By Vaishnav, For Vaishnav

Sunday, 2 August 2020

रगट भये तैलंग कुल दीप।।

रगट भये तैलंग कुल दीप।।
श्रीलक्ष्मणभट अति आनंदित ,
सुत मुख निरखत आय समीप।।१।।
मात ईल्लमा कूख उदय भयो,
ज्यों उपजत मुक्ताफल सीप।।
सगुणदास मुख कहत न आवे,
जस प्रसर्यो नव खंड सप्तदीप।।२।।

भावार्थ
तेलंग कुल के दीपक श्रीमद्वल्लभाचार्यजी प्रकट हुए ह़ैं। प्राकट्य समय पिता श्रीलक्ष्मण भटजी अत्यंन्त आनंदित होते हुए अपने लाल के पास आकर
मुख दर्शन करते हैं। मैया श्रीइलम्माजी के उदर से आपश्री का प्राकट्य की उपमा देते हुए भगवदीय काहेते है जैसे मोती सीप से प्रकट हुआ हो। सगुणदासजी कहते हैं कि नौ खंडो एवं सात द्वीपों में आपश्री का यश प्रसरा हुआ है जो अवर्णनीय् है।।

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कुंभनदासजी श्रीनाथजी की सेवा में नित्य कीर्तन करके श्रीनाथजी को रिझाते थे.

 

कुंभनदासजी श्रीनाथजी की सेवा में नित्य कीर्तन करके श्रीनाथजी को रिझाते थे. वे श्रीनाथजीको प्रिय थे. श्रीनाथजी उनको अपना सानुभव जताते थे. वे साथ साथ खेलते रहते थे और बाते भी किया करते थे.

श्रीनाथजीने आज्ञा करी कि हमें टोंड के घने में पधारने की इच्छा है वहां हमें ले चलो.

निकुंज में श्रीनाथजी ने अपने मुख से कुंभनदासको आज्ञा करी कि कुंभनदास इस समय ऐसा कोई कीर्तन गा तो मेरा मन प्रसन्न होने पावे. मै सामग्री आरोंगु और तु कीर्तन गा.
श्री कुम्भनदासने अपने मनमें सोचा कि प्रभुको कोई हास्य प्रसंग सुननेकी इच्छा है ऐसा लगता है. कुंभनदास आदि चारों वैष्णव भूखे भी थे और कांटें भी बहुत लगे थे इस लिये कुंभनदासने यह पद गाया :
राग : सारंग
“भावत है तोहि टॉडको घनो ।
कांटा लगे गोखरू टूटे फाट्यो है सब तन्यो ।।१।।
सिंह कहां लोकड़ा को डर यह कहा बानक बन्यो ।
‘कुम्भनदास’ तुम गोवर्धनधर वह कौन रांड ढेडनीको जन्यो ।।२।।
यह पद सुनकर श्रीनाथजी एवं श्री स्वामिनीजी अति प्रसन्न हुए. सभी वैष्णव भी प्रसन्न हुए. बादमें मालाके समय कुंभनदासजीने यह पद गाया :
बोलत श्याम मनोहर बैठे...
राग : मालकौंश
बोलत श्याम मनोहर बैठे, कमलखंड और कदम्बकी छैयां ।
कुसुमनि द्रुम अलि पीक गूंजत, कोकिला कल गावत तहियाँ ।। 1 ।।
सूनत दूतिका के बचन माधुरी, भयो हुलास तन मन महियाँ ।
कुंभनदास ब्रज जुवति मिलन चलि, रसिक कुंवर गिरिधर पहियाँ ।। 2 ।।

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Saturday, 1 August 2020

भाग -1 श्री ठाकोरजी की द्वारिका लीला का प्रशंग है।

 

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भाग -1

जय श्री कृष्णा।

आज भगवद गुणगान का माहिमा जानते है।

श्री ठाकोरजी की द्वारिका लीला का प्रशंग है।

श्री ठाकुरजीकी सभी पटरानियां माता देवकीजी के पास श्री प्रभु की बाललीला के प्रशंग सुननेकी विनती लेके पहुंची तो माता ने कहा मैंने तो कभी भी मेरे लल्ला की बाललीला का आनंद नहीं लिया। वो सौभगाय तो नंदरानीजी और नंदबाबा को मिला था। ग्यारह वर्ष के बाद मथुरा आने के बाद कान्हा ने कोई बाललीला नहीं की। तुम सभी का मनोरथ पूर्ण करने केलिए नंदबाबा तथा व्रज की गोपिओ से जो ललित लीला प्रशंग मैंने सुने हे आप सुब को सुनती हु।
माता ने द्वारपाल से किसी को भी भीतर ना आने देने का आदेश दिया। श्री द्वारिकाधीश पधारे तो भी बिनती करके भीतर न आने देने के लिए कह।
माता देवकी ने आठो पुत्रवधुओं को श्री कृष्णा की बाललीला गुनगान करना सुरु किया। सभी लीला श्रवण में डूब गए। किसी को भी ना देहाध्यान था न तो बितते हुए समय का अनुमान। तभी द्वार पे श्री ठाकुरजी और बलरामजी पधारे। द्वारपालने माता के कथन अनुशार प्रवेश न करने की बिनती की। दोनों भाई द्वार पर ही रुके और भीतर से आ रही शब्द ध्वनि को सुनने लगे। अपनी बाललीला चरित्र का श्रवण करते हुए तीन प्रहार तक द्वार पर ही व्यतीत हो गए। तभी वहा श्री नारदजी पधारे और प्रभुके कथा श्रवण में लींन हो गए।
दो प्रहार पश्चात माता देवकी ने बाललीला कीर्तन पूर्ण किया। सभी को सुध आई और नारदजी ने हाथ जोड़कर बिनती की प्रभु आपकी ये लीला समज में नहीं आई।
प्रभु हम तो आपके नाम का संकीर्तन करके , आपके रूप ,गुणों और लीला का संकीर्तन करके हमेशा आपके समरण में रहते हे। परनतु क्या आपको भी आपकी लिला इतनी प्रिय हे की इन में लींन हो जाते हे। श्री ठाकुरजी ने मुश्कुराते हुए कहा हा । प्रभु में तो आप के पास एक प्रश्न लेके आया था।
भगवन कईबार में आप को तीनो लोको में और वैकुण्ठ में भी खोज लेता हु पर आपनाही मिलते। तो में जानने आया था की आप का पता क्या हे। मुश्कुराते हुए श्री ठाकुरजी बोले नारद लिखो हम कही पर हो या न हो किन्तु जहा मेरे भक्त मेरा गुणगान गाते हो वहा में अवश्य होता हु।
मुझे मेरे गुणगान सबसे अधिक प्रिय हे।
श्री ठाकुरजी ने स्वयं आपना पता भगतो के दवरा किये जाने वाले गुणगान में बताया हे।
आओ लीला औ का ध्यान करे।
बोलो श्री लाड़िले लाल की जय।

पुष्तक - तुलसी क्यारो - १
राइटप टाइपिंग - वर्षा चिनाई
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व्रज - श्रावण शुक्ल चतुर्दशी

 

व्रज - श्रावण शुक्ल चतुर्दशी
Sunday , 02 August 2020

प्रथम तिलकायत नित्यलीलास्थ गौस्वामी श्री विट्ठलेशरायजी महाराज (१६५७) का उत्सव

विशेष – श्री गुसांईजी के प्रपौत्र अर्थात उनके प्रथम पुत्र गिरधरजी के द्वितीय पुत्र दामोदरजी के पुत्र श्री विट्ठलेशरायजी (१६५७) (टिपारा वाले विट्ठलेशजी) का आज प्राकट्योत्सव है.

आपका धराया टिपारा का अद्भुत श्रृंगार श्रीजी को सुहाता था एवं आपश्री श्रीजी के प्रिय थे अतः आप को ‘टिपारा वाले विट्ठलेशजी’ भी कहा जाता है.

श्रीजी ने स्वयं आज्ञा कर गृह के मुखिया के रूप में तिलक कर आपको प्रथम तिलकायत के रूप में नियुक्त किया एवं उन्हें वर्ष के 360 दिनों में 60 दिवस के श्रृंगार करने की आज्ञा भी प्रदान की.
ये वे श्रृंगार हैं जो वर्ष में सभी बड़े उत्सवों पर धराये जाते हैं और ‘घर के श्रृंगार’ कहे जाते हैं और इन पर तिलकायत महाराज का विशेष अधिकार होता है.

आप ने ही श्रीजी को दूधघर की विविध प्रकार सामग्रियां अरोगाने का क्रम प्रारंभ किया.

तिलकायत के रूप में पदासीन होने के पश्चात आपने श्रीजी के कई मनोरथ किये, अपने चमत्कारों से तत्कालीन मुग़ल बादशाह जहाँगीर को भी प्रभावित किया एवं उनके पास से गोकुल एवं गोपालपुर (जतिपुरा) में जमीनें प्राप्त कर बड़ी-बड़ी गौशालाओं का निर्माण करवाया.

आपके काल से ही श्रीजी में तिलकायत परम्परा का प्रारंभ हुआ जो कि आज भी जारी है. आपके नित्यलीला में प्रवेश के पश्चात आपके ज्येष्ठ पुत्र श्री लालगिरिधर जी तिलकायत के रूप में पदासीन हुए.

सेवाक्रम - नित्यलीलास्थ तिलकायत श्री विट्ठलेशरायजी का उत्सव होने के कारण श्रीजी मंदिर के सभी मुख्य द्वारों की देहरी (देहलीज) को हल्दी से लीपी जाती हैं एवं आशापाल की सूत की डोरी की वंदनमाल बाँधी जाती हैं. आज दिन भर सभी समय झारीजी मे यमुनाजल भरा जाता है.

आज श्रीजी को नियम का पिले रंग का पिछोड़ा और श्रीमस्तक पर कुल्हे के ऊपर सुनहरी घेरा का श्रृंगार धराया जाता है.

श्रावण शुक्ल एकादशी से श्रावण शुक्ल पूर्णिमा तक प्रतिदिन श्रृंगार समय मिश्री की गोल-डली का भोग अरोगाया जाता है.

गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में विशेष रूप से श्रीजी को केशरयुक्त जलेबी के टूक एवं दूधघर में सिद्ध की गयी केशरयुक्त बासोंदी की हांडी अरोगायी जाती है.

राजभोग में अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता सखड़ी में मीठी सेव व केशरयुक्त पेठा अरोगाये जाते हैं.

कल श्रावण शुक्ल पूर्णिमा (सोमवार, 03 अगस्त 2020) को रक्षाबंधन हैं. श्री गुसांईजी के ज्येष्ठ पुत्र गिरधरजी के द्वितीय पुत्र और आज के उत्सव नायक के पितृचरण गौस्वामी दामोदरजी का भी कल प्राकट्योत्सव है.

श्रीजी में पवित्रा की भांति ही रक्षा (राखी) भी शुभमुहूर्त से कभी प्रातः श्रृंगार दर्शन में और कभी उत्थापन दर्शन में धरायी जाती है.
इस वर्ष पूर्णिमा कल 03 अगस्त को रात्रि को 9.28 तक होने एवं एवं श्रवण नक्षत्र सुबह 7.19 के पश्चात लगने से रक्षा (राखी) उत्थापन दर्शन में धरायी जायेंगी.
सभी वैष्णव अपने सेव्य ठाकुरजी को उत्थापन के पश्चात और रात्रि 9.28 से पहिले रक्षा (राखी) धरा सकते हैं.

इस विषय में कल की पोस्ट में विशिष्ट पाठ्य सामग्री उपलब्ध कराने का प्रयास करूँगा.

राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : सारंग)

आंगन नंद के दधि कादौ ।
छिरकत गोपी ग्वाल परस्पर प्रकटे जगमें जादौ ।१।।
दूध लियो दधि लियो लियो घृत माखन माट संयुत ।
घर घरते सब गावत आवत भयो महरि के पुत्र ।।२।।
बाजत तूर करत कोलाहल वारि वारि दै दान ।
जीयो जशोदा पूत तिहारो यह घर सदा कल्यान ।।३।।
छिरके लोग रंगीले दीसे हरदी पीत सुवास ।
मेहा आनंद पुंज सुमंगल यह व्रज सदा हुलास ।।४।।

साज – श्रीजी में आज पिले रंग की मलमल पर रुपहली ज़री की किनारी के हांशिया से सुसज्जित पिछवाई धरायी जाती है.
गादी और तकिया के ऊपर सफेद बिछावट की जाती है तथा स्वर्ण की रत्नजड़ित चरणचौकी के ऊपर हरी मखमल मढ़ी हुई होती है.
पीठिका व पिछवाई के ऊपर रेशम के रंग-बिरंगे पवित्रा धराये जाते हैं.

वस्त्र - श्रीजी को आज पिले रंग रंग का रूपहरी पठानी किनारी का पिछोड़ा धराया जाता है. ठाड़े वस्त्र लाल रंग के धराये जाते हैं.

श्रृंगार - श्रीजी को आज मध्य (घुटने तक) का श्रृंगार धराया जाता है. माणक एवं जड़ाव स्वर्ण के सर्व-आभरण धराये जाते हैं.
श्रीमस्तक पर पिले रंग की कुल्हे के ऊपर सिरपैंच, सुनहरी घेरा एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में माणक के मकराकृति कुंडल धराये जाते हैं.
श्रीकंठ में कली की मालाजी धराई जाती हैं. हास,त्रवल नहीं धराए जाते हैं.बग्घी धरायी जाती हैं.पीले पुष्पों की रंग-बिरंगी मालाजी एवं विविध प्रकार के रंग-बिरंगे पवित्रा मालाजी के रूप में धराये जाते हैं. श्रीहस्त में कमलछड़ी, माणक के वेणुजी एवं दो वेत्रजी(एक सोना का) धराये जाते हैं.
पट पिला एवं गोटी स्याम मीना की आती हैं.

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आज के हिंडोलना के दर्शन

चाँदी का हिंडोला

संध्या-आरती में श्री मदनमोहन जी चाँदी के हिंडोलने में झूलते हैं. उनके सभी वस्त्र श्रृंगार श्रीजी के जैसे ही होते हैं. आज श्री बालकृष्णलाल जी भी उनकी गोदी में विराजित हो झूलते हैं.

कीर्तन हिंडोला– (राग-सोरठ)

झुलत सांवरे संग गोरी ।
अमित रूप गुन सहज माधुरी शोभा सिंधु झकोरी ।।१।।
ईत सिर मोर मुकुट की लटकन ऊत बेंदी सिर रोरी ।
कुंडल लोल कपोलन झलकत ऊतही बनी कचडोरी ।।२।।
ईत ऊत बेसरकी मुक्तासो चोंप बढी अति जोरी ।
रसिक प्रीतम वल्लभ कटाक्ष छबि हावभाव चित छोरी ।।३।।

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કંકોડાતેરશ શાથી કહેવાય

 

કંકોડાતેરશ શાથી કહેવાય

શ્રી ચતુરાનન નાગા વ્રજમાં મથુરાથી ડીંગ જતા રસ્તા ઉપર ટોંડ નો ઘનો નામનું અલૌકીક અને ઐતિહાસિક સ્થાન આવે છે. શ્રી ચતુરાનન નાગા નામનો એક પરમ તપસ્વી વૈષ્ણવ ટોંડ નો ધનોની ગીચ ઝાડી માં પ્રભુ સ્મરણમાં તલ્લીન બની રહેતો હતો. એ બહુ ભલો ભોળો વૈષ્ણવ હતો.
શ્રી ગિરિરાજ પર્વતને ભગવત સ્વરૂપ માનતો હોવાથી શ્રી ગોવર્ધન ઉપર પગ મૂકીને શ્રીનાથજીનાં દર્શન કરવા જતો નહીં આમ ભગવદ્ સ્મરણમાં અને વિરહમાં શ્રીચતુરાનન નાગા બહુ ઉદ્વેગમાં રહેતો હતો.
ભક્તવત્સલ શ્રીનાથજી થી એનો વિરહ સહન થઈ શક્યો નહીં. એ દરમિયાન શ્રી ગિરીરાજ ઉપર યવન બાદશાહ નો ત્રાસ વધી જતાં શ્રીનાથજી, પોતાના પ્રિય સેવકો સાથે, ટોંડનો ઘનો નામના આ સધન વૃક્ષા વલીથી જડિત સ્થાનમાં સંવત ૧૫૫૨ ના શ્રાવણ સુદ તેરસ ને બુધવારના રોજ પધાર્યા . ' શ્રીનાથજી પધાર્યા, શ્રીનાથજી પધાર્યા ના મંગળ સમાચાર મળતા શ્રી ચતુરનન નાગા ને તેઓશ્રી ના દર્શન કરવાની અત્યંત તાલાવેલી થઇ હતી. શ્રીનાથજી યવનોના ઉપદ્રવ નું કારણ ઉપજાવીને નિજ ભક્ત કે દર્શનામૃતનું દાન કરવા સ્વંય તેમની પાસે પધાર્યા. શ્રીનાથજી અને તેમના સેવકો માટે આ વનમાં પ્રવેશો મુશ્કેલ હતું. આ વનમાં કાંટા અને ગોખરુ વિપુલ પ્રમાણમાં હોવાથી ત્યાં આવનાર સર્વે વૈષ્ણવો ને પગમાં કાંટા વાગ્યા તથા તેમના વસ્ત્રો પણ ફાટી ગયાં. શ્રીનાથજી ને ત્યાં પધારેલા જોઈ ચતુરનાગા પોતાનાં અહોભાગ્ય માની તેમના ચરણોમાં ઢળી પડ્યો. શ્રીનાથજી પધારતાં તેણે મહાન ઉત્સવ મનાવ્યો. વનમાંથી તાજા કંકોડા (કંટોળા)વીણી લાવીને તેનું શાક સિદ્ધ કર્યું અને શીરો બનાવી કંકોડાનું શાક અને શીરા નો શ્રીનાથજીને ભોગ ધર્યો. ત્યારથી પુષ્ટિ સંપ્રદાયમાં શ્રાવણ સુદ તેરસના દિવસે પ્રભુને કંટોલા નુ શાક અને શીરો ધરવાની પ્રથા ચાલુ થઈ છે. શ્રાવણ સુદ તેરસ ના દિવસને આપણે કંકોડા તેરસ તરીકે ઓળખીએ છીએ

શ્રીનાથજીએ પ્રેમથી વનવાસી વૈષ્ણવ ભક્ત ચતુર નાગાનો ભોગ સ્વીકારી પૂછ્યું, 'હે તપસ્વી વૈષ્ણવ વનમાં તું આવી ઉગ્ર તપશ્ર્ચર્યા કેમકરે છે? ઉત્તરમાં શ્રી ચતુર નાગાએ જણાવ્યું કે, 'હે ગોવર્ધનનાથજી, ટોડ ગામ માં વરસાદના અભાવે ગરીબ ખેડૂતોનાં કુટુંબો હેરાનગતિ ભોગવે છે. તેઓ ભૂખે મરે છે. મારાથી એમનું દુઃખ જોયું જતું નથી એટલે હું આ ભયજનક ઝાડીમાં તપ કરું છું' શ્રીનાથજીએ ઉત્તરમાં કહ્યું કે ' તું અહીંથી જઈને તારા ગામના ખેડૂતોને હવે પૂછી જોજે કે , તેઓ સુખો છે કે દુઃખી?  આટલું કહીને શ્રીનાથજી ગોવર્ધન પર્વત ઉપર પધારી ગયા . શ્રી ચતુર નાગાએ તરત જ પોતાના ગામમાં જઈ ખેડૂતોનાં ખેતરોમાં પગ મૂકતાંની સાથે જ અજાયબી અનુભવી કેમકે જે ખેતરો થોડા મહિનાઓ પહેલા એને સુક્કા ભઠ્ઠ જોયા હતાં તે શ્રીનાથજી પ્રભુના પુનિત પગલાં પછી લીલાંછમ હરિયાળાં જોયાં. ભક્ત પ્રત્યે શ્રીનાથજી પ્રભુની કેવી અદભૂત કૃપા પ્રભુ તો ભાવના ભૂખ્યા છે. અને ભાતભાતનાં મિષ્ટાન ઘરો કે સૂકો રોટલો ઘરો પણ ભાવ વિના મોંઘું મિસ્ટાન પણ પ્રભુ આરોગતા નથી. એટલે એ ઘરવાનો કશોજ અર્થ રહેતો નથી. શ્રીજીની લીલાના દર્શન કરી ધન્ય થયેલા શ્રી ચતુરા નાગા ને આપણા પ્રણામ
સંકલન: જયદીપ ગઢીઆ. મુંબઈ.

 દેખ્યો' રી મેં સુંદર શ્યામ સ્વરૂપ(1994)
પુષ્ટિમાર્ગીય પુસ્તકથી આ વિગત અને ચિત્રજી અપાય છે.

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व्रज - श्रावण शुक्ल त्रयोदशी

व्रज - श्रावण शुक्ल त्रयोदशी
Saturday, 01 August 2020

किंकोडा तेरस, चतुरा नागा के श्रृंगार

आज किंकोड़ा तेरस है. आज के दिन व्रज में विराजित श्रीजी यवनों के उपद्रव का नाश कर पाड़े (भैंसे) के ऊपर बैठकर रामदासजी, कुम्भनदासजी आदि को साथ लेकर चतुरा नागा नाम के विरक्त योगी को दर्शन देने एवं उक्त पाड़े (भैंसे) का उद्धार करने टॉड का घना नाम के घने वन में पधारे थे.

चतुरा नागा श्रीजी के दर्शन को लालायित थे परन्तु वे श्री गिरिराजजी पर पैर नहीं रखते थे जिससे श्रीजी के दर्शन से विरक्त थे.
भक्तवत्सल प्रभु अत्यन्त दयालु हैं एवं अपने सभी भक्तों को मान देते हैं अतः वे स्वयं अपने भक्त को दर्शन देने पधारे. चतुरा नागा की अपार प्रसन्नता का कोई छोर नहीं था.
वर्षा ऋतु थी सो चतुरा नागा तुरंत वन से किंकोडा के फल तोड़ लाये और उसका शाक सिद्ध किया. रामदासजी साथ में सीरा (गेहूं के आटे का हलवा) सिद्ध कर के लाये थे सो श्रीजी को सीरा एवं किंकोडा का शाक भोग अरोगाया.

तब कुम्भनदासजी ने यह पद गाया –
“भावत है तोहि टॉडको घनो ।
कांटा लगे गोखरू टूटे फाट्यो है सब तन्यो ।।१।।
सिंह कहां लोकड़ा को डर यह कहा बानक बन्यो ।
‘कुम्भनदास’ तुम गोवर्धनधर वह कौन रांड ढेडनीको जन्यो ।।२।।

कुछ देर पश्चात समाचार आये कि यवन लश्कर फिर से बढ़ गया है जिससे तुरंत श्रीजी को पुनः मंदिर में पधराया गया.

आज भी राजस्थान में भरतपुर के समीप टॉड का घना नमक स्थान पर श्रीजी की चरणचौकी एवं बैठकजी है जो कि अत्यंत रमणीय स्थान है.

आज श्रीजी को मुकुट-काछनी का श्रृंगार धराया जाता है.

उपरोक्त प्रसंग की भावना से ही आज के दिन श्रीजी को गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में किंकोडा का शाक एवं सीरा (गेहूं के आटे का हलवा) अरोगाया जाता है.

अद्भुत बात यह है कि आज भी प्रभु को उसी लकड़ी की चौकी पर यह भोग रखे जाते हैं जिस पर सैंकड़ों वर्ष पूर्व चतुरा नागा ने प्रभु को अपनी भाव भावित सामग्री अरोगायी थी.

राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : सारंग)

आज महा मंगल महराने l
पंच शब्द ध्वनि भीर बधाई घर घर बेरखबाने ll 1 ll
ग्वाल भरे कांवरि गोरस की वधु सिंगारत वाने l
गोपी ग्वाल परस्पर छिरकत दधि के माट ढुराने ll 2 ll
नाम करन जब कियो गर्गमुनि नंद देत बहु दाने l
पावन जश गावति ‘कटहरिया’ जाही परमेश्वर माने ll 3 ll

साज – वर्षाऋतु में बादलों की घटा एवं बिजली की चमक के मध्य यमुनाजी के किनारे कुंज में एक ओर श्री ठाकुरजी एवं दूसरी ओर स्वामिनीजी को व्रजभक्त झूला झुला रहे हैं. प्रभु की पीठिका के आसपास सोने के हिंडोलने का सुन्दर भावात्मक चित्रांकन किया है जिसमें ऐसा प्रतीत होता है कि प्रभु स्वर्ण हिंडोलना में झूल रहे हों, ऐसे सुन्दर चित्रांकन से सुशोभित पिछवाई आज श्रीजी में धरायी जाती है.
गादी और तकिया के ऊपर सफेद बिछावट की जाती है तथा स्वर्ण की रत्नजड़ित चरणचौकी के ऊपर हरी मखमल मढ़ी हुई होती है.

वस्त्र – श्रीजी को आज लाल एवं केसरी रंग के लहरिया की सुनहरी ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित सूथन, काछनी एवं पटका धराया जाता है. ठाड़े वस्त्र सफेद डोरीया के धराये जाते है.

श्रृंगार - प्रभु को आज वनमाला (चरणारविन्द तक) का भारी श्रृंगार धराया जाता है.
सर्वआभरण मोती के धराये जाते हैं. श्रीमस्तक पर सलमा सितारा का मुकुट व टोपी एवं बायीं ओर शीशफूल धराया जाता है.
श्रीकर्ण में मोती के कुंडल धराये जाते हैं. चोटीजी नहीं आती हैं.श्रीकंठ में कली,कस्तूरी आदि की माला आती हैं.पीले पुष्पों के रंग-बिरंगी थाग वाली दो सुन्दर मालाजी एवं कमल के फूल की मालाजी धरायी जाती है. श्रंग-बिरंगे पवित्रा मालाजी के रूप में धराये जाते हैं.
श्रीहस्त में कमलछड़ी, लहरिया के वेणुजी एवं वेत्रजी ( एक सोना का) धराये जाते हैं.
पट लाल एवं गोटी मीना की धराई जाती हैं

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व्रज - विस २०८३ श्रावण कृष्ण अमावस्या Wednesday, 12 August 2026

व्रज - विस २०८३ श्रावण कृष्ण अमावस्या  Wednesday, 12 August 2026 हरियाली अमावस्या  आज के हिंडोलना के दर्शन  आज चौक में हरे पत्तों की बिछावट ...