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Wednesday, 22 May 2024

व्रज - वैशाख शुक्ल पूर्णिमा

व्रज - वैशाख शुक्ल पूर्णिमा
Thursday, 23 May 2024

ऋतु का पहला परधनी का श्रृंगार

विशेष – आज से प्रभु को वस्त्र में परधनी धरायी जानी प्रारंभ हो जाती है और आज ऊष्णकाल का सबसे छोटा (हल्का) श्रृंगार धराया जाता है.
आज प्रथम दिन और परधनी धरने के अंतिम दिन अर्थात आषाढ़ शुक्ल चतुर्दशी को यही वस्त्र श्रृंगार धराये जाते हैं.

आज और उस दिन अंतर केवल यही होगा कि अतिरिक्त में उस दिन प्रभु को तत्कालीन नवीन (वर्षा) ऋतु के आगमन पर व्रज के सभी द्वादश (बारह) वनों एवं चौबीस उपवनों में नवपल्लवित विभिन्न पुष्पों, पत्रों और वनौषधियों से निर्मित वनमाला अपने श्री अंग पर एवं इन्हीं पुष्पों-वनौषधियों से निर्मित गोवर्धन माला पीठिका के ऊपर धारण करते हैं.

श्रीजी को ज्येष्ठ कृष्ण तृतीया से कली के श्रृंगार धराये जाने प्रारंभ हो जायेंगे जो कि आगामी आषाढ़ शुक्ल एकादशी तक धराये जाते हैं. इसमें सामान्यतया प्रातः जैसे वस्त्र आभरण धराये जावें, संध्या-आरती में उसी प्रकार के मोगरे की कली से निर्मित अद्भुत वस्त्र और आभरण धराये जाते हैं. इनमें कुछ श्रृंगार नियत (Fixed) हैं यद्यपि कुछ मनोरथी के द्वारा आयोजित होते हैं.

इसके अतिरिक्त इसी दिन से खस के बंगला और मोगरे की कली और पुष्पों के बंगला के मनोरथ भी प्रारंभ हो जाते हैं.

द्वितीया क्षय से कल नित्यलीलास्थ गौस्वामी तिलकायत श्री दाऊजी महाराज कृत चार स्वरुप के उत्सव का दिवस है और आज राजभोग दर्शन उपरांत कल के उत्सव के प्रभु के वस्त्र रंगे जायेंगे और वस्त्र रंगे जाने के पश्चात उन गिले वस्त्रों से प्रभु के झड़प (गिले वस्त्रों से प्रभु के सम्मुख पंखा करना) होता हैं.

राजभोग दर्शन –

सोहत लाल परधनी अति झीनी l
तापर एक अधिक छबि उपजत ll 1 ll
जलसुत पांति बनी कटि छीनी l
उज्जवल पाग श्याम शिर शोभित अलकावली मधुप मधुपीनी l
‘चतुर्भुजदास’ गिरिधर पिय चपल नयन युवती बसकीनी ll 2 ll

साज – आज श्रीजी में श्वेत रंग की मलमल की बिना किनारी की पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को श्वेत रंग की मलमल गोल छोर वाली बिना किनारी की परधनी धरायी जाती है.

श्रृंगार – आज प्रभु को छोटा (कमर तक) ऊष्णकालीन हल्का श्रृंगार धराया जाता है. 
मोती के आभरण धराये जाते हैं. 
श्रीमस्तक पर श्वेत रंग की छोर वाली पाग के ऊपर सिरपैंच, श्वेत खंडेला (श्वेत मोरपंख के दोहरे कतरा) एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. 
श्रीकर्ण में कर्णफूल धराये जाते हैं.
 श्वेत पुष्पों की कलात्मक थागवाली दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं वहीँ एक श्वेत एवं एक कमल के पुष्पों की माला हमेल की भांति धरायी जाती हैं.
श्रीहस्त में तीन कमल की कमलछड़ी, चांदी के वेणुजी एवं एक वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट ऊष्णकाल का व गोटी छोटी हकीक की आती है.

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