By Vaishnav, For Vaishnav

Thursday, 6 April 2023

व्रज - वैशाख कृष्ण प्रतिपदा

व्रज - वैशाख कृष्ण प्रतिपदा
Friday, 07 April 2023

हरे लहरियाँ के घेरदार वागा एवं श्रीमस्तक पर गोल पाग पर क़तरा के शृंगार

जिन तिथियों के लिए प्रभु की सेवा प्रणालिका में कोई वस्त्र, श्रृंगार निर्धारित नहीं होते उन तिथियों में प्रभु को ऐच्छिक वस्त्र व श्रृंगार धराये जाते हैं. 
ऐच्छिक वस्त्र, श्रृंगार प्रभु श्री गोवर्धनधरण की इच्छा, ऋतु की अनुकूलता, ऐच्छिक श्रृंगारों की उपलब्धता, पूज्य श्री तिलकायत महाराजश्री की आज्ञा एवं प्रभु के तत्सुख की भावना से मुखियाजी के स्व-विवेक के आधार पर धराये जाते हैं.

ऐच्छिक वस्त्र, श्रृंगार के रूप में आज श्रीजी को हरे लहरियाँ का सूथन, चोली एवं घेरदार वागा का श्रृंगार धराया जायेगा एवं श्रीमस्तक पर गोल पाग पर क़तरा का श्रृंगार धराया जायेगा.

राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : नट)

नातर लीला होती जूनी।
जो पै श्रीवल्लभ प्रकट न होते वसुधा रहती सूनी।।१।।
दिनप्रति नईनई छबि लागत ज्यों कंचन बिच चूनी।
सगुनदास यह घरको सेवक जस गावत जाको मुनी।।२।।

साज – श्रीजी में आज हरे सफ़ेद लहरियाँ की रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी के हांशिया से सुसज्जित पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज प्रभु को हरे सफ़ेद लहरियाँ का सूथन, चोली एवं घेरदार वागा धराये जाते हैं. सभी वस्त्र रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित होते हैं. ठाड़े वस्त्र अमरसी रंग के धराये जाते हैं.

श्रृंगार – आज श्रीजी को छोटा (कमर तक) माणक के सर्व आभरण धराये जाते हैं. 
श्रीमस्तक पर हरे सफ़ेद लहरियाँ की गोल पाग के ऊपर सिरपैंच, क़तरा एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में कर्णफूल धराये जाते हैं. 

चैत्री गुलाब के पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं. 
श्रीहस्त में पुष्पछड़ी, लाल मीना के वेणुजी एवं एक वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट हरा व गोटी चाँदी की आती है.

Wednesday, 5 April 2023

व्रज - चैत्र शुक्ल पूर्णिमा

व्रज - चैत्र शुक्ल पूर्णिमा
Thursday, 06 April 2023

पूरी पूरी पूरनमासी पूर्यो पूर्यो शरदको चन्दा।
पूर्यो है मुरली स्वर केदारो, कृष्ण कला संपूरन भामिनी रास रच्यो सुखकंदा।।१।।
तान मान गति मोहन सोहे कहियत औरहि मन मोहंदा।
नृत्य करत श्रीराधा प्यारी नचवत आप बिहारी ऊदघत थेई थेई थुंगन छंदा।।२।।
मन आकर्षि लियो व्रजसुंदरी जय जय रुचिर गति मन्दा।
सखी आसीस देत हरिवंश तैसेई विहरत श्रीवृंदावन कुंवरि कुंवर नंदनंदा।।३।।

विशेष – आश्विन शुक्ल पूर्णिमा (शरद पूर्णिमा) से चैत्र शुक्ल पूर्णिमा की रास की छः मास की रात्रि आज पूर्ण होने से आज रासोत्सव मनाया जाता है. 
कुछ पुष्टिमार्गीय वैष्णव मंदिरों में आज शरद उत्सव मनाया जाता है और शरद पूर्णिमा को अरोगायी जाने वाली सामग्रियां  अरोगायी जाती है यद्यपि श्रीजी में ऐसा सेवाक्रम नहीं होता है.

श्रीजी में आज रास की चार सखी के भाव के चित्रांकन की पिछवाई आती है. नियम का रास के भाव का मुकुट और गुलाबी काछनी का श्रृंगार धराया जाता है. 

राजभोग दर्शन – 

कीर्तन – (राग : सारंग)

ऐसी बंसी बाजी बनघनमें व्यापी रही घ्वनि महामुनिनकी समाधी लागी l
भयो ब्रह्मनाद ऊठत आह्लाद जहाँ तहाँ व्रज घोष रत्न वृंद भये सब त्यागी ll 1 ll
रास आदि अनेक लीला रसभाव पूरित मूरति मुखारविंद छबि धरे विरह अनंग जागी l
तब वेणुनाद द्वार अब श्रीलक्ष्मणभट भूपकुमार ‘पद्मनाभ’ दैवोद्धार अर्थ त्यागी ll 2 ll 

साज – आज श्रीजी में रास रमती चार गोपियों के चित्रांकन की सुन्दर पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – श्रीजी को आज गुलाबी मलमल का सूथन, काछनी, रास-पटका एवं श्याम मलमल की चोली धरायी जाती हैं. सभी वस्त्र रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित होते हैं. ठाड़े वस्त्र सफेद जामदानी (चिकन) के धराये जाते हैं.

श्रृंगार - श्रीजी को आज वनमाला (चरणारविन्द तक) का भारी श्रृंगार धराया जाता है. हीरा मोती के सर्व आभरण धराये जाते हैं. श्रीमस्तक पर हीरा का मुकुट एवं बायीं ओर शीशफूल धराया जाता है. श्रीकर्ण में हीरा के मयूराकृति कुंडल धराये जाते हैं. 
बायीं ओर हीरा की शिखा (चोटी) धरायी जाती है. 
श्रीकंठ में कली, कस्तूरी व कमल माला धरायी जाती है. श्वेत एवं गुलाबी पुष्पों की विविध पुष्पों की थागवाली दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती है. श्रीहस्त में पुष्पछड़ी, लहरिया के हीराजड़ित वेणुजी एवं दो वेत्रजी (लहरिया व सोने के) धराये जाते हैं.
पट गुलाबी व गोटी नाचते मोर की आती है.

संध्या-आरती दर्शन के उपरांत श्रीकंठ के आभरण, मुकुट व टोपी बड़े किये जाते हैं व श्रीमस्तक पर गुलाबी गोल-पाग धरायी जाती है. 
श्रीकंठ में छेड़ान के (छोटे) श्रृंगार धराये जाते हैं.

Tuesday, 4 April 2023

व्रज - चैत्र शुक्ल चतुर्दशी

व्रज - चैत्र शुक्ल चतुर्दशी
Wednesday, 05 April 2023

चौफ़ुली चुंदड़ी के चाकदार वागा एवं श्रीमस्तक पर ग़्वाल पगा पर पगा चंद्रिका के शृंगार

जिन तिथियों के लिए प्रभु की सेवा प्रणालिका में कोई वस्त्र, श्रृंगार निर्धारित नहीं होते उन तिथियों में प्रभु को ऐच्छिक वस्त्र व श्रृंगार धराये जाते हैं. 
ऐच्छिक वस्त्र, श्रृंगार प्रभु श्री गोवर्धनधरण की इच्छा, ऋतु की अनुकूलता, ऐच्छिक श्रृंगारों की उपलब्धता, पूज्य श्री तिलकायत महाराजश्री की आज्ञा एवं प्रभु के तत्सुख की भावना से मुखियाजी के स्व-विवेक के आधार पर धराये जाते हैं.

ऐच्छिक वस्त्र, श्रृंगार के रूप में आज श्रीजी को चौफ़ुली चुंदड़ी के चाकदार वागा एवं श्रीमस्तक पर ग्वाल पगा पर पगा चंद्रिका का श्रृंगार धराया जायेगा.

राजभोग दर्शन – 

कीर्तन (राग : घनाश्री)

यशोदा रानी जायो है सुत नीको l
आनंद भयो सकल गोकुलमें गोप वधु लाई टीको ll 1 ll
अक्षत दूब रोचन वंदन नंदे तिलक दहीं को l
अंचल वारि वारि मुख निरखत कमल नैन प्यारो जीकों ll 2 ll
अपने अपने भवन से निकसी पहेरे चीर कसुम्भी को l
'यादवेन्द्र' व्रजकुल प्रति पालक कंस काल भय भीको ll 3 ll 

साज – श्रीजी में आज लाल रंग की चौफूली चूंदड़ी की रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी के हांशिया से सुसज्जित पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज प्रभु को लाल रंग की चौफूली चूंदड़ी का सूथन, चोली के चाकदार वागा धराये जाते हैं. सभी वस्त्र रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित होते हैं. ठाड़े वस्त्र मेघस्याम रंग के धराये जाते हैं.

श्रृंगार – प्रभु को आज छोटा (कमर तक) हल्का श्रृंगार धराया जाता है. हरे मीना के सर्व आभरण धराये जाते हैं.
 श्रीमस्तक पर लाल रंग के ग्वाल पगा पर सिरपैंच, पगा चंद्रिका एवं बायीं ओर शीशफूल धराया जाता है. 
श्रीकर्ण में लोलकबिंदी धराये जाते हैं.
 कमल माला धरायी जाती हैं.
गुलाबी गुलाब के पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं.
 श्रीहस्त में पुष्पछड़ी, फ़िरोज़ा के वेणुजी एवं एक वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट लाल एवं गोटी चाँदी की धरायी जाती हैं.

Monday, 3 April 2023

व्रज - चैत्र शुक्ल त्रयोदशी (द्वितीय)

व्रज - चैत्र शुक्ल त्रयोदशी (द्वितीय)
Tuesday, 04 April 2023

पहर री माल गुलाब सुगंधकी ले राधे मोहन तोहे दीनी ।
अबही उर ते उतार लइ है अपने अंगराग रस भीनी ।।१।।
मान निहोरी निहारी नयन भर हंस गही हाथ सखीपे लीनी ।
सूर कहे जिन गहरु कर भामिनि गिरिधर छेल तोपे बस कीनी ।।२।।

गुलाबी मलमल के घेरदार वागा एवं श्रीमस्तक पर गोल पाग पर क़तरा या चंद्रिका के शृंगार

जिन तिथियों के लिए प्रभु की सेवा प्रणालिका में कोई वस्त्र, श्रृंगार निर्धारित नहीं होते उन तिथियों में प्रभु को ऐच्छिक वस्त्र व श्रृंगार धराये जाते हैं. 
ऐच्छिक वस्त्र, श्रृंगार प्रभु श्री गोवर्धनधरण की इच्छा, ऋतु की अनुकूलता, ऐच्छिक श्रृंगारों की उपलब्धता, पूज्य श्री तिलकायत महाराजश्री की आज्ञा एवं प्रभु के तत्सुख की भावना से मुखियाजी के स्व-विवेक के आधार पर धराये जाते हैं.

ऐच्छिक वस्त्र, श्रृंगार के रूप में आज श्रीजी को गुलाबी मलमल का सूथन, चोली एवं घेरदार वागा का श्रृंगार धराया जायेगा एवं श्रीमस्तक पर गोल पाग पर क़तरा या चंद्रिका का श्रृंगार धराया जायेगा.

राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : नट)

नातर लीला होती जूनी।
जो पै श्रीवल्लभ प्रकट न होते वसुधा रहती सूनी।।१।।
दिनप्रति नईनई छबि लागत ज्यों कंचन बिच चूनी।
सगुनदास यह घरको सेवक जस गावत जाको मुनी।।२।।

साज – श्रीजी में आज गुलाबी मलमल की रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी के हांशिया से सुसज्जित पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज प्रभु को गुलाबी मलमल का सूथन, चोली एवं घेरदार वागा धराये जाते हैं. सभी वस्त्र रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित होते हैं. ठाड़े वस्त्र लाल रंग के धराये जाते हैं.

श्रृंगार – आज प्रभु को छोटा (कमर तक) हल्का श्रृंगार धराया जाता है. पन्ना के सर्व आभरण धराये जाते हैं.
श्रीमस्तक पर गुलाबी रंग की गोल पाग के ऊपर सिरपैंच, क़तरा या चंद्रिका एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में एक जोड़ी कर्णफूल धराये जाते हैं. 
चैत्री गुलाब के पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं. 
श्रीहस्त में पुष्पछड़ी, हरे मीना के वेणुजी एवं एक वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट गुलाबी व गोटी चाँदी की आती है.

Sunday, 2 April 2023

व्रज - चैत्र शुक्ल त्रयोदशी (प्रथम)

व्रज - चैत्र शुक्ल त्रयोदशी (प्रथम)
Monday, 03 April 2023

मल्लकाछ टीपारा पे खुलेबंध एवं माखन चोरी की पिछवाई का विशिष्ट श्रृंगार

जिन तिथियों के लिए प्रभु की सेवा प्रणालिका में कोई वस्त्र, श्रृंगार निर्धारित नहीं होते उन तिथियों में प्रभु को ऐच्छिक वस्त्र व श्रृंगार धराये जाते हैं. 
ऐच्छिक वस्त्र, श्रृंगार प्रभु श्री गोवर्धनधरण की इच्छा, ऋतु की अनुकूलता, ऐच्छिक श्रृंगारों की उपलब्धता, पूज्य श्री तिलकायत महाराजश्री की आज्ञा एवं प्रभु के तत्सुख की भावना से मुखियाजी के स्व-विवेक के आधार पर धराये जाते हैं.

ऐच्छिक वस्त्र, श्रृंगार के रूप में आज श्रीजी को मल्लकाछ टीपारा पे खुलेबंध एवं माखन चोरी की पिछवाई का विशिष्ट श्रृंगार धराया जायेगा.

मल्लकाछ शब्द दो शब्दों (मल्ल एवं कच्छ) के मेल से बना है. ये एक विशेष परिधान है जो आम तौर पर पहलवान मल्ल (कुश्ती) के समय पहना करते हैं. यह श्रृंगार पराक्रमी प्रभु को वीर-रस की भावना से धराया जाता है.

राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : सारंग)

तेरे लाल मेरो माखन खायो l
भर दुपहरी देखि घर सूनो ढोरि ढंढोरि अबहि घरु आयो ll 1 ll
खोल किंवार पैठी मंदिरमे सब दधि अपने सखनि खवायो l
छीके हौ ते चढ़ी ऊखल पर अनभावत धरनी ढरकायो ll 2 ll
नित्यप्रति हानि कहां लो सहिये ऐ ढोटा जु भले ढंग लायो l
‘नंददास’ प्रभु तुम बरजो हो पूत अनोखो तैं हि जायो ll 3 ll

साज – आज श्रीजी में माखन-चोरी लीला के चित्रांकन वाली पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया के ऊपर सफेद बिछावट की जाती है तथा स्वर्ण की रत्नजड़ित चरणचौकी के ऊपर श्वेत मखमल मढ़ी हुई होती है.

वस्त्र – श्रीजी को आज हरे सफ़ेद लहरियाँ  के, सुनहरी ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित मल्लकाछ एवं लाल सफ़ेद लहरियाँ का रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित चोली एवं चड़ी आस्तीन का खुलेबंध का चाकदार वागा धराया जाता है. आज पटका एक ही धराया जाता हैं.ठाड़े वस्त्र मेघश्याम रंग के धराये जाते हैं.

श्रृंगार – आज प्रभु को मध्य का (घुटने तक) भारी श्रृंगार धराया जाता है. फ़िरोज़ा के सर्व आभरण धराये जाते हैं.
 श्रीमस्तक पर टिपारा का साज धराया जाता है जिसमें हरे सफ़ेद लहरियाँ की टिपारा की टोपी के ऊपर सिरपैंच, मध्य में मोरशिखा, दोनों ओर दोहरा कतरा एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. बायीं ओर मीना की चोटी (शिखा) धरायी जाती है. श्रीकर्ण में हीरा के कुंडल धराये जाते हैं. हास, कड़ा, हस्थसाखला धराये जाते हैं.
कमल माला धरायी जाती हैं.
 श्वेत पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती है.
 श्रीहस्त में कमलछड़ी, फ़ीरोज़ा के वेणुजी और दो वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट लाल व गोटी बाघ-बकरी की आती है. 

Saturday, 1 April 2023

व्रज - चैत्र शुक्ल द्वादशी

व्रज - चैत्र शुक्ल द्वादशी
Sunday, 02 April 2023

पीले मलमल के चाकदार वागा, श्रीमस्तक पर फेटा पर फेटा का साज के शृंगार

जिन तिथियों के लिए प्रभु की सेवा प्रणालिका में कोई वस्त्र, श्रृंगार निर्धारित नहीं होते उन तिथियों में प्रभु को ऐच्छिक वस्त्र व श्रृंगार धराये जाते हैं. 
ऐच्छिक वस्त्र, श्रृंगार प्रभु श्री गोवर्धनधरण की इच्छा, ऋतु की अनुकूलता, ऐच्छिक श्रृंगारों की उपलब्धता, पूज्य श्री तिलकायत महाराजश्री की आज्ञा एवं प्रभु के तत्सुख की भावना से मुखियाजी के स्व-विवेक के आधार पर धराये जाते हैं.

ऐच्छिक वस्त्र, श्रृंगार के रूप में आज श्रीजी को पीले मलमल का सूथन, चोली एवं चाकदार वागा एवं श्रीमस्तक पर फेटा के उपर फेटा के साज का श्रृंगार धराया जायेगा.

राजभोग दर्शन – 

कीर्तन – (राग : सारंग)

कहा कहों लाल सुधर रंग राख्यो मुरलीमें l
तानबंधान स्वरभेद लेत अतिजत बिचबिच मिलवत विकट अवधर ll 1 ll
चोख माखन की रेख तामें गायन मिलवत लांबे लांबे स्वर l
बिच बिच लेत तिहारो नाम सुनरी सयानी 'गोविंदप्रभु' व्रजरानी के कुंवर ll 2 ll  

साज – आज श्रीजी में पीले रंग की पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है. 

वस्त्र – आज श्रीजी को पीले मलमल  के, रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित सूथन, चोली एवं चाकदार वागा धराये जाते हैं. ठाड़े वस्त्र लाल रंग के धराये जाते हैं.

श्रृंगार – आज प्रभु को मध्य का (घुटने तक) हल्का श्रृंगार धराया है. माणक के सर्व आभरण धराये जाते हैं. श्रीमस्तक पर फेंटा का साज धराया जाता है. पीले रंग के फेंटा के ऊपर सिरपैंच, मोरशिखा, दोहरा कतरा एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में लोलकबिंदी (लड़वाले कर्णफूल) धराये जाते हैं.
 गुलाबी गुलाब के पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं.
 श्रीहस्त में पुष्पछड़ी, लाल मीना के वेणुजी एवं वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट पीला व गोटी चाँदी की बाघ बकरी की आती है.

संध्या-आरती दर्शन के उपरांत श्रीकंठ के आभरण बड़े कर छेड़ान के (छोटे) आभरण धराये जाते हैं. श्रीमस्तक पर फेंटा रहे लूम-तुर्रा नहीं आवे.

Friday, 31 March 2023

व्रज - चैत्र शुक्ल एकादशी

व्रज - चैत्र शुक्ल एकादशी
Saturday, 01 April 2023

कामदा एकादशी, श्री महाप्रभुजी के उत्सव की बधाई बैठे, बालभाव के श्रृंगार आरंभ

विशेष - आज कामदा एकादशी है. 
आज से श्रीजी में श्री महाप्रभुजी के उत्सव की बधाई पंद्रह दिवस की बैठती है. अगले पंद्रह दिवस श्री महाप्रभुजी की एवं जन्माष्टमी की बधाईयाँ गायी जातीं हैं. 

आज से प्रभु को बालभाव के श्रृंगार धराये जाते हैं. जैसे श्रृंगार हो उस भाव के बधाई के कीर्तन गाये जाते हैं. 

आज से आगामी पंद्रह दिन तक श्याम, बादली, नीले आदि अमंगल रंगों के वस्त्र नहीं धराये जाते हैं एवं इस अवधि में अशुभ में गये सेवक की दंडवत (सेवा में पुनः प्रवेश) भी वर्जित होती है.

प्राकट्योत्सवों के पूर्व बधाई बैठने के कारण कुछ यूं है कि भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य हुआ उसके पूर्व ब्रह्माजी, इन्द्र, शिवजी आदि सभी देवों द्वारा देवकीजी के गर्भ में विराजित प्रभु की स्तुति की गयी थी तब प्रभु का प्राकट्य हुआ. इस प्रकार पहले बधाई बैठती है, बधाईयाँ गायी जाती हैं और प्रभु की वंदना करने, गुणगान करने से प्रभु अवतरित होते हैं.

महाप्रभुजी के उत्सव की  पंद्रह दिवस की बधाई बैठने का एक प्रमुख कारण यह है कि श्री महाप्रभुजी के लौकिक पिता श्री लक्ष्मणभट्टजी को उनके द्वारा किये सौ सोमयज्ञों के फलस्वरुप प्रभु ने रामनवमी के दिन स्वप्न में माला-बीड़ा देकर आज्ञा की थी कि मैं तुम्हारे घर प्रकट होने वाला हूँ. 
इस भाव से श्री महाप्रभुजी के उत्सव की बधाई पंद्रह दिवस पूर्व बैठती है.

सेवा क्रम - उत्सव की बधाई बैठने के कारण श्रीजी मंदिर के सभी मुख्य द्वारों की देहरी (देहलीज) को पूजन कर हल्दी से लीपी जाती हैं एवं आशापाल की सूत की डोरी की वंदनमाल बाँधी जाती हैं. 

दो समय आरती थाली में की जाती है.

पिछवाई पलना के भाव के चित्रांकन की, नियम के घेरदार वस्त्र एवं श्रृंगार धराये जाते हैं जिनका वर्णन नीचे दिया गया है.

राजभोग में अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता अरोगाया जाता

राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : आसावरी)

धन्य यशोदा भाग्य तिहारो जिन ऐसो सुत जायो l
जाके दरस परस सुख उपजत कुलको तिमिर नसायो ll 1 ll
विप्र सुजन चारन बंदीजन सबै नंदगृह आये l
नौतन सुभग हरद दूब दधि हरखित सीस बंधाये ll 2 ll
गर्ग निरुप किये सुभ लच्छन अविगत हैं अविनासी l
‘सूरदास’ प्रभुको जस सुनिकें आनंदे व्रजवासी ll 3 ll

साज – आज श्रीजी में श्वेत रंग की प्रभु को पलना झुलाते पूज्य गौस्वामी बालकों के चित्रांकन की पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – श्रीजी को आज लाल रंग की मलमल का सूथन, चोली, घेरदार वागा एवं कटि-पटका धराये जाते हैं. सभी वस्त्र रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित होते हैं. ठाड़े वस्त्र हरे रंग के धराये जाते हैं.

श्रृंगार – आज प्रभु को छोटा (कमर तक) हल्का श्रृंगार धराया जाता है. हरे मीना के सर्व आभरण धराये जाते हैं. 
श्रीमस्तक पर लाल रंग की गोल-पाग के ऊपर सिरपैंच, लूम, जड़ाव की गोल चंद्रिका एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं.
 श्रीकर्ण में कर्णफूल गुलाब के पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं. श्रीहस्त में पुष्पछड़ी, हरे मीना के वेणुजी एवं दो वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट लाल, गोटी चांदी की आती है.

व्रज - अश्विन कृष्ण द्वितीयाMonday, 28 September 2026

व्रज - अश्विन कृष्ण द्वितीया Monday, 28 September 2026 मुकुट काछनी का श्रृंगार अहो विधना तोपै अँचरा पसार माँगू, जनम-जनम दिजौ याहि बृज बसिबौ।...