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Sunday, 14 June 2026

व्रज - विस २०८३ ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्याMonday, 15 June 2026

व्रज - विस २०८३ ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या
Monday, 15 June 2026

छप्पनभोग (बड़ा) मनोरथ

अधिक ज्येष्ठ मास के अंतिम दिन आज श्रीनाथजी में किन्हीं वैष्णव द्वारा आयोजित छप्पनभोग का मनोरथ होगा.
नियम (घर) का छप्पनभोग वर्ष में केवल एक बार मार्गशीर्ष शुक्ल पूर्णिमा को ही होता है. इसके अतिरिक्त विभिन्न खाली दिनों में वैष्णवों के अनुरोध पर श्री तिलकायत महाराज की आज्ञानुसार मनोरथी द्वारा छप्पनभोग मनोरथ आयोजित होते हैं.
इस प्रकार के मनोरथ सभी वैष्णव मंदिरों एवं हवेलियों में होते हैं जिन्हें सामान्यतया ‘बड़ा मनोरथ’ कहा जाता है.

बड़ा मनोरथ के भाव से श्रीजी मंदिर के सभी मुख्य द्वारों की देहरी को हल्दी से लीपी जाती हैं एवं आशापाल की वंदनमाल बाँधी जाती हैं.

आज दो (राजभोग व संध्या आरती) समय की आरती थाली की आती हैं.

मणिकोठा, डोल-तिबारी, रतनचौक आदि में छप्पनभोग के भोग साजे जाते हैं अतः श्रीजी में मंगला के पश्चात सीधे राजभोग अथवा छप्पनभोग (भोग सरे पश्चात) के दर्शन ही खुलते हैं.

छप्पन भोग के भाव से श्रीजी को गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में विशेष रूप से दूधघर में सिद्ध की गयी केसर युक्त बासोंदी की हांडी व शाकघर में सिद्ध चार विविध प्रकार के फलों के मीठा अरोगाये जाते हैं.
राजभोग की अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता एवं सखड़ी में मीठी सेव, केसरयुक्त पेठा व पाँच-भात (मेवा-भात, दही-भात, राई-भात, श्रीखंड-भात, वड़ी-भात) अरोगाये जाते हैं.

छप्पनभोग दर्शन में प्रभु सम्मुख 25 बीड़ा सिकोरी (सोने का जालीदार पात्र) में रखे जाते है.

राजभोग दर्शन – 

कीर्तन – (राग : सारंग)

मदन गोपाल गोवर्धन पूजत l
बाजत ताल मृदंग शंखध्वनि मधुर मधुर मुरली कल कूजत ll 1 ll
कुंकुम तिलक लिलाट दिये नव वसन साज आई गोपीजन l
आसपास सुन्दरी कनक तन मध्य गोपाल बने मरकत मन ll 2 ll
आनंद मगन ग्वाल सब डोलत ही ही घुमरि धौरी बुलावत l
राते पीरे बने टिपारे मोहन अपनी धेनु खिलावत ll 3 ll
छिरकत हरद दूध दधि अक्षत देत असीस सकल लागत पग l
‘कुंभनदास’ प्रभु गोवर्धनधर गोकुल करो पिय राज अखिल युग ll 4 ll

साज – श्रीजी में आज छप्पनभोग के भाव की गौमाता वाली, किनारी के हांशिया से सुसज्जित पिछवाई धरायी है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की है.

वस्त्र – आज प्रभु को चंदनी मलमल का छाप वाला पिछोड़ा धराया है.

श्रृंगार – आज श्रीजी को वनमाला का (चरणारविन्द तक) हल्का श्रृंगार धराया है. मोती के सर्व आभरण धराये हैं.
श्रीमस्तक पर मोती के टिपारा के ऊपर घेरा व गौकर्ण धराये हैं. श्रीकर्ण में कुंडल धराये हैं.
पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी हैं.
श्रीहस्त में कमलछड़ी, सूवा के वेणुजी एवं वेत्रजी धराये हैं.
पट लाल व गोटी बाघ बकरी की है.

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