
श्रीमस्तक पर केसरी रंग की छज्जेदार पाग के ऊपर सिरपैंच,तुर्रा एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. 
श्रीकर्ण में मोती के कर्णफूल धराये जाते हैं. 
श्वेत पुष्पों की सुन्दर थागवाली दो कलात्मक मालाजी धरायी जाती हैं वहीँ दो अन्य मालाजी हमेल की भांति धरायी जाती है. 
श्रीहस्त में तीन कमल की कमलछड़ी, गंगा जमुनी के वेणुजी एवं एक वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट ऊष्णकाल का गोटी हक़ीक की छोटी धरायी जाती है.

Saturday, 20 June 2026

व्रज - विस २०८३ ज्येष्ठ शुक्ल सप्तमी Sunday, 21 June 2026

व्रज - विस २०८३ ज्येष्ठ शुक्ल सप्तमी 
Sunday, 21 June 2026

 चंदनी मलमल के धोती पटका एवं श्रीमस्तक पर ग्वाल फेटा के साज के श्रृंगार 

राजभोग दर्शन – 

कीर्तन – (राग : सारंग)

आज धरी गिरधर पिय धोती
अति झीनी अरगजा भीनी पीतांबर घन दामिनी जोती ll 1 ll
टेढ़ी पाग भृकुटी छबि राजत श्याम अंग अद्भुत छबि छाई l
मुक्तामाल फूली वनराई, 'परमानंद' प्रभु सब सुखदाई ll 2 ll

साज – आज श्रीजी में चंदनी रंग की मलमल की, रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी के हांशिया से सुसज्जित पिछवाई धरायी जाती है. 
गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को चंदनी रंग की मलमल का धोती एवं राजशाही पटका धराया जाता है.

श्रृंगार – आज प्रभु को छोटा (कमर तक) ऊष्णकालीन श्रृंगार धराया जाता है. मोती के आभरण धराये जाते हैं. 
श्रीमस्तक पर श्वेत मलमल फेंटा के ऊपर बीच की चंद्रिका और कतरा धराये हैं. 
श्रीकर्ण में लोलकबिंदी लड़ वाले कर्णफूल धराये जाते हैं. 
पुष्पों की सुन्दर थागवाली दो कलात्मक मालाजी धरायी जाती हैं.
श्रीहस्त में कमलछड़ी, गंगा जमनी वाले वेणुजी एवं वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट ऊष्णकाल व गोटी बाघ बकरी के आते है.

Friday, 19 June 2026

व्रज - विस २०८३ ज्येष्ठ शुक्ल षष्ठी Saturday, 20 June 2026

व्रज - विस २०८३ ज्येष्ठ शुक्ल षष्ठी 
Saturday, 20 June 2026

बादली मलमल का आड़बंद एवं श्रीमस्तक पर छज्जेदार पाग पर तुर्रा के श्रृंगार

राजभोग दर्शन – 

कीर्तन – (राग : सारंग)

पनिया न जैहोरी आली नंदनंदन मेरी मटुकी झटकिके पटकी l
ठीक दुपहरीमें अटकी कुंजनमें कोऊ न जाने मेरे घटकी ll 1 ll
कहारी करो कछु बस नहि मेरो नागर नटसों अटकी l
‘नंददास’ प्रभुकी छबि निरखत सुधि न रही पनघटकी ll 2 ll

साज - आज श्रीनाथजी में बादली मलमल की पिछवाई धरायी जाती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को बादली मलमल का आड़बंद धराया जाता है. 

श्रृंगार – आज प्रभु को छोटा (कमर तक) ऊष्णकालीन श्रृंगार धराया जाता है. मोती के आभरण धराये जाते हैं. 
श्रीमस्तक पर बादली छज्जेदार पाग के ऊपर सिरपैंच, तुर्रा एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. 
श्रीकर्ण में एक जोड़ी कर्णफूल धराये जाते हैं. 
श्वेत पुष्पों की सुन्दर थागवाली दो कलात्मक मालाजी धरायी जाती हैं.
श्रीहस्त में कमलछड़ी, झीने लहरिया के वेणुजी एवं वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट ऊष्णकाल व गोटी हकीक के आते है.

व्रज - ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी Friday, 19 June 2026

व्रज - ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी 
Friday, 19 June 2026

श्रीजी में नियम का नाव का मनोरथ  

बैठै घनस्याम सुंदर खेवत है नाव।
आज सखी मोहन संग , खेलवे को दाव।।१।।
यमुना गम्भीर नीर, अति तरंग लोले। 
गोपिन प्रति कहन लागे, मीठे मृदु बोले।। २।। 
पथिक हम खेवट तुम , लीजिये उतराई। 
बीच धार मांझ रोकी , मिष ही मिष डुलाई ।। ३।। 
डरपत हों स्याम सुंदर, राखिये पद पास।
याहि मिष मिल्यो चाहे, परमानंद दास।।। ४।। 

विशेष – आज नित्यलीलास्थ गौस्वामी तिलकायत श्री गोविन्दलालजी महाराजश्री ने उदयपुर के तत्कालीन महाराणा भूपालसिंहजी व उदयपुर की महारानीजी की विनती पर विक्रम संवत 2005 में ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी को नाव का मनोरथ किया था. 
डोलतिबारी में जल भरकर नाव में प्रभु श्री मदनमोहनजी को विराजित कर सुन्दर मनोरथ हुआ था. तब से यह मनोरथ उनके द्वारा जमा करायी गयी धनराशी के ब्याज से प्रतिवर्ष ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी को होता है.

सेवाक्रम- दिन में दो समय राजभोग एवं संध्या आरती की आरती थाली में की जाती है.

आज श्रीजी को नियम की बिना किनारी की गुलाबी परदनी और श्रीमस्तक पर गोल-चंद्रिका का श्रृंगार धराया जाता है. 

द्वितीय गृह में आज श्री गोविन्दरायजी (द्वितीय) का प्राकट्योत्सव है.
आज प्राचीन परंपरानुसार श्रीजी व श्री नवनीतप्रियाजी को धराये जाने वाले वस्त्र द्वितीय गृह प्रभु श्री विट्ठलनाथजी के घर से सिद्ध होकर पधारते हैं.
श्री नवनीतप्रियाजी के लिए ओढ़नी भी द्वितीय गृह से पधारती है.
वस्त्रों के संग बूंदी के लड्डुओं की छाब भी वहां से आती है.

वर्ष में लगभग 16 बार श्रीजी व श्री नवनीतप्रियाजी के वस्त्र द्वितीय पीठ से पधारते हैं.

आज श्रीजी को नियम की बिना किनारी की गुलाबी परधनी और श्रीमस्तक पर गोल-चंद्रिका का श्रृंगार धराया जाता है. उदयपुर के गणगौर घाट के सुन्दर चित्रांकन की सुन्दर पिछवाई धरायी जाती है.

राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : सारंग)

करत जल केलि पिय प्यारी भुज मेलि l
छुटत फूहारे भारी उज्जवल हो दस बारे अत्तरही सुगंधि रेलि ll 1 ll
निरख व्रजनारी कहा कहौ छबि वारी सखा सहत सहेलि l
राधा-गोविंद जल मध्य क्रीड़त ख्याल वृंदावन सखी सब टहेलि ll 2 ll

साज – आज श्रीजी में उदयपुर के प्रसिद्द गणगौर-घाट, राजमहल, नौका-विहार, घूमर नृत्य करती गोपियों, श्री ठाकुर जी, श्री बलदेव जी एवं श्री नंद-यशोदा जी के सुन्दर चित्रांकन से सुशोभित पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को बिना किनारी की गुलाबी मलमल की परदनी धरायी जाती है. गादी, तकिया और चरणचौकी के ऊपर सफेद बिछावट की जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफेद बिछावट की जाती है.

श्रृंगार – आज प्रभु को छोटा (कमर तक) ऊष्णकालीन हल्का श्रृंगार धराया जाता है. सर्व आभरण हीरा के धराये जाते हैं. 
श्रीमस्तक पर गुलाबी मलमल की गोलपाग के ऊपर सिरपैंच, मोती की घुमावदार चमकनी गोल-चंद्रिका एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. 
श्रीकर्ण में हीरा के कर्णफूल धराये जाते हैं. 
श्रीकंठ में एक हार व पंचलड़ा धराया जाता है. 
हरे एवं कमल के पुष्पों की विविध पुष्पों की थागवाली दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती है वहीँ श्वेत पुष्पों एवं कमल की दो मालाजी हमेल की भांति भी धरायी जाती है. 
श्रीहस्त में तीन कमल की कमलछड़ी, चांदी के वेणुजी एवं एक वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट उष्णकाल का व गोटी हकीक की आती है.

बैठे नाव विहरत पिय प्यारी ।
आवत तहां सुगंध मनहरनी, यमुना जल सुखकारी ll 1 ll
लाल धर्यो अंबर अति झीनो, माथे पाघ धरी मनोहारी l
गल पहुपन के हार मनोहर, प्यारी के तन पहुपन सारी ll 2 ll
सुन्दर श्याम आप ही खेवत, करत बात अपने जियवारी l
‘श्याम-ग्वालिनी’ रीझे परस्पर, अखियन अंखियाँ डारी ll 3 ll

श्रीजी में नियम का नाव का मनोरथ  

राजभोग कुछ जल्दी खोले जाते हैं और राजभोग दर्शन के पश्चात डोलतिबारी के तीनों खण्डों में कमर तक जल भरा जात
जल में विविध प्रकार के इत्र घोले जाते हैं. 
मोगरे, गुलाब, कमल आदि के पुष्प, लकड़ी के खिलौने (मगरमच्छ, कछुए आदि) तैराये जाते हैं. चांदी की थालियों में रुई से बनी बतखें भी तैरायी जाती हैं.

उत्थापन दर्शन नहीं खोले जाते, भोग समय मनोरथ के भाव से विविध सामग्रियां अरोगायीं जाती हैं व सायं लगभग 5 बजे नाव मनोरथ के दर्शन खुलते हैं. 
सुन्दर नौका में विराजित हो श्रीजी के विग्रह स्वरुप श्री मदनमोहनजी वैष्णवों पर आनंद रस की वर्षा करते हैं. नौका सखियों और नाव खेते ग्वालों की मूर्तियों से सुसज्जित होती हैं. लगभग डेढ़ घंटे दर्शन खुले रहते हैं. तदुपरांत श्री ठाकुरजी को भीतर पधराकर नौका को हटाकर शीतल जल छोड़ दिया जाता है जिसमें सभी वैष्णव स्नान और जल में खड़े रह कर श्रीजी के दर्शनों का आनंद लेते हैं.

मनोरथ का कीर्तन – (राग : सारंग)

श्याम जमुना बीच खेवत नाव l
एक सखी आई घरतें कहे मोहुको बेठाव ll 1 ll
बेठों कैसे घाट ओघट है रपट परत है पाय l
हाथ पकर बेठाय आप ढिंग ‘रसिकन’ रच्यो उपाय ll 2 ll

Wednesday, 17 June 2026

व्रज - विस २०८३ ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्थी Thursday, 18 June 2026

व्रज - विस २०८३ ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्थी 
Thursday, 18 June 2026

श्वेत मलमल का पिछोड़ा एवं श्रीमस्तक पर छज्जेदार पाग पर श्वेत मोर चंद्रिका के श्रृंगार 

ऊष्णकाल का तृतीय अभ्यंग

राजभोग दर्शन – 

साज – (राग : सारंग)

आवत ही यमुना भर पानी l
श्याम रूप काहुको ढोटा वाकी चितवन मेरी गैल भुलानी ll 1 ll
मोहन कह्यो तुमको या व्रजमें हमे नहीं पहचानी l
ठगी सी रही चेटकसो लाग्यो तब व्याकुल मुख फूरत न बानी ll 2 ll
जा दिनतें चितये री मो तन तादिनतें हरि हाथ बिकानी l
'नंददास' प्रभु यों मन मिलियो ज्यों सागरमें सरित समानी ll 3 ll

साज - आज श्रीजी में सफ़ेद रंग के मलमल पर कमल के चित्रांकन से सुसज्जित पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को श्वेत रंग की मलमल का पिछोड़ा धराया जाता है.

श्रृंगार – आज श्रीजी को छोटा (कमर तक) ऊष्णकालीन हल्का छेड़ान का श्रृंगार धराया जाता है. 
मोती के सर्व आभरण धराये जाते हैं. 
श्रीमस्तक पर श्वेत छज्जेदार पाग  के ऊपर सिरपैंच, लूम, श्वेत मोर चंद्रिका एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में मोती के कर्णफूल धराये जाते हैं. 
श्वेत पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं एवं इसी प्रकार की एक व एक कमल माला हमेल की भांति धरायी जाती हैं.
श्रीहस्त में तीन कमल की कमलछड़ी, चाँदी के वेणुजी एवं एक वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट ऊष्णकाल का एवं गोटी हक़ीक की आते हैं.

Tuesday, 16 June 2026

व्रज - विस २०८३ ज्येष्ठ शुक्ल तृतियाWednesday, 17 June 2026

व्रज - विस २०८३ ज्येष्ठ शुक्ल तृतिया
Wednesday, 17 June 2026

 शरबती मलमल के धोती पटका एवं श्रीमस्तक पर ग्वाल पगा पर पगा चंद्रिका के श्रृंगार 

राजभोग दर्शन – 

कीर्तन – (राग : सारंग)

आज धरी गिरधर पिय धोती
अति झीनी अरगजा भीनी पीतांबर घन दामिनी जोती ll 1 ll
टेढ़ी पाग भृकुटी छबि राजत श्याम अंग अद्भुत छबि छाई l
मुक्तामाल फूली वनराई, 'परमानंद' प्रभु सब सुखदाई ll 2 ll

साज – आज श्रीजी में शरबती रंग की मलमल की, रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी के हांशिया से सुसज्जित पिछवाई धरायी जाती है. 
गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को शरबती रंग की मलमल पर रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित धोती एवं राजशाही पटका धराया जाता है.

श्रृंगार – आज श्रीजी को छोटा (कमर तक) ऊष्णकालीन हल्का श्रृंगार धराया जाता है. 
मोती के सर्व आभरण धराये जाते हैं. 
श्रीमस्तक पर शरबती रंग के ग्वाल पगा पर मोती की लड़, पगा चंद्रिका (मोरशिखा) क़तरा एवं बायीं ओर शीशफूल धराया जाता है. 
श्रीकर्ण में मोती के लोलकबिंदी धराये जाते हैं.
श्वेत पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं.
श्रीहस्त में कमलछड़ी, झीनें लहरियाँ के वेणुजी एवं वेत्रजी धराये जाते हैं.
 पट ऊष्णकाल का व गोटी बाघ बकरी की आती है.

Monday, 15 June 2026

व्रज - विस २०८३ ज्येष्ठ शुक्ल द्वितीया (प्रतिपदा क्षय)Tuesday, 16 June 2026

व्रज - विस २०८३ ज्येष्ठ शुक्ल द्वितीया (प्रतिपदा क्षय)
Tuesday, 16 June 2026

बादली मलमल का आड़बंद एवं श्रीमस्तक पर गोल लटपटी पाग पर गोल चंद्रिका के श्रृंगार

राजभोग दर्शन – 

कीर्तन – (राग : सारंग)

पनिया न जैहोरी आली नंदनंदन मेरी मटुकी झटकिके पटकी l
ठीक दुपहरीमें अटकी कुंजनमें कोऊ न जाने मेरे घटकी ll 1 ll
कहारी करो कछु बस नहि मेरो नागर नटसों अटकी l
‘नंददास’ प्रभुकी छबि निरखत सुधि न रही पनघटकी ll 2 ll

साज - आज श्रीनाथजी में बादली मलमल की पिछवाई धरायी जाती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को बादली मलमल का आड़बंद धराया जाता है. 

श्रृंगार – आज प्रभु को छोटा (कमर तक) ऊष्णकालीन श्रृंगार धराया जाता है. मोती के आभरण धराये जाते हैं. 
श्रीमस्तक पर बादली गोल लटपटी पाग के ऊपर सिरपैंच, गोल चंद्रिका एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. 
श्रीकर्ण में एक जोड़ी कर्णफूल धराये जाते हैं. 
श्वेत पुष्पों की सुन्दर थागवाली दो कलात्मक मालाजी धरायी जाती हैं.
श्रीहस्त में कमलछड़ी, झीने लहरिया के वेणुजी एवं वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट ऊष्णकाल व गोटी हकीक के आते है.

Sunday, 14 June 2026

व्रज - विस २०८३ ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्याMonday, 15 June 2026

व्रज - विस २०८३ ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या
Monday, 15 June 2026

छप्पनभोग (बड़ा) मनोरथ

अधिक ज्येष्ठ मास के अंतिम दिन आज श्रीनाथजी में किन्हीं वैष्णव द्वारा आयोजित छप्पनभोग का मनोरथ होगा.
नियम (घर) का छप्पनभोग वर्ष में केवल एक बार मार्गशीर्ष शुक्ल पूर्णिमा को ही होता है. इसके अतिरिक्त विभिन्न खाली दिनों में वैष्णवों के अनुरोध पर श्री तिलकायत महाराज की आज्ञानुसार मनोरथी द्वारा छप्पनभोग मनोरथ आयोजित होते हैं.
इस प्रकार के मनोरथ सभी वैष्णव मंदिरों एवं हवेलियों में होते हैं जिन्हें सामान्यतया ‘बड़ा मनोरथ’ कहा जाता है.

बड़ा मनोरथ के भाव से श्रीजी मंदिर के सभी मुख्य द्वारों की देहरी को हल्दी से लीपी जाती हैं एवं आशापाल की वंदनमाल बाँधी जाती हैं.

आज दो (राजभोग व संध्या आरती) समय की आरती थाली की आती हैं.

मणिकोठा, डोल-तिबारी, रतनचौक आदि में छप्पनभोग के भोग साजे जाते हैं अतः श्रीजी में मंगला के पश्चात सीधे राजभोग अथवा छप्पनभोग (भोग सरे पश्चात) के दर्शन ही खुलते हैं.

छप्पन भोग के भाव से श्रीजी को गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में विशेष रूप से दूधघर में सिद्ध की गयी केसर युक्त बासोंदी की हांडी व शाकघर में सिद्ध चार विविध प्रकार के फलों के मीठा अरोगाये जाते हैं.
राजभोग की अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता एवं सखड़ी में मीठी सेव, केसरयुक्त पेठा व पाँच-भात (मेवा-भात, दही-भात, राई-भात, श्रीखंड-भात, वड़ी-भात) अरोगाये जाते हैं.

छप्पनभोग दर्शन में प्रभु सम्मुख 25 बीड़ा सिकोरी (सोने का जालीदार पात्र) में रखे जाते है.

राजभोग दर्शन – 

कीर्तन – (राग : सारंग)

मदन गोपाल गोवर्धन पूजत l
बाजत ताल मृदंग शंखध्वनि मधुर मधुर मुरली कल कूजत ll 1 ll
कुंकुम तिलक लिलाट दिये नव वसन साज आई गोपीजन l
आसपास सुन्दरी कनक तन मध्य गोपाल बने मरकत मन ll 2 ll
आनंद मगन ग्वाल सब डोलत ही ही घुमरि धौरी बुलावत l
राते पीरे बने टिपारे मोहन अपनी धेनु खिलावत ll 3 ll
छिरकत हरद दूध दधि अक्षत देत असीस सकल लागत पग l
‘कुंभनदास’ प्रभु गोवर्धनधर गोकुल करो पिय राज अखिल युग ll 4 ll

साज – श्रीजी में आज छप्पनभोग के भाव की गौमाता वाली, किनारी के हांशिया से सुसज्जित पिछवाई धरायी है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की है.

वस्त्र – आज प्रभु को चंदनी मलमल का छाप वाला पिछोड़ा धराया है.

श्रृंगार – आज श्रीजी को वनमाला का (चरणारविन्द तक) हल्का श्रृंगार धराया है. मोती के सर्व आभरण धराये हैं.
श्रीमस्तक पर मोती के टिपारा के ऊपर घेरा व गौकर्ण धराये हैं. श्रीकर्ण में कुंडल धराये हैं.
पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी हैं.
श्रीहस्त में कमलछड़ी, सूवा के वेणुजी एवं वेत्रजी धराये हैं.
पट लाल व गोटी बाघ बकरी की है.

Saturday, 13 June 2026

व्रज - विस २०८३ अधिक ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशीSunday, 14 June 2026

व्रज - विस २०८३ अधिक ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी
Sunday, 14 June 2026

गुलाबी मलमल का पिछोड़ा एवं श्रीमस्तक पर मोती का किरीट के श्रृंगार 
                  
श्रीजी में
प्रातः - मोती का बंगला का मनोरथ
प्रियाजी में
प्रातः - हटड़ी का मनोरथ

राजभोग दर्शन – 

कीर्तन – (राग : सारंग)

आज ठाड़े लाल मुकुट धरे l
वदन लसत मकराकृत कुंडल रतिपति मन जु हरे ll 1 ll
अरुन अधर और चिबुक चारु बन्यो दुलरी मोहन माल गरे l
अति सुगंध और चंदन खोर किये पहोंची मोतीन की लरे ll 2 ll
कर मुरली कटि लाल काछनी किंकणी नूपुर शब्द करे l
गुन भरे ‘कृष्णदास’ प्रभु राधा निरख नेन ईत ऊत न टरे ll 3 ll

साज - आज श्रीजी में गुलाबी जालीदार पिछवाई धरायी है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफेद बिछावट की है.

वस्त्र – श्रीजी को आज गुलाबी मलमल का पिछोड़ा धराया है.

श्रृंगार – आज प्रभु को वनमाला के (चरणारविन्द तक) ऊष्णकालीन हल्का श्रृंगार धराया है. मोती के सर्व आभरण धराये हैं.
श्रीमस्तक पर मोती का किरीट पान धराया है.
श्रीकर्ण में मोती के कुंडल धराये हैं. कली आदि की माला धराई है. पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी भी धरायी हैं. श्रीहस्त में कमलछड़ी, चांदी के वेणुजी एवं वेत्रजी धराये हैं.
पट गोटी ऊष्णकाल के राग-रंग के हैं.

Friday, 12 June 2026

व्रज - विस २०८३ अधिक ज्येष्ठ कृष्ण त्रयोदशी Saturday, 13 June 2026

व्रज - विस २०८३ अधिक ज्येष्ठ कृष्ण त्रयोदशी 
Saturday, 13 June 2026

मल्लकाछ टिपारा का श्रृंगार

श्रीजी में
प्रातः - जय गोपाल (कुंडवारा) मनोरथ 
प्रियाजी में
प्रातः - फल और फूल का बंगला / सघन कुंज का मनोरथ 

कीर्तन – (राग : सारंग)

गोविंद लाडिलो लडबोरा l
अपने रंग फिरत गोकुलमें श्यामवरण जैसे भोंरा ll 1 ll
किंकणी कणित चारू चल कुंडल तन चंदन की खोरा l
नृत्यत गावत वसन फिरावत हाथ फूलन के झोरा ll 2 ll
माथे कनक वरण को टिपारो ओढ़े पिछोरा l
‘परमानंद’ दास को जीवन संग दिठो नागोरा ll 3 ll 

 साज - आज श्रीजी में भूल-भुलैया के भाव के चित्रांकन की पिछवाई धरायी है.
गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की है.

वस्त्र – श्रीजी को आज बसरा के मोती का मल्लकाछ एवं पटका धराया जाता है.

श्रृंगार – आज प्रभु को श्रीकंठ का शृंगार छेड़ान (हल्का) बाक़ी मध्य का (घुटने तक) ऊष्णक़ालीन श्रृंगार धराया जाता है. मोतियों के सर्व आभरण धराये जाते हैं. श्रीमस्तक पर टिपारा का साज (बसरा के मोती की टिपारा की टोपी के ऊपर मध्य में मोती की मोरशिखा और दोनों ओर दोहरा कतरा) तथा बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में मयुराकृति कुंडल धराये जाते हैं. 
हांस, त्रवल, पायल कड़ा हस्तसाखलाआदि धराये जाते हैं. श्रीकंठ में श्वेत माला धरायी जाती है. श्वेत पुष्पों की विविध पुष्पों की थागवाली दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती है.
 श्रीहस्त में कमल के फूल की छड़ी, सुवा के वेणुजी तथा दो वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट उष्णकाल का व गोटी हक़ीक की आती है. 

Thursday, 11 June 2026

व्रज - विस २०८३ ज्येष्ठ कृष्ण द्वादशीFriday, 12 June 2026

व्रज - विस २०८३ ज्येष्ठ कृष्ण द्वादशी
Friday, 12 June 2026

गुलाबी मलमल का पिछोड़ा एवं श्रीमस्तक पर दुमाला पर सेहरा के श्रृंगार 

आज के मनोरथ 

राजभोग में गंगा जमुना का बंगला 
शाम को सावन भादो का मनोरथ 

दिन दुल्हे तेरे सोहे शीश सुहावनो ।
मणि मोतिन को शेहरो सोहे बसियो मन मेरे ।।१।।
मुख पून्यो को चंद है मुक्ताहल तारे । 
उन के नयन चकोर हैं, ऐ सब देखन हारे ।।२।।
पिय बने प्यारि, अति सुंदर बनि आय । 
परम आगरी रूप नागरी ऐ सब देखन आई ।।३।। 
दुलहनि रेन सुहाग की, दुलह सुंदर वर पायो । 
श्रीनंदलाल को शेहरो, जन परमानंद यश गायो ।।४।।

राजभोग दर्शन – (राग : सारंग)

आज बने गिरिधारी दुल्हे चंदनको तनलेप कीये l
सकल श्रृंगार बने मोतिन के विविध कुसुम की माल हिये ll 1 ll
खासाको कटि बन्यो है पिछोरा मोतिन सहरो सीस धरे l
रातै नैन बंक अनियारे चंचल अंजन मान हरे ll 2 ll
ठाडे कमल फिरावत गावत कुंडल श्रमकन बिंद परे l
‘सूरदास’ प्रभु मदन मोहन मिल राधासों रति केल करे ll 3 ll

साज – आज श्रीजी में सेहरा का श्रृंगार धराये श्री स्वामिनीजी, श्री यमुनाजी एवं मंगलगान करती व्रजगोपियों के सुन्दर चित्रांकन से सुसज्जित पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को गुलाबी मलमल का पिछोड़ा धराया गया है.

श्रृंगार – प्रभु को आज मध्य से दो अंगुल नीचे (घुटने तक) ऊष्णकालीन हल्का श्रृंगार धराया गया है. मोती के के सर्व आभरण धराये जाते हैं.
श्रीमस्तक पर गुलाबी रंग के दुमाला के ऊपर मोती का सेहरा एवं बायीं ओर शीशफूल धराये हैं. दायीं ओर सेहरे की मोती की चोटी धरायी गयी है. श्रीकर्ण में मोती के मयूराकृति कुंडल धराये हैं.
श्रीकंठ में कली आदि सब माला धरायी जाती है. आज हांस-त्रवल नहीं धराये जाते. 
श्वेत पुष्पों की दो सुन्दर कलात्मक मालाजी धरायी जाती हैं.
 श्रीहस्त में दो कमल की कमलछड़ी, जड़ाव मोती के वेणुजी एवं दो वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट ऊष्णकाल का, गोटी राग-रंग की, आरसी श्रृंगार में पीले खंड की व राजभोग में सोने की डांडी की आती है.

Wednesday, 10 June 2026

व्रज -विस २०८३ अधिक ज्येष्ठ कृष्ण एकादशीThursday, 11 June 2026

व्रज -विस २०८३ अधिक ज्येष्ठ कृष्ण एकादशी
Thursday, 11 June 2026

चंदनी मलमल के धोती पटका एवं श्रीमस्तक पर चिनमा पगा पर तुर्रा के श्रृंगार 

श्रीजी में
प्रातः - चाँदी का बंगला 
शाम को - आवत मोहन धेनु लिए 
प्रियाजी में
प्रातः - बिराजत सघन कुंज की ओट 
शाम को - गोरवर्धन ते आई गाय सब 

राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : सारंग)

भलेई मेरे आये हो पिय 
भलेई मेरे आये हो पिय ठीक दुपहरी की बिरियाँ l
शुभदिन शुभ नक्षत्र शुभ महूरत शुभपल छिन शुभ घरियाँ ll 1 ll
भयो है आनंद कंद मिट्यो विरह दुःख द्वंद चंदन घस अंगलेपन और पायन परियां l
'तानसेन' के प्रभु मया कीनी मों पर सुखी वेल करी हरियां ll 2 ll

साज - आज श्रीजी में गौचारण के भाव के चित्रांकन की पिछवाई धरायी है.
गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की है.

वस्त्र – आज प्रभु को चंदनी रंग की मलमल धोती एवं पटका धराया जाता हैं.

श्रृंगार – प्रभु को आज मध्य का (घुटने तक) ऊष्णकालीन हल्का श्रृंगार धराया जाता है. मोती के सर्व आभरण धराये जाते हैं.
 श्रीमस्तक पर चंदनी रंग के चिनमा पगा के ऊपर सिरपैंच, लूम, तुर्रा एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं.
 श्रीकर्ण में एक जोड़ी मोती के कर्णफूल धराये जाते हैं. 
श्वेत पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं एवं हमेल की भांति दो मालाजी धरायी जाती हैं.
 श्रीहस्त में तीन कमल की कमलछड़ी, झीनें लहरियाँ वेणुजी एवं वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट ऊष्णकाल के राग-रंग का एवं गोटी हक़ीक की आती हैं.

Tuesday, 9 June 2026

व्रज -विस २०८३ अधिक ज्येष्ठ कृष्ण दशमी Wednesday, 10 June 2026

व्रज -विस २०८३ अधिक ज्येष्ठ कृष्ण दशमी 
Wednesday, 10 June 2026

गुलाबी मलमल की परधनी एवं श्रीमस्तक पर पाग पर गोल चंद्रिका के श्रृंगार 

श्रीजी में
प्रातः - चंदन पत्ती मंडली का मनोरथ
शाम को - चंदन पहर नाव हरि बैठे 
प्रियाजी में
प्रातः - चंदन पत्ती मंडली का मनोरथ
शाम को - श्याम यमुना बीच खेवत नाव 

राजभोग दर्शन –

बैठै घनस्याम सुंदर खेवत है नाव।
आज सखी मोहन संग , खेलवे को दाव।।१।।
यमुना गम्भीर नीर, अति तरंग लोले। 
गोपिन प्रति कहन लागे, मीठे मृदु बोले।। २।। 
पथिक हम खेवट तुम , लीजिये उतराई। 
बीच धार मांझ रोकी , मिष ही मिष डुलाई ।। ३।। 
डरपत हों स्याम सुंदर, राखिये पद पास।
याहि मिष मिल्यो चाहे, परमानंद दास।।। ४।। 

साज – आज श्रीजी में उदयपुर के प्रसिद्द गणगौर-घाट, राजमहल, नौका-विहार, घूमर नृत्य करती गोपियों, श्री ठाकुर जी, श्री बलदेव जी एवं श्री नंद-यशोदा जी के सुन्दर चित्रांकन से सुशोभित पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को गुलाबी मलमल की परदनी धरायी जाती है.

श्रृंगार – आज प्रभु को छोटा (कमर तक) ऊष्णकालीन हल्का श्रृंगार धराया जाता है. सर्व आभरण हीरा के धराये जाते हैं.
श्रीमस्तक पर गुलाबी मलमल की छोर वाली पाग के ऊपर सिरपैंच, मोती की घुमावदार चमकानी गोल-चंद्रिका एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं.
श्रीकर्ण में एक जोड़ी कर्णफूल धराये जाते हैं.
हरे एवं कमल के पुष्पों की विविध पुष्पों की थागवाली दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती है वहीँ श्वेत पुष्पों एवं कमल की दो मालाजी हमेल की भांति भी धरायी जाती है.
श्रीहस्त में तीन कमल की कमलछड़ी, चांदी के वेणुजी एवं एक वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट उष्णकाल का व गोटी हकीक की आती है.

Sunday, 7 June 2026

व्रज - विस २०८३ ज्येष्ठ कृष्ण अष्टमी Monday, 08 June 2026

व्रज - विस २०८३ ज्येष्ठ कृष्ण अष्टमी 
Monday, 08 June 2026

श्वेत धोती, गाती का पटका एवं श्रीमस्तक पर श्वेत घेरा के श्रृंगार 
           
श्रीजी में
प्रातः - श्वेत कमल मंडली 
शाम - मचक मचक झूले 
प्रियाजी में
प्रातः - कली की मंडली 
शाम - यमुना पुलीन हिंडोलना 

राजभोग दर्शन – 

कीर्तन – (राग : सारंग)

आज ठाड़े लाल मुकुट धरे l
वदन लसत मकराकृत कुंडल रतिपति मन जु हरे ll 1 ll
अरुन अधर और चिबुक चारु बन्यो दुलरी मोहन माल गरे l
अति सुगंध और चंदन खोर किये पहोंची मोतीन की लरे ll 2 ll
कर मुरली कटि लाल काछनी किंकणी नूपुर शब्द करे l
गुन भरे ‘कृष्णदास’ प्रभु राधा निरख नेन ईत ऊत न टरे ll 3 ll

साज – आज श्रीजी में मोर के भाव की श्वेत जाली की कलात्मक पिछवाई धरायी जाती है.

वस्त्र – आज प्रभु को श्वेत मलमल धोती एवं गाती का पटका धराया जाता हैं.

श्रृंगार – आज श्रीजी को मध्य का (घुटने तक) ऊष्णकालीन हल्का श्रृंगार धराया जाता है. मोती के सर्व आभरण धराये जाते हैं. श्रीमस्तक पर कूल्हे पर रूपहरा घेरा एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में मोती के मयूराकृति कुंडल धराये जाते हैं. 
श्रीकंठ में कली आदि सभी माला धरायी जाती हैं. तुलसी एवं श्वेत पुष्पों की दो सुन्दर, कलात्मक मालाजी धरायी जाती हैं. श्रीहस्त में तीन कमल की कमलछड़ी, चांदी के वेणुजी एवं दो वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट ऊष्णकाल का व गोटी हकीक की बड़ी आती है.

Saturday, 6 June 2026

व्रज - विस २०८३ ज्येष्ठ कृष्ण सप्तमी Sunday, 07 June 2026

व्रज - विस २०८३ ज्येष्ठ कृष्ण सप्तमी 
Sunday, 07 June 2026

शरबती मलमल का पिछोड़ा एवं श्रीमस्तक पर ग्वाल पगा पर पगा चंद्रिका (मोरशिखा) के श्रृंगार 

श्रीजी में
प्रातः - चंदन महल बन्यो अति सुंदर 
शाम - छूटत फुवारे आगे निके 
प्रियाजी में
प्रातः - बगीचे में पलना 
शाम - रंग महल में बैठे पिय प्यारी 

राजभोग दर्शन – 

साज – (राग : रामकली)

मोहन देहो बसन हमारे ।
जाय कहों ब्रज्पतिजू के आगे,
करत अनीत ललारे ॥ १ ॥
तुम ब्रजराज कुमार लाडिले,
और सबहिन के प्राण पियारे ।
गोविन्द प्रभु पिया दासी तिहारी,
सुंदर वर सुकुमारे ॥ २ ॥

साज – आज श्रीजी में चीरहरण के भाव की चित्रांकन की पिछवाई धरायी जाती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को शरबती मलमल का पिछोड़ा धराया जाता है.

श्रृंगार – आज श्रीजी को छोटा (कमर तक) ऊष्णकालीन हल्का छेड़ान का श्रृंगार धराया जाता है. 
मोती के सर्व आभरण धराये जाते हैं. 

श्रीमस्तक पर शरबती रंग के ग्वाल पगा पर मोती की लड़, पगा चंद्रिका (मोरशिखा) एवं बायीं ओर शीशफूल धराया जाता है. 
श्वेत पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं एवं इसी प्रकार की एक कमल माला हमेल की भांति धरायी जाती हैं.
श्रीहस्त में तीन कमल की कमलछड़ी, सुवा के वेणुजी एवं वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट ऊष्णकाल का एवं गोटी बाघ बकरीं की आते हैं.

Friday, 5 June 2026

व्रज - विस २०८३ ज्येष्ठ कृष्ण षष्ठीSaturday, 06 June 2026

व्रज - विस २०८३ ज्येष्ठ कृष्ण षष्ठी
Saturday, 06 June 2026

चंदनी मलमल का आड़बंद एवं श्रीमस्तक पर गोल पाग पर तुर्रा के श्रृंगार
           
श्रीजी में
प्रातः - छाक लिए श्याम बुलावत, चंदन की गोली 
शाम - बृज ही में करत विहार , कली के श्रृंगार 
प्रियाजी में
प्रातः - लीजे लालन अपनी छाक 
शाम - फल की हटड़ी 

आज प्रभु के श्रीअंगों (वक्षस्थल, दोनों श्रीहस्त और दोनों चरणकमल) में कुल पांच केशर बरास मिश्रित चंदन की गोलियां धरायी जाती है.

राजभोग दर्शन –

साज – (राग : सारंग)

चंदन को वागो पहिरे चंदन की खोर कीये, चंदन के रुखतरे ठाड़े पिय प्यारी l
चंदन की पाग शिर चंदन को फेंटा, बन्यो चंदन की चोली तन चंदन की सारी ll 1 ll
चंदन की आरसी ले निरखत दोऊ जन हंस हंस गिर जात भरत अंकवारी l
‘सूरदास’ मदन मोहन चंदभवनमें बैठे, गावत सारंग राग रंग रह्यो भारी ll 2 ll

साज – आज श्रीजी में छाक लीला के भाव की पिछवाई धरायी जाती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को चंदनी मलमल का आड़बंद धराया जाता है.

श्रृंगार – आज प्रभु को छोटा (कमर तक) ऊष्णकालीन हल्का श्रृंगार धराया जाता है. मोती के सर्व आभरण धराये जाते हैं.
श्रीमस्तक पर गोल पाग के ऊपर सिरपैंच, तुर्रा एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. 
श्रीकर्ण में एक जोड़ी कर्णफूल धराये जाते हैं. 
गुलाबी एवं श्वेत पुष्पों की कलात्मक थागवाली दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं.

श्रीहस्त में चार कमल की कमलछड़ी, झीने लहरियाँ के वेणुजी एवं एक वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट ऊष्णकाल का व गोटी छोटी हकीक की आती है.

Thursday, 4 June 2026

व्रज - विस २०८३ ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्दशी Friday, 05 June 2026

व्रज - विस २०८३ ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्दशी 
Friday, 05 June 2026

गुलाबी मलमल के धोती पटका एवं श्रीमस्तक पर छज्जेदार पाग पर मोर चंद्रिका के श्रृंगार 

श्रीजी में
प्रातः - अद्भुत डोल बनी 
शाम - फाग सवारी का मनोरथ, कली के श्रृंगार 
प्रियाजी में
प्रातः - अद्भुत डोल बनी का मनोरथ 
शाम - मोर कुटीर का मनोरथ 

राजभोग दर्शन – 

कीर्तन – (राग : सारंग/बिलावल)

कमलमुख देखत कौन अघाय l
सुनरी सखी लोचन अलि मेरे मुदित रहे अरुझाय ll 1 ll
मुक्तामाल लाल ऊर ऊपर मानों फूली वनराय l
गोवर्धनधरके अंग अंग पर ‘कृष्णदास’ बलजाय ll 2 ll

साज - आज श्रीजी में हाथी के ऊपर सवारी, पृष्ठभूमि में महल, व्रजभक्तों के साथ होली खेल आदि के चित्रांकन वाली सुन्दर पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज प्रभु को गुलाबी रंग की मलमल धोती एवं राजशाही पटका धराया जाता हैं. दोनों वस्त्र रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित होते हैं.

श्रृंगार – प्रभु को आज मध्य का (घुटने तक) ऊष्णकालीन हल्का श्रृंगार धराया जाता है. मोती के सर्व आभरण धराये जाते हैं.
 श्रीमस्तक पर गुलाबी रंग की छज्जेदार पाग के ऊपर सिरपैंच, लूम, मोर चंद्रिका एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं.
 श्रीकर्ण में मोती के कर्णफूल धराये जाते हैं. 
श्वेत पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं एवं हमेल की भांति दो मालाजी धरायी जाती हैं.
 श्रीहस्त में तीन कमल की कमलछड़ी, चांदी के वेणुजी एवं एक वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट गोटी ऊष्णकाल के राग-रंग के आते हैं.

Wednesday, 3 June 2026

व्रज - विस २०८३ अधिक ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्थी Thursday, 04 June 2026

व्रज - विस २०८३ अधिक ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्थी 
Thursday, 04 June 2026

चंदन की चोली एवं कली के आभरन
का मनोरथ

श्रीजी में
प्रातः - आम की मंडली का मनोरथ, चंदन की चोली का मनोरथ 
शाम - मोर कुटीर का मनोरथ 
प्रियाजी में
प्रातः - आम की मंडली का मनोरथ 
शाम - फाग की सवारी का मनोरथ 

राजभोग दर्शन – 

कीर्तन – (राग : सारंग)

चंदन को वागो पहिरे चंदन की खोर कीये, चंदन के रुखतरे ठाड़े पिय प्यारी l
चंदन की पाग शिर चंदन को फेंटा, बन्यो चंदन की चोली तन चंदन की सारी ll 1 ll
चंदन की आरसी ले निरखत दोऊ जन हंस हंस गिर जात भरत अंकवारी l
‘सूरदास’ मदन मोहन चंदभवनमें बैठे, गावत सारंग राग रंग रह्यो भारी ll 2 ll

साज – आज श्रीजी में केसर एवं चंदन मिश्रित चंदनी रंग की मलमल की रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को केसर मिश्रित चंदनिया रंग की मलमल की चोली एवं पिछोड़ा धराये जाते हैं.

श्रृंगार – आज प्रभु को छोटा (कमर तक) ऊष्णकालीन हल्का श्रृंगार धराया जाता है. मोती के सर्व आभरण धराये जाते हैं. श्रीमस्तक पर चंदनिया रंग की गोल पाग के ऊपर सिरपैंच, तुर्रा एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं.
 श्रीकर्ण में मोती के कर्णफूल की एक जोड़ी धराये जाते हैं. श्वेत पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं.
श्रीहस्त में तीन कमल की कमलछड़ी, झीने लहरियाँ के वेणुजी एवं एक वेत्रजी धराये जाते हैं. 
पट एवं गोटी ऊष्णकाल के आते है.

राजभोग में आभरन बड़े करके चंदन की चोली धरायी जाती हैं.

Tuesday, 2 June 2026

व्रज - विस २०८३ अधिक ज्येष्ठ कृष्ण तृतीयाWednesday, 03 June 2026

व्रज - विस २०८३ अधिक ज्येष्ठ कृष्ण तृतीया
Wednesday, 03 June 2026

बसरा के मोतियों से सिद्ध परधनी एवं श्रीमस्तक पर मोती की गोल पाग पर मोती के दोहरा क़तरा का श्रृंगार 

श्रीजी में
प्रातः फूल महल बैठे नंद नंदन 
शाम को माई फूल को हिंदोरों बन्यो 
प्रियाजी में
प्रातः चितराम का बंगला 
शाम को फुल हिंडोरा माई झूले 

श्रृंगार दर्शन – 

कीर्तन – (राग : बिलावल)

देखे री हरि नंगमनंगा l
जलसुत भूषन अंग विराजत बसन हीन छबि उठि तरंगा ll 1 ll
अंग अंग प्रति अमित माधुरी निरखि लज्जित रति कोटि अनंगा l
किलकत दधिसुत मुख लेपन करि ‘सूर’ हसत ब्रज युवतिन संगा ll 2 ll

राजभोग दर्शन

कीर्तन – (राग : सारंग)

शीतल उसीर गृह छिरक्यों गुलाबनीर
परिमल पाटीर घनसार बरसत हैं ।
सेज सजी पत्रणकी अतरसो तर कीनी
अगरजा अनूप अंग मोद दरसत हैं ॥१॥
बीजना बियाँर सीरी छूटत फुहारें नीके 
मानो घन नहैनि नहैनि फ़ूही बरसत हैं ।
चतुर बिहारी प्यारी रस सों विलास करे 
जेठमास हेमंत ऋतु सरस दरसत हैं ॥२॥

 साज – आज श्रीजी में श्वेत जाली की कलात्मक पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है. 

वस्त्र – आज श्रीजी को बसरा के मोतियों से सिद्ध परधनी धरायी जाती है.

शृंगार – आज प्रभु को छोटा (कमर तक) ऊष्णकालीन हल्का श्रृंगार धराया जाता है. 
मोती के सर्व आभरण धराये जाते हैं. 
श्रीमस्तक पर मोती की गोल पाग के ऊपर सिरपैंच, मोती का दोहरा क़तरा एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. 

श्रीकर्ण में मोती के एक जोड़ी कर्णफूल धराये जाते हैं.

 श्वेत पुष्पों की कलात्मक थागवाली एक सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं.
श्रीहस्त में चार कमल की कमलछड़ी, मोती के वेणुजी एवं एक वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट ऊष्णकाल का व गोटी छोटी हकीक की आती है.

Monday, 1 June 2026

व्रज - विस २०८३ अधिक ज्येष्ठ कृष्ण द्वितीया Tuesday, 02 June 2026

व्रज - विस २०८३ अधिक ज्येष्ठ कृष्ण द्वितीया 
Tuesday, 02 June 2026

गुलाबी मलमल का आड़बंद एवं श्रीमस्तक पर गोल पाग पर गोल चंद्रिका के श्रृंगार 

श्रीजी में
प्रातः कुसुम गुलाब महल में बैठे
शाम को गुलाबी गणगौर का मनोरथ
प्रियाजी में
प्रातः केसरी बंगला/केसरी घटा का मनोरथ
शाम को केसरी गणगौर का मनोरथ
संध्या आरती दर्शन के बाद शीतल जल से स्नान 

राजभोग दर्शन

कीर्तन – (राग : सारंग)

तनक प्याय दे पानी याहि मिस गए वाके घर l
समझ बूझ के जल भर लाई पीवन लागे ओक ढीली करि
तब ग्वालिन मंद मंद मुसिकानी ll 1 ll
वेही जल वैसे ही गयो ओर जल भर लाई
तब ग्वालिन बोली मधुर सी बानी l
‘चतुरबिहारी’ प्यारे प्यासे हो तो पीजिये
नातर सिधारो रावरे जु प्यास मैं जानी ll 2 ll

साज – आज श्रीजी में गणगौर के भाव के चित्रांकन की पिछवाई धरायी है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर श्वेत बिछावट की है.

वस्त्र – आज श्रीजी को गुलाबी मलमल का आड़बंद धराया जाता है.

श्रृंगार – आज प्रभु को छोटा (कमर तक) ऊष्णकालीन हल्का श्रृंगार धराया जाता है. 
मोती के सर्व आभरण धराये जाते हैं. 
श्रीमस्तक पर गुलाबी रंग की गोल पाग के  ऊपर सिरपैंच, गोल चंद्रिका एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. 
श्रीकर्ण में एक जोड़ी मोती के कर्णफूल धराये जाते हैं. 
श्वेत पुष्पों एवं तुलसी की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं वहीँ दो मालाजी हमेल की भांति भी धरायी जाती है. 
श्रीहस्त में तीन कमल की कमलछड़ी, गुलाबी मीना के वेणुजी एवं एक वेत्रजी धराये जाते हैं. पट ऊष्णकाल का गोटी हक़ीक की छोटी आती है.

संध्या आरती दर्शन के बाद प्रभु को बरास वाले शीतल जल से स्नान कराया जाता है.
शयन की सखड़ी में शीतल सामग्रियां आरोगायी जाएगी.

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