By Vaishnav, For Vaishnav

Saturday, 12 December 2020

व्रज – मार्गशीर्ष कृष्ण चतुर्दशी

व्रज – मार्गशीर्ष कृष्ण चतुर्दशी
Sunday, 13 December 2020

श्री गुसांईजी के सप्तम लालजी श्री घनश्यामजी का प्राकट्योत्सव

विशेष – आज श्री गुसांईजी के सप्तम लालजी श्री घनश्यामजी का प्राकट्योत्सव है. श्री गुसांईजी ने आपको श्री मदनमोहनजी का स्वरुप सेवा हेतु प्रदान किया था. 

एक बार ग्रीष्मकाल में छत पर आप प्रभु को पोढ़ाकर नैत्र बंदकर पंखा झल रहे थे, तभी कोई प्रभु व स्वामिनीजी के स्वरुप चुराकर ले गया. प्रभु के वियोगमें श्री घनश्यामजीने वियोग का अनुभव किया और विरह पदो का गान करके समय व्यतीत करके लीलामे प्रवेश किया.यह विरह पद 'घनश्याम' छाप से प्रसिद्द है।
आपश्री द्वारा वल्लभाचार्यजी कृत 'मधुराष्टकम्' एवं श्री प्रभुचरण कृत 'गुप्तरस' ग्रंथ पर संस्कृत टीका लिखी गई हैं.
     
आपके यहाँ विराजित यह स्वरुप श्री यज्ञनारायण भट्टजी को यज्ञवेदी में प्राप्त हुआ था.
श्री हरिरायजी के वर्णन के अनुसार प्रभु श्री मदनमोहनजी एवं दोनों स्वामिनीजी के स्वरुप कुछ समय पश्चात नाथद्वारा में शाकघर में सेवक एक बाई के पास से पुनः प्राप्त हुए. 
इस कारण से आज श्री घनश्यामजी की ओर से श्रीजी को कुल्हे जोड़ का श्रृंगार धराया जाता है. 
श्री घनश्यामजी षडऐश्वर्य में वैराग्य के स्वरुप थे अतः प्रभु को मयूरपंख की जोड़, प्रभु में आपका अनुराग था अतः अनुराग के भाव के लाल वस्त्र एवं उभय स्वामिनी जी के भाव से पीले ठाड़े वस्त्र धराये जाते हैं. 

आज गोपमास के भाव से श्री नवनीतप्रियाजी और कई अन्य कई पुष्टिमार्गीय वैष्णव मंदिरों में विशेष रूप से उड़द दाल की कचौरी अरोगायी जाती है.

सेवाक्रम - उत्सव होने के कारण श्रीजी मंदिर के सभी मुख्य द्वारों की देहरी (देहलीज) को हल्दी से लीपी जाती हैं एवं आशापाल की सूत की डोरी की वंदनमाल बाँधी जाती हैं.

आज श्रीजी को नियम के लाल साटन के चाकदार वागा धराये जाते हैं. श्रीमस्तक पर पन्ना की जडाऊ कुल्हे के ऊपर पांच मोरपंख की चन्द्रिका धरायी जाती है.

गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में श्रीजी को दूधघर में सिद्ध की गयी केसर युक्त बासोंदी की हांडी अरोगायी जाती है. 
इसके अतिरिक्त आज गोपीवल्लभ भोग में ही श्री नवनीतप्रियाजी में से उड़द दाल की कचौरी व छुकमां दही श्रीजी के भोग हेतु आते हैं.

राजभोग में अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता अरोगाया जाता है.

श्री गुसांईजी के सभी पुत्रों के उत्सव सातों गृहों में मनाये जाते हैं अतः आज द्वितीय पीठाधीश्वर प्रभु श्री विट्ठलनाथजी एवं तृतीय गृहाधीश्वर प्रभु श्री द्वारिकाधीशजी (कांकरोली) के घर से भी श्रीजी के भोग हेतु सामग्री आती है. 

राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : सारंग)

जयति रुक्मणी नाथ पद्मावती प्राणपति व्रिप्रकुल छत्र आनंदकारी l
दीप वल्लभ वंश जगत निस्तम करन, कोटि ऊडुराज सम तापहारी ll 1 ll
जयति भक्तजन पति पतित पावन करन कामीजन कामना पूरनचारी l
मुक्तिकांक्षीय जन भक्तिदायक प्रभु सकल सामर्थ्य गुन गनन भारी ll 2 ll
जयति सकल तीरथ फलित नाम स्मरण मात्र वास व्रज नित्य गोकुल बिहारी l
‘नंददास’नी नाथ पिता गिरिधर आदि प्रकट अवतार गिरिराजधारी ll 3 ll

साज – आज श्रीजी में लाल साटन की सुनहरी ज़री की किनारी के हांशिया वाली पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – श्रीजी को आज लाल साटन के सुनहरी ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित सूथन, चोली, चाकदार वागा एवं इसी प्रकार के टंकमां हीरा के काम वाले मोजाजी धराये जाते हैं. ठाड़े वस्त्र पीले रंग के धराये जाते हैं.

श्रृंगार – श्रीजी को वनमाला का (चरणारविन्द तक) भारी श्रृंगार धराया जाता है. पन्ना के सर्व आभरण धराये जाते हैं.
 श्रीमस्तक पर पन्ना की जड़ाऊ कुल्हे के ऊपर सिरपैंच, पांच मोरपंख की चन्द्रिका की जोड़ एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में मकराकृति कुंडल धराये जाते हैं. 
बायीं ओर मीना की चोटी धरायी जाती है. 
कली, कस्तूरी आदि सभी माला धरायी जाती है.
 श्वेत एवं पीले पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती है. श्रीहस्त में पन्ना के वेणुजी एवं दो वेत्रजी (सोने व पन्ना के) धराये जाते हैं. 
पट लाल एवं गोटी स्याम मीना की आती हैं.
आरसी शृंगार में पिले खंड की एवं राजभोग में सोना की डांडी की आती हैं.

संध्या-आरती दर्शन के उपरांत श्रीकंठ व श्रीमस्तक के श्रृंगार बड़े कर छेड़ान के (छोटे) श्रृंगार धराये जाते हैं. श्रीमस्तक पर लाल कुल्हे धरायी जाती है परन्तु लूम तुर्रा नहीं धराये जाते हैं.

Friday, 11 December 2020

व्रज – मार्गशीर्ष कृष्ण त्रयोदशी

व्रज – मार्गशीर्ष कृष्ण त्रयोदशी(द्वादशी क्षय)
Saturday, 12 December 2020

शीतकाल की प्रथम चौकी

कल की पोस्ट मेंये बताना रह गया था कल के दिन विक्रमाब्द 2063 में श्री नवनीतप्रियाजी व्रज-विहार पूर्ण कर सकुशल नाथद्वारा पधारे व निज मंदिर में विराजे थे. 
इस भाव का उत्सव कल मनाया जाता है. प्रभु को मनोरथ के रूप में अधिक सामग्रियां अरोगायी जाती है.

मार्गशीर्ष एवं पौष मास में जिस प्रकार सखड़ी के चार मंगलभोग होते हैं उसी प्रकार पांच द्वादशियों को पांच चौकी (दो द्वादशी मार्गशीर्ष की, दो द्वादशी पौष की एवं माघ शुक्ल चतुर्थी की) श्रीजी को अरोगायी जाती है. 

इन पाँचों चौकी में श्रीजी को प्रत्येक द्वादशी के दिन मंगला समय क्रमशः तवापूड़ी, खीरवड़ा, खरमंडा, मांडा एवं गुड़कल अरोगायी जाती है.
 
यह सामग्री प्रभु श्रीकृष्ण के ननिहाल से अर्थात यशोदाजी के पीहर से आती है. श्रीजी में इस भाव से चौकी की सामग्री श्री नवनीतप्रियाजी के घर से सिद्ध हो कर आती है, अनसखड़ी में अरोगायी जाती है परन्तु सखड़ी में वितरित की जाती है. 
इन सामग्रियों को चौकी की सामग्री इसलिए कहा जाता है क्योंकि श्री ठाकुरजी को यह सामग्री एक विशिष्ट लकड़ी की चौकी पर रख कर अरोगायी जाती है. 
उस चौकी का उपयोग श्रीजी में वर्ष में उन किया जाता है जब-जब श्री ठाकुरजी के ननिहाल के सदस्य आमंत्रित किये जायें. 
इन चौकी के अलावा यह चौकी श्री ठाकुरजी के मुंडन के दिवस अर्थात अक्षय-तृतीया को भी धरी जाती है.

देश के बड़े शहर प्राचीन परम्पराओं से दूर हो चले हैं पर आज भी हमारे देश के छोटे कस्बों और ग्रामीण इलाकों में ऐसी मान्यता है कि अगर बालक को पहले ऊपर के दांत आये तो उसके मामा पर भार होता है. 
इस हेतु बालक के ननिहाल से काले (श्याम) वस्त्र एवं खाद्य सामग्री बालक के लिए आती है. 

यहाँ चौकी की सामग्रियों का एक यह भाव भी है. बालक श्रीकृष्ण को भी पहले ऊपर के दांत आये थे. अतः यशोदाजी के पीहर से श्री ठाकुरजी के लिए विशिष्ट सामग्रियां विभिन्न दिवसों पर आयी थी. 

खैर....यह तो हुई भावना की बात....बालक श्रीकृष्ण तो पृथ्वी से अपने मामा कंस के अत्याचारों का भार कम करने को ही अवतरित हुए थे जो कि उन्होंने किया भी. ऊपर के दांत आना तो एक लौकिक संकेत था कि प्रभु पृथ्वी को अत्याचारियों से मुक्ति दिलाने आ चुके हैं.

आज की चौकी में श्रीजी को मंगलभोग में तवापूड़ी अरोगायी जाती है. चौकी के भोग धरने और सराने में लगने वाले समय के कारण पंद्रह मिनिट का अतिरिक्त समय लिया जाता है. 
श्रृंगार से राजभोग तक का सेवाक्रम अन्य दिनों की तुलना में कुछ जल्दी होता है.

आज के वस्त्र श्रृंगार निश्चित हैं. 
आज प्रभु को बैंगनी घेरदार वस्त्र पर सुनहरी ज़री की फतवी (आधुनिक जैकेट जैसी पौशाक) धरायी जाती है. प्रभु की कटि (कमर) पर एक विशेष हीरे का चपड़ास (गुंडी-नाका) श्रीमस्तक पर बैंगनी चीरा (ज़री की पाग) के ऊपर लूम की सुनहरी किलंगी धरायी जाती है.

राजभोग दर्शन – 

कीर्तन – (राग : आशावरी)

व्रज के खरिक वन आछे बड्डे बगर l
नवतरुनि नवरुलित मंडित अगनित सुरभी हूँक डगर ll 1 ll
जहा तहां दधिमंथन घरमके प्रमुदित माखनचोर लंगर l
मागधसुत वदत बंदीजन जस राजत सुरपुर नगरी नगर ll 2 ll
दिन मंगल दीनि बंदनमाला भवन सुवासित धूप अगर l
कौन गिने ‘हरिदास’ कुंवर गुन मसि सागर अरु अवनी कगर ll 3 ll

साज – आज श्रीजी में बेंगनी रंग की सुनहरी ज़री की किनारी के हांशिया से सुसज्जित पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को बैंगनी रंग का बिना  किनारी का सुसज्जित सूथन, घेरदार वागा, चोली एवं सुनहरी ज़री की फतवी (Jacket) धरायी जाती है. सुनहरी एवं बैंगनी रंग के मोजाजी धराये जाते हैं. ठाड़े वस्त्र श्वेत रंग के लट्ठा के धराये जाते हैं.

श्रृंगार – आज प्रभु को छोटा (कमर तक) हल्का श्रृंगार धराया जाता है. हीरा एवं सोने के सर्व आभरण धराये जाते हैं.

 श्रीमस्तक पर बैंगनी रंग के चीरा (ज़री की पाग) के ऊपर सिरपैंच, लूम की सुनहरी किलंगी एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में कर्णफूल धराये जाते हैं.आज फ़तवी धराए जाने से कटिपेच बाजु एवं पोची नहीं धरायी जाती हैं. आज प्रभु को श्रीकंठ में हीरा की कंठी धराई जाती हैं.
 श्वेत एवं गुलाबी पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती है.
 श्रीहस्तं में हीरा की मुठ के एक वेणुजी एवं वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट बैंगनी एवं गोटी सोना की छोटी आती हैं.
आरसी श्रृंगार में सोना की एवं राजभोग में बटदार आती हैं.

संध्या-आरती दर्शन के उपरांत श्रीकंठ के श्रृंगार बड़े कर छेड़ान के (छोटे) श्रृंगार धराये जाते हैं. अनोसर में श्रीमस्तक पर चीरा रहता हैं एवं आड़ी एवं ठाड़ी लड़ धरायी जाती हैं.लूम-तुर्रा सुनहरी धराये जाते हैं.

Thursday, 10 December 2020

व्रव्रज – मार्गशीर्ष कृष्णा एकादशी ( उत्पति एकादशी व्रत)

व्रव्रज – मार्गशीर्ष कृष्णा एकादशी ( उत्पति एकादशी व्रत)
Friday, 11 December 2020

बात हिलगही कासों कहिये।
सुनरी सखी बिवस्था या तनकी समझ समझ मन चुप करी रहिये ॥१॥ 
मरमी बिना मरम को जाने यह उपहास जग जग सहिये।
चतुर्भुजप्रभु गिरिधरन मिले जबही, तबही सब सुख पहिये ॥२॥

उत्पति एकादशी

आज की एकादशी को उत्पति एकादशी कहा जाता हैं. व्रज-कन्याओं ने प्रभु श्री कृष्ण को अपने पति रूप में पाने के लिए देवी कात्यायनी का व्रत किया था. तत्समय अन्याश्रय ना हो अतः आज के दिन श्री यमुना जी ने रेणु (रज़) से कात्यायनी देवी की प्रतिमा बना कर उनकी प्रथम उत्पत्ति की थी अतः इस एकादशी को उत्पत्ति एकादशी कहा जाता है. कात्यायनी देवी तामसी जीवों को वांछित फल देने वाली आधिदैविक तामसी शक्ति है.

आज उत्पत्ति एकादशी है परन्तु श्रीजी को एकादशी फलाहार के रूप में कोई विशेष भोग नहीं लगाया जाता, केवल संध्या आरती में प्रतिदिन अरोगायी जाने वाली खोवा (मिश्री-मावे का चूरा) एवं मलाई (रबड़ी) को मुखिया, भीतरिया आदि भीतर के सेवकों को एकादशी फलाहार के रूप में वितरित किया जाता है.
श्रीजी के अलावा नाथद्वारा में अन्य सभी पुष्टि स्वरूपों जैसे श्री नवनीतप्रियाजी, श्री विट्ठलनाथजी, श्री मदनमोहनजी, श्री वनमालीजी आदि को नित्य की सामग्री के अलावा राजभोग समय फलाहार का भोग लगाया जाता है.
एकादशी फलाहार में पुष्टि स्वरूपों को विशेष रूप से सिंघाड़े के आटे का सीरा (हलवा), सिंगाड़े के आटे की मीठी सेव, विविध प्रकार के शाक, सिंघाड़े के आटे की मोयन की पूड़ी, तले हुए कंद (रतालू, सूरण, अरबी), सिंघाड़े के आटे की राब, रायता आदि आरोगाये जाते हैं.

आज का श्रृंगार ऐच्छिक है परन्तु किरीट, खोंप, सेहरा अथवा टिपारा धराया जाता है. रुमाल एवं गाती का पटका भी धराया जाता है. श्रृंगार जड़ाव का धराया जाता है. 

आज की सेवा श्री ललिता जी की सखी कुंजरी जी की ओर से होती है.

मेरी जानकारी के अनुसार आज श्रीजी को केसरी रंग के साटन पर सुनहरी ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित सूथन, चोली एवं चाकदार वागा एवं श्रीमस्तक पर फ़िरोज़ा के टीपारा का साज धराया जाएगा.

राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : सारंग)

बैठे हरि राधा संग कुंजभवन अपने रंग
कर मुरली अधर धरे सारंग मुख गाई ।
मोहन अति ही सुजान परम चतुर गुण निधान जानबुझ एक तान चूक के बजाई ।। १ ।।
प्यारी जब गह्यो बीन सकल कला गुन प्रवीन अति नवीन रूप सहित वही तान सूनाई ।
वल्लभ गिरिधरनलाल रीझ दई अंकमाल
कहत भले भले लाल सुंदर सुखदाई ।।२।।

साज – श्रीजी में आज सुरमा सितारा के कशीदे के ज़रदोज़ी के काम वाली एवं हांशिया वाली शीतकाल की पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – श्रीजी को आज केसरी रंग के साटन पर  सुनहरी ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित सूथन, चोली एवं चाकदार वागा धराये जाते हैं. पटका मलमल का धराया जाता हैं एवं लाल ज़री का गाती का रुमाल (पटका) धराया जाता है. ठाड़े वस्त्र स्याम रंग के धराये जाते हैं. 

श्रृंगार – प्रभु को आज वनमाला का (चरणारविन्द तक) हल्का श्रृंगार धराया जाता है. फ़ीरोज़ा के सर्व आभरण धराये जाते हैं.
श्रीमस्तक पर फ़ीरोज़ा के टिपारा की टोपी के ऊपर मध्य में मोर-चन्द्रिका, दोनों ओर दोहरा कतरा एवं बायीं ओर शीशफूल धराया जाता है. श्रीकर्ण में मयूराकृति कुंडल धराये जाते हैं. 
आज चोटीजी नहीं आती हैं.
श्रीकंठ में कस्तूरी, कली एवं कमल माला माला धरायी जाती है. गुलाब के पुष्पों की एवं श्वेत पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती है. 
श्रीहस्त में कमलछड़ी, फ़िरोज़ा के वेणुजी और दो वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट केसरी व गोटी चाँदी की बाघ-बकरी की आती है.

संध्या-आरती दर्शन के उपरांत श्रीकंठ के श्रृंगार बड़े कर छेड़ान के (छोटे) श्रृंगार धराये जाते हैं. श्रीमस्तक पर फ़ीरोज़ा का टीपारा एवं रूमाल बड़ा करके छज्जेदार पाग धराई जाती हैं. लूम-तुर्रा रूपहरी धराये जाते हैं.

Wednesday, 9 December 2020

व्रज – मार्गशीर्ष कृष्ण दशमी

व्रज – मार्गशीर्ष कृष्ण दशमी
Thursday, 10 December 2020

प्रथम घटा (हरी)

विशेष – श्रीजी में शीतकाल में विविध रंगों की घटाओं के दर्शन होते हैं. 
घटा के दिन सर्व वस्त्र, साज आदि एक ही रंग के होते हैं. आकाश में वर्षाऋतु में विविध रंगों के बादलों के गहराने से जिस प्रकार घटा बनती है उसी भाव से श्रीजी में मार्गशीर्ष व पौष मास में विविध रंगों की द्वादश घटाएँ द्वादश कुंज के भाव से होती हैं. 

कई वर्षों पहले चारों यूथाधिपतिओं के भाव से चार घटाएँ होती थी परन्तु गौस्वामी वंश परंपरा के सभी तिलकायतों ने अपने-अपने समय में प्रभु के सुख एवं वैभव वृद्धि हेतु विभिन्न मनोरथ किये. इसी परंपरा को कायम रखते हुए नित्यलीलास्थ गौस्वामी तिलकायत श्री गोवर्धनलालजी महाराज ने निकुंजनायक प्रभु के सुख और आनंद हेतु सभी द्वादश कुंजों के भाव से आठ घटाएँ बढ़ाकर कुल बारह (द्वादश) घटाएँ कर दी जो कि आज भी चल रही हैं. 
इनमें कुछ घटाएँ नियत दिनों पर एवं अन्य कुछ ऐच्छिक है जो खाली दिनों में ली जाती हैं. 

ये द्वादश कुंज इस प्रकार है –
अरुण कुंज, हरित कुंज, हेम कुंज, पूर्णेन्दु कुंज, श्याम कुंज, कदम्ब कुंज, सिताम्बु कुंज, वसंत कुंज, माधवी कुंज, कमल कुंज, चंपा कुंज और नीलकमल कुंज.

जिस रंग की घटा हो उसी रंग के कुंज की भावना होती है. इसी श्रृंखला में हरित कुंज के भाव से आज श्रीजी में हरी घटा होगी. 

इसका एक भाव और है कि प्रभु श्री श्यामसुंदर नीलवर्ण हैं और श्री स्वामिनी पीत वर्ण. दोनों वर्णों के मिलने से हरा रंग बनता हैं अतः आज सर्वप्रथम हरी घटा होती है. 

साज, वस्त्र, श्रृंगार, मालाजी आदि सभी हरे रंग के होते हैं. 
कीर्तन भी हरी घटा की भावना के गाये जाते हैं. 

सभी घटाओं में राजभोग तक का सेवाक्रम अन्य दिनों की तुलना में काफ़ी जल्दी हो जाता है.

राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : आसावरी)

मेरो माई हरि नागर सो नेह l
एक बैर कैसे छूटत है पूरब बढ्यो सनेह ll 1 ll
अंग अंग निपुन बन्यो जदुनंदन श्याम बरन सब देह l
जबते दृष्टि परे नंद नंदन विसर्यो गेह ll 2 ll
कोऊ निंदो कोऊ वंदौ मो मन गयो संदेह l
सरिता सिंधु मिलि ‘परमानंद’ भयो एक रस नेह ll 3 ll

साज – श्रीजी में आज हरे रंग के दरियाई वस्त्र की पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर हरी बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को हरे रंग के दरियाई वस्त्र का रुपहली तुईलैस की किनारी से सुसज्जित सूथन, चोली, घेरदार, एवं मोजाजी धराये जाते हैं. ठाड़े वस्त्र भी हरे रंग के धराये जाते हैं. 

श्रृंगार – प्रभु को आज छोटा (कमर तक) हल्का श्रृंगार धराया जाता है. पन्ना के सर्व आभरण धराये जाते हैं.
 श्रीमस्तक पर हरे रंग की गोल पाग के ऊपर सिरपैंच, हरा रेशम का दोहरा कतरा एवं बायीं ओर शीशफूल धराया जाता है. 

श्रीकर्ण में पन्ना के कर्णफूल धराये जाते हैं. 
हरे रंग के पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं.
 श्रीहस्त में हरे मीना के वेणुजी एवं एक वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट हरा व गोटी हरे मीना की आती है.

संध्या-आरती दर्शन के उपरांत श्रीकंठ के श्रृंगार बड़े कर छेड़ान के (छोटे) श्रृंगार धराये जाते हैं. श्रीमस्तक पर लूम-तुर्रा रूपहरी धराये जाते हैं.

आज के दिन विशेष रूप से शयन की आरती सभी बत्तियां (Lights) बुझा कर की जाती है. आरती की लौ की रौशनी में प्रभु के अद्भुत स्वरुप की अलौकिक छटा वास्तव में अद्वितीय होती है. इसी प्रकार आगामी अमावस्या को भी श्याम घटा के दिन भी विशेष रूप से शयन की आरती सभी बत्तियां (Lights) बुझा कर की जाती है. उसके बाद की सभी घटाओं में शयन के दर्शन बाहर होते ही नहीं अतः यह आनंद केवल दो घटाओं में ही प्राप्त हो सकता है.

त्रिदुःखसहनं धैर्यम्

”त्रिदुःखसहनं धैर्यम्"

जब भक्त के जीवन मे लौकिक क्लेश आते है या बढ़ते है तब भक्त भगवान से ओर अधिक जुड़ता है इसलिये भक्त के जीवन मे दुःख अधिक आते हैं. 

दुख जीव के अपने पाप के भोग है जिन्हें भोगने के लिये अन्य जीवो को कइ जन्म लेने पड़ते हैं पर भक्त पर भगवान कृपाकर इसी जन्म मे भोगने की सुविधा करा देते हैं इतना ही नहीं वे सूली का घाव सुइ पर उतरवा देते हैं | 

अनेक जन्मो तक दुखी होने के बदले एक जन्म के दुख को दुख न समझ प्रभु का आशीर्वाद समझना चाहिये महाप्रभुजी का यही सकारात्मक अभिगम है तभी आपने आज्ञा की है ”त्रिदुःखसहनं धैर्यम्" अपने भगवदीयों मे से अनेक ने इस आज्ञा का पालन बहुत बहादुरी से किया है 

जीवन के हर प्रसंग मे प्रभु लीला की भावना रखते हुये प्रभु इच्छा को सर्वोपरि माना है | भक्त सिंह के समान होता है जो दुखों के पहाड़ रूपी हाथी को देखकर डरता नहीं बल्कि बहादुरी से उसका सामना करता है ll

Tuesday, 8 December 2020

व्रज – मार्गशीर्ष कृष्ण नवमी

व्रज – मार्गशीर्ष कृष्ण नवमी
Wednesday, 09 December 2020

शीतकाल का प्रथम सखड़ी मंगलभोग

विशेष – वैसे तो श्रीजी को नित्य ही मंगलभोग अरोगाया जाता है परन्तु गोपमास और धनुर्मास में चार सखड़ी की सामग्रीयो वाले मंगलभोग विशेष रूप से अरोगाये जाते हैं. मंगलभोग का भाव यह है कि शीतकाल में बालकों को पौष्टिक खाद्य खिलाये जावें तो बालक स्वस्थ व पुष्ट रहते हैं इसी भाव से ठाकुरजी को अरोगाये जाते हैं.

इनकी यह विशेषता है कि इन चारों मंगलभोग में सखड़ी की सामग्री भी अरोगायी जाती है. एक और विशेषता है कि ये सामग्रियां श्रीजी में सिद्ध नहीं होती. 

दो मंगलभोग श्री नवनीतप्रियाजी के घर के एवं अन्य दो द्वितीय गृहाधीश्वर प्रभु श्री विट्ठलनाथजी के घर के होते हैं. अर्थात इन चारों दिन सम्बंधित घर से श्रीजी के भोग हेतु सामग्री मंगलभोग में आती है. 

आज का मंगलभोग श्री नवनीतप्रियाजी के घर का है जिसमें विशेष रूप से सखड़ी रसोईघर में सिद्ध चांवल की खीर एवं रोटी के साथ शाकघर, दूधघर, खासा-भण्डार से विविध पौष्टिक सामग्रियां श्रीजी के भोग हेतु आती है. 
श्रीजी को आज सखड़ी की सामग्री अरोगायी जाती है अतः मंगला में धूप-दीप नहीं किये जाते हैं. 

मंगला से राजभोग तक का सेवाक्रम अन्य दिवसों की तुलना में थोड़ा जल्दी होता है.

आज की सेवा श्री कृष्णावतीजी की ओर से होती है. आज विशेष रूप से मोती के काम वाले वस्त्र, गोल-पाग एवं श्रृंगार आदि नित्यलीलास्थ गौस्वामी तिलकायत श्री दामोदरलालजी महाराजश्री की आज्ञा से धराये जाते हैं. 
कीर्तन भी मोती की भावना वाले गाये जाते हैं.

कल मार्गशीर्ष कृष्ण दशमी को श्रीजी में प्रथम (हरी) घटा होगी.

राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : आसावरी)

मोती तेहू ठोर सबरारे l
जबहि तेरे गई चितवत उत जब नंदलाल पधारे ll 1 ll
अर्ध प्रोवत म श्याम मनोहर निकसे आय सवारे l
आधी लट कर लेव चली है जित व्रजनाथ सिधारे ll 2 ll
‘दास चतुर्भुज’ प्रभु चित्त चोर्यो गेह के काज बिसारे l
गिरिधरलाल भेंट बनमें तृन तौर सबै व्रत डारे ll 3 ll

साज – श्रीजी को आज श्याम रंग की साटन की, रुपहले मोतियों की बूटियों वाली तथा रुपहली ज़री की किनारी के हांशिया वाली पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज प्रभु को श्याम रंग की साटन के ऊपर ‘बसरा’ के मोतियों के सुन्दर काम वाला सूथन, चोली, घेरदार वागा एवं मोजाजी धराये जाते हैं. ठाड़े वस्त्र गहरे लाल रंग के धराये जाते हैं.

श्रृंगार – प्रभु को आज छोटा (कमर तक) हल्का श्रृंगार धराया जाता है. मोती के सर्व आभरण धराये जाते हैं.
 श्रीमस्तक पर श्याम रंग की मोती के काम वाली गोल-पाग, सिरपैंच, दोहरा मोतियों का कतरा एवं बायीं ओर शीशफूल धराया जाता है. 
श्रीकर्ण में एक जोड़ी मोती के कर्णफूल धराये जाते हैं.
 श्वेत एवं पीले पुष्पों की गुलाबी थागवाली दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं.
 श्रीहस्त में मोती के वेणुजी एवं वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट श्याम व गोटी चांदी की आती है.

संध्या-आरती दर्शन के उपरांत श्रीकंठ के श्रृंगार बड़े कर छेड़ान के (छोटे) श्रृंगार धराये जाते हैं. श्रीमस्तक पर लूम-तुर्रा रूपहरी धराये जाते हैं.

શ્રીનાથજીની પાઘના આંટા છૂટી જાય છે

જય શ્રીકૃષ્ણ 

એક દિવસ ઉત્થાપનના દર્શનમાં શ્રીનાથજીની પાઘના આંટા છૂટી જાય છે. છોર ઊડી ઊડીને નેત્રો આડે આવી રહ્યો છે. મુખીયાજી થોડા આઘા-પાછા  હોય છે. થોડી વાર રાહ જોયા પછી કંટાળીને શ્રીનાથજી સ્વયં છૂટેલી પાઘને પોતાના શિર પર બાંધવા લાગે છે. બહુ અદભુત દશ્ય સર્જાય છે. કેમેય કરીને પાઘ બાંધી શકાતી નથી અને શ્રીનાથજી શ્રમિત થઈ જાય છે.  એટલામાં ગોવિંદદાસ શ્રીનાથજીના દર્શને આવી  પહોંચે છે. તરત શ્રીનાથજી ગોવિંદદાસને પોતાની પાઘ બાંધી દેવાનું કહે છે . શ્રમિત થયેલા શ્રીનાથજીની કાલીધેલી શૈલિથી ગોવિંદદાસમાં સખ્યભાવ છલકાઇ આવે છે. તેઓ મર્યાદાનું ભાન ભૂલી જઈને જગમોહનમાંથી ઠેકડો મારી સીધા નિજમંદિરમાં શ્રીનાથજીની સન્મુખ પહોંચી જાય છે. અને ઝટ દઈને શ્રીનાથજીની પાઘ વાંકી કરીને આંટા બરાબર વાળી વાળીને શિર પર બાંધી દે છે.
 ચિત્રજી

એ જ ક્ષણે કોઈ ભિતરીયો અંદર પ્રવેશે છે અને આ દશ્ય જોઈ જાય છે. એના નેત્રો વિસ્ફારિત થઈ જાય છે અને પાછા પગલે વળી જઈ ભાગતો  ભાગતો સીધો શ્રી ગુસાંઈજીની બેઠકમાં ઘસી જાય છે અને ઊંચા શ્ર્વાસે હાંફતા હાંફતા ફરિયાદ કરે છે.

એની  ફરિયાદ સાંભળીને શ્રી ગુસાંઈજી મલકાઈને કહે છે કે ગોવિંદદાસના અડકવાથી શ્રી ગોવર્ધનધરણ અભડાતા નથી.

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