Wednesday, 30 June 2021
व्रज - आषाढ़ कृष्ण सप्तमी
Tuesday, 29 June 2021
व्रज - आषाढ़ कृष्ण षष्ठी
Monday, 28 June 2021
व्रज - आषाढ़ कृष्ण पंचमी
Sunday, 27 June 2021
व्रज - आषाढ़ कृष्ण चतुर्थी
Saturday, 26 June 2021
व्रज - आषाढ़ कृष्ण तृतीया
Thursday, 24 June 2021
व्रज – आषाढ़ कृष्ण प्रतिपदा
Wednesday, 23 June 2021
व्रज - ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा (चतुर्दशी क्षय)
Tuesday, 22 June 2021
व्रज - ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी
Monday, 21 June 2021
व्रज - ज्येष्ठ शुक्ल द्वादशी
Sunday, 20 June 2021
व्रज – ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी
व्रज – ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी
Monday, 21 June 2021
निर्जला एकादशी
श्वेत मलमल का पिछोड़ा एवं श्रीमस्तक पर मोती का किरीट के श्रृंगार
उत्थापन दर्शन पश्चात मोगरे की कली के श्रृंगार
विशेष – आज निर्जला एकादशी है. आज के दिन कई लोग निर्जल रह कर एकादशी करते हैं यद्यपि पुष्टिमार्ग में कोई भी व्रत निर्जल रह कर नहीं किया जाता अतः वैष्णव हल्का फलाहार महाप्रसाद अवश्य लें.
जिन तिथियों के लिए प्रभु की सेवा प्रणालिका में कोई वस्त्र, श्रृंगार निर्धारित नहीं होते उन तिथियों में प्रभु को ऐच्छिक वस्त्र व श्रृंगार धराये जाते हैं.
ऐच्छिक वस्त्र, श्रृंगार प्रभु श्री गोवर्धनधरण की इच्छा, ऋतु की अनुकूलता, ऐच्छिक श्रृंगारों की उपलब्धता, पूज्य श्री तिलकायत महाराजश्री की आज्ञा एवं प्रभु के तत्सुख की भावना से मुखियाजी के स्व-विवेक के आधार पर धराये जाते हैं.
ऐच्छिक वस्त्र, श्रृंगार के रूप में आज श्रीजी को श्वेत मलमल का पिछोड़ा एवं श्रीमस्तक पर मोती का किरीट का श्रृंगार धराया जायेगा.
अति ऊष्णकाल में मुकुट नहीं धराया जाता अतः इन दिनों में किरीट धराया जा सकता है.
कुछ वैष्णव किरीट और मुकुट को एक ही समझते हैं. किरीट दिखने में मुकुट जैसा ही होता है परन्तु मुकुट एवं किरीट में कुछ अंतर होते हैं.
मुकुट अकार में किरीट की तुलना में बड़ा होता है.
मुकुट अधिक गर्मी एवं अधिक सर्दी के दिनों में नहीं धराया जाता अतः इस कारण देव-प्रबोधिनी से डोलोत्सव तक एवं अक्षय तृतीया से रथयात्रा तक नहीं धराया जाता परन्तु इन दिनों में किरीट धराया जा सकता है.
मुकुट धराया जावे तब वस्त्र में काछनी ही धरायी जाती है परन्तु किरीट के साथ चाकदार, घेरदार वागा, धोती-पटका अथवा पिछोड़ा धराये जा सकते हैं.
🌸 मुकुट सदैव मुकुट की टोपी पर धराया जाता है परन्तु किरीट को कुल्हे एवं अन्य श्रीमस्तक के श्रृंगारों के साथ धराया जा सकता है.
ज्येष्ठ और आषाढ़ मास की चारों एकादशियों में श्रीजी को गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में लिचोई (मिश्री के बूरे और पीसी हुई इलायची से सज्जित पतली पूड़ी) अरोगायी जाती है.
श्रीजी को एकादशी फलाहार के रूप में कोई विशेष भोग नहीं लगाया जाता, केवल संध्या आरती में प्रतिदिन अरोगायी जाने वाली खोवा (मिश्री-मावे का चूरा) एवं मलाई (रबड़ी) को मुखिया, भीतरिया आदि भीतर के सेवकों को एकादशी फलाहार के रूप में वितरित किया जाता है.
राजभोग दर्शन –
कीर्तन – (राग : सारंग)
आज ठाड़े लाल मुकुट धरे l
वदन लसत मकराकृत कुंडल रतिपति मन जु हरे ll 1 ll
अरुन अधर और चिबुक चारु बन्यो दुलरी मोहन माल गरे l
अति सुगंध और चंदन खोर किये पहोंची मोतीन की लरे ll 2 ll
कर मुरली कटि लाल काछनी किंकणी नूपुर शब्द करे l
गुन भरे ‘कृष्णदास’ प्रभु राधा निरख नेन ईत ऊत न टरे ll 3 ll
साज – आज श्रीजी में श्वेत जाली (Net) पर लहरियाँ के काम (Work) से सुशोभित पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की गयी है.
वस्त्र – आज श्रीजी को श्वेत रंग की मलमल का पिछोड़ा धराया जाता है. पिछोड़ा रुपहली तुईलैस की किनारी से सुसज्जित होता है परन्तु किनारी बाहर आंशिक ही दृश्य होती है अर्थात भीतर की ओर मोड़ दी जाती है.
श्रृंगार – आज श्रीजी को मध्य का (घुटने तक) ऊष्णकालीन हल्का श्रृंगार धराया जाता है. मोती के सर्व आभरण धराये जाते हैं. श्रीमस्तक पर मोती का किरीट एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में मोती के मयूराकृति कुंडल धराये जाते हैं.
चोटीजी मोती की धरायी जाती है.
श्रीकंठ में कली आदि सभी माला धरायी जाती हैं. तुलसी एवं श्वेत पुष्पों की दो सुन्दर, कलात्मक मालाजी धरायी जाती हैं. श्रीहस्त में तीन कमल की कमलछड़ी, चांदी के वेणुजी एवं दो वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट ऊष्णकाल का व गोटी हकीक की बड़ी आती है.
आज शाम को मोगरे की कली के श्रृंगार धराये जायेंगे. इसमें प्रातः जैसे वस्त्र आभरण धराये जावें, संध्या-आरती में उसी प्रकार के मोगरे की कली से निर्मित अद्भुत वस्त्र और आभरण धराये जाते हैं.
उत्थापन दर्शन पश्चात प्रभु को कली के श्रृंगार धराये जाते हैं और शृंगार धराते ही भोग के दर्शन खोल दिए जाते और कली के शृंगार की भोग सामग्री संध्या-आरती में ली जाती हे.
संध्या-आरती के पश्चात ये सर्व श्रृंगार बड़े (हटा) कर शैया जी के पास पधराये जाते हैं. चार युथाधिपतियों के भाव से चार श्रृंगार – परधनी, आड़बंद, धोती एवं पिछोड़ा के धराये जाते हैं.
कली के श्रृंगार व्रजललनाओं के भाव से किये जाते हैं और इसमें ऐसा भाव है कि वन में व्रजललनाएं प्रभु को प्रेम से कली के श्रृंगार धराती हैं और प्रभु ये श्रृंगार धारण कर नंदालय में पधारते हैं.
Saturday, 19 June 2021
व्रज - ज्येष्ठ शुक्ल दशमी
Friday, 18 June 2021
व्रज - ज्येष्ठ शुक्ल नवमी
Thursday, 17 June 2021
व्रज - ज्येष्ठ शुक्ल अष्टमी
Wednesday, 16 June 2021
व्रज - ज्येष्ठ शुक्ल सप्तमी
Tuesday, 15 June 2021
व्रज - ज्येष्ठ शुक्ल षष्ठी
Monday, 14 June 2021
व्रज - ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी
Sunday, 13 June 2021
व्रज - ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्थी
Saturday, 12 June 2021
व्रज - ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया
Thursday, 10 June 2021
व्रज - ज्येष्ठ शुक्ल प्रतिपदा
Wednesday, 9 June 2021
व्रज - ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या
Tuesday, 8 June 2021
व्रज - ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी
Monday, 7 June 2021
व्रज - ज्येष्ठ कृष्ण त्रयोदशी
Sunday, 6 June 2021
व्रज - ज्येष्ठ कृष्ण द्वादशी
Saturday, 5 June 2021
व्रज - ज्येष्ठ कृष्ण एकादशी (द्वितीय)
Friday, 4 June 2021
व्रज - वैशाख शुक्ल एकादशी (प्रथम)
Thursday, 3 June 2021
व्रज - ज्येष्ठ कृष्ण दशमी
Wednesday, 2 June 2021
व्रज - ज्येष्ठ कृष्ण सप्तमी
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